कांग्रेस का मिशन-2014 : मोदी को रोको

Last Updated: Monday, March 31, 2014 - 18:43

प्रवीण कुमार
साल 2014 में 16वीं लोकसभा के लिए होने वाले चुनाव में कुछ दिन ही शेष रह गए हैं। अगर इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी किन मुद्दों को आधार बनाकर चुनाव मैदान में उतरेगी तो इसका एकमात्र जवाब जो दिख रहा है वह है- `मोदी को रोको`। इसे लोकतंत्र की विडंबना कहें या बदलते परिदृश्य की सियासत, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में हो रहे 16वीं लोकसभा चुनाव में लोक यानी जनता से जुड़े मुद्दे नदारद है। मुद्दों और समस्याओं पर एक-दूसरे को घेरने वाली पार्टियों ने मुद्दों को पीछे छोड़कर सियासत के नामी चेहरों को आगे कर दिया है। लोकतंत्र के इस सबसे बड़े पर्व में मुद्दों की जगह नेताओं के नाम पर सियासत का खेल चल रहा है। दरअसल कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने 10 साल के कार्यकाल में देश को सामाजिक, आर्थिक और वैश्विक मोर्चे पर इतना कमजोर कर दिया है जिसे वापस पटरी पर लाना कम से कम कांग्रेस के बूते की बात तो नहीं है। देश की जनता को इस बात का अंदाजा है और इसीलिए चारों तरफ से भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के समर्थन में नारे लग रहे हैं- `हर-हर मोदी, घर-घर मोदी।` देश में गूज रहे इस नारे की वजह से कांग्रेस अब एक ही मुद्दे पर काम कर रही है और वह है मोदी के रथ को किसी तरह से रोको। कांग्रेस की पूरी सेना हर दिन नरेंद्र मोदी की सांप्रदायिक छवि को उजागर करने और गुजरात के विकास मॉडल की खामियां गिनाने में अपना वक्त जाया कर रही है।
 
बीते तीन दशकों में दुनिया बहुत बदल गई है। सूचना तकनीक की क्रांति ने लोगों को एक-दूसरे के नजदीक लाकर खड़ा कर दिया है। इस दौरान वैश्वीकरण की वजह से दुनिया भले ही भौतिक दृष्टि से नजदीक आई हो, लेकिन सामाजिक भेदभाव बराबर बना हुआ है। या यों कहें कि शायद और मजबूत हुआ है। ऐसे माहौल में कांग्रेस ने धर्मांधता का मुकाबला धर्मनिरपेक्षता, विकृति का मुकाबला विवेक और असत्य का मुकाबला सत्य से नहीं किया। वह भी शत्रु का शत्रु मित्र, फूट डालो और राज करो तथा सत्ता के लिए हर तरह के समझौते करने जैसे पैंतरों पर उतर आई। अब इतने समय बाद कांग्रेस लोकतंत्र यानी सत्ता के विकेंद्रीकरण और धर्मनिरपेक्षता पर जोर देकर चुनाव में उतरी है। यह चुनाव कांग्रेस के लिए अपने पाप धोने के मौके के समान है। वह भी गुजरात दंगों को ढाल बनाकर, धर्मनिरपेक्षता का राग अलापकर क्योंकि सामने रास्ता रोककर खड़ा है कांग्रेसमुक्त भारत का प्रण लेकर मिशन-2014 में उतरा भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नरेंद्र मोदी।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की बात करें तो वह भारत को विकासशील और तकनीक संपन्न देश बनाना चाहते थे। हर तरफ निर्माण की गूंज थी तब। फैक्ट्रियों को वे आधुनिक मंदिर कहा करते थे। नरेन्द्र मोदी भव्य भारत बनाने का सपना देख रहे हैं और इसके लिए मिशन-2014 के तहत देश में बड़ी-बड़ी रैलियां कर लोगों को भव्य भारत बनाने की तरकीब बता रहे हैं। उनकी तमन्ना है कि ये देश इतना ऐश्वर्यशाली बने कि वो विकसित देशों की कतार में हो और उसे नेतृत्व दे सके।
नेहरू कहा करते थे, `सरकार के प्रयासों को लोकहित के पैमाने पर ही कसा जा सकता है असल मकसद लोगों की खुशी है।` नेहरू ने अपने को `फर्स्ट सर्वेंट ऑफ इंडियन पीपुल` यूं ही नहीं कहा था। तो क्या राहुल गांधी उस तरह की कमी को पाटने की हसरत लेकर आगे बढ़ रहे हैं जो देश की प्रगति की राह में रोड़ा बनकर खड़ी है। इन बाधाओं की फेहरिस्त काफी लंबी है। मसलन सहकर्मियों के लाख मना करने के बावजूद नेहरू का आईसीएस को जारी रखना, कांग्रेस के अहंकारी नेताओं का वो भाव कि इनके सिवा इस देश को कोई नहीं चला सकता, सत्ता से जुड़े सब तरह के भ्रष्ट आचरण को वैध मानते जाना, शासन प्रणाली में पनपी सड़ांध के प्रति निर्विकार रूख अपनाना।
राहुल आजकल देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समूहों से मिल रहे हैं और वहां जाति व धर्म वाली राजनीति से ऊपर उठकर लोगों से बड़ी-बड़ी आदर्शवादी वातें कर रहे हैं। ये संतोष देने लायक अभीष्ठ हो सकता है। लेकिन नेहरू को बरबस याद करने वाले कांग्रेसी दिग्गज चुनाव को सेक्यूलर बनाम कम्यूनल रखने पर आज भी अड़े हुए हैं। चुनावी रणनीति के नाम पर राहुल भी उनके लपेटे में आ जाते हैं। राहुल बार-बार गुजरात दंगों पर बयान दे रहे हैं। कभी राजा अशोक और अकबर से अपनी तुलना करते हैं तो कभी औरंगजेब का नाम लेकर मोदी की तरफ इशारा कर जाते हैं।
कांग्रेस मानकर चल रही है कि यह चुनाव ‘पॉपुलरिज्म बनाम सेक्युलरिज्म’ पर होगा, क्योंकि कांग्रेस लगातार धर्मनिरपेक्षता की बात करती रहती है। लेकिन दिक्कत इस बात की है कि इन दोनों ही मुद्दों पर देश की जनता वोट देने नहीं जा रही है, क्योंकि उसके सामने ये मुद्दे नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और महंगाई सबसे बड़े मुद्दे हैं। लोगों में कांग्रेस से नाराजगी धर्मनिरपेक्षता, वंशवाद या कोई और मुद्दे को लेकर नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार को लेकर है। ठीक उसी तरह पॉपुलरिज्म या सेक्यूलरिज्म को लेकर लोग भाजपा की ओर नहीं जा रहे हैं, बल्कि कांग्रेस के भ्रष्टाचार की वजह से उधर या दूसरी पार्टियों की ओर मतदाता पलायन करने की तैयारी कर रहे हैं। दरअसल पूरा का पूरा आम चुनाव भ्रष्टाचार-महंगाई-बेरोजगारी के मुद्दे पर होने जा रहा है। इसके बाद राजनीतिक परिवर्तन का मुद्दा है। दुर्भाग्य से इन चार में से कोई मुद्दा कांग्रेस के सांचे में फिट नहीं बैठता है।



First Published: Monday, March 31, 2014 - 18:43
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