किसानों का पलायन नहीं बन सका मुद्दा

Last Updated: Monday, April 28, 2014 - 13:06

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विभाजित बुंदेलखंड इलाका पिछले कई वर्षों से प्राकृति आपदाओं का दंश झेल रहा है। भुखमरी और सूखे की त्रासदी से अब तक 61 लाख से अधिक किसान `वीरों की धरती` से पलायन कर चुके हैं। यहां के किसानों को उम्मीद थी कि अबकी बार के लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दल सूखा और पलायन को अपना मुद्दा बनाएंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और एक बार फिर यह मुद्दा जातीय बयार में दब सा गया है।
`वीरों की धरती` कहा जाने वाला बुंदेलखंड देश में महाराष्ट्र के विदर्भ जैसी पहचान बना चुका है। बुंदेलखंड का भूभाग उत्तर प्रदेश के बांदा, चित्रकूट, महोबा, उरई-जालौन, झांसी व ललितपुर और मध्य प्रदेश के टीकमगढ़, छतरपुर, सागर, दतिया, पन्ना व दमोह जिलों में विभाजित है।
यह इलाका पिछले कई साल से दैवीय और सूखा जैसी आपदाओं का दंश झेल रहा है और किसान `कर्ज` और `मर्ज` के मकड़जाल में जकड़ा है। तकरीबन सभी राजनीतिक दल किसानों के लिए झूठी हमदर्दी जताते रहे, लेकिन यहां से पलायन कर रहे किसानों के मुद्दे को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया गया। समूचे बुंदेलखंड में स्थानीय मुद्दे गायब हैं और जातीय बयार बह रही है।
सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश रैकवार की मानें तो इस इलाके के किसानों की दुर्दशा पर दो साल पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल की आंतरिक समिति ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को एक चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश की थी और विकास के लिए कुछ सिफारिश भी की थी, लेकिन यह रिपोर्ट अब भी पीएमओ में धूल फांक रही है। इस रिपोर्ट का हवाला देकर रैकवार बताते हैं कि आंतरिक समिति ने उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड के जिलों में बांदा से सात लाख 37 हजार 920, चित्रकूट से तीन लाख 44 हजार 801, महोबा से दो लाख 97 हजार 547, हमीरपुर से चार लाख 17 हजार 489, उरई (जालौन) से पांच लाख 38 हजार 147, झांसी से पांच लाख 58 हजार 377 व ललितपुर से तीन लाख 81 हजार 316 और मध्य प्रदेश के हिस्से वाले जनपदों में टीकमगढ़ से पांच लाख 89 हजार 371, छतरपुर से सात लाख 66 हजार 809, सागर से आठ लाख 49 हजार 148, दतिया से दो लाख 901, पन्ना से दो लाख 56 हजार 270 और दतिया से दो लाख 70 हजार 477 किसान व कामगार आर्थिक तंगी की वजह से महानगरों की ओर पलायन कर चुके हैं।
रैकवार बताते हैं कि इस समिति ने बुंदेलखंड की दशा सुधारने के लिए बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण के गठन के अलावा उप्र के सात जिलों के लिए 3,866 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश के छह जिलों के लिए 4,310 करोड़ रुपये का पैकेज देने की भी अनुशंसा की थी, मगर अब तक केंद्र सरकार ने इस पर अमल नहीं किया। रैकवार यह भी बताते हैं कि सिर्फ उप्र के हिस्से वाले बुंदेली किसान करीब छह अरब रुपये किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के जरिए सरकारी कर्ज लिए हुए हैं।
बुंदेली किसानों के पलायन को चुनावी मुद्दा न बनाए जाने पर विभिन्न दलों के नेता अलग-अलग तर्क देते हैं, समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय महासचिव और महोबा-हमीरपुर लोकसभा सीट से उम्मीदवार विशंभर प्रसाद निषाद कहते हैं कि सपा सरकार किसानों के हित में कई कल्याणकारी योजनाएं चला रही है और मुख्यमंत्री ने चुनाव बाद बुंदेलखंड विकास निधि की धनराशि में बढ़ोतरी कर यहां के समग्र विकास का वादा किया है। पलायन को चुनावी मुद्दा न बनाए जाने के सवाल पर उनका कहना है कि इसकी जरूरत नहीं है, जब यहां का विकास होगा, तब अपने आप पलायन रुक जाएगा।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायक दल के नेता और बांदा जिले की नरैनी सीट से विधायक गयाचरण दिनकर बुंदेलखंड में किसानों और कामगारों के पलायन का ठीकरा कांग्रेस और केंद्र सरकार पर फोड़ते हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आंतरिक समिति की रिपोर्ट पर अमल करते तो शायद हालातों पर काबू पाया जा सकता था, लेकिन जानबूझ कर ऐसा नहीं किया गया। बकौल दिनकर, बसपा घोषण पर नहीं, काम पर भरोसा करती है। वह कहते हैं कि इस चुनाव में बसपा बैलेंस ऑफ पावर में आई तो पलायन को मुख्य मुद्दा मानकर काम किया जाएगा। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव साकेत बिहारी मिश्र कहते हैं कि राहुल गांधी हमेशा बुंदेलखंड पर मेहरबान रहे हैं, उनकी सिफारिश पर ही विशेष पैकेज दिया गया है, लेकिन मौजूदा सपा सरकार ने इसकी धनराशि दूसरे कार्यो में खर्च कर दिया है। वह कहते हैं कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में किसान हित को सर्वोपरि रखा गया है। उन्हें भरोसा है कि 16वीं लोकसभा में राहुल की अगुआई में सरकार बनेगी और बुंदेलखंड के किसानों का पलायन रुकेगा।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बुंदेलखंड क्षेत्र के अध्यक्ष बाबूराम निषाद का कहना है कि किसानों की दुर्दशा के लिए कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) जिम्मेदार है। भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में स्पष्ट किया है कि केंद्र की सत्ता में आने पर वह प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना और कम ब्याज की दर से कृषि ऋण देकर उपलब्ध कराकर उनकी माली हालत सुधारेगी। वह कहते हैं कि यहां सिंचाई संसाधनों की कमी को पूरा करने के लिए नदियों को एक-दूसरे से जोड़ा जाएगा, ताकि हर खेत तक पानी पहुंच सके। किसानों के पलायन पर दिए गए तर्क से किसान और राजनीतिक विश्लेषकों के विचार जुदा हैं। विदेशों में खेती-किसानी का गुर सीख चुके बड़ोखर गांव के प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह का कहना है कि नदियों को आपस में जोड़ने के बजाए यहां परंपरागत सिंचाई संसाधनों को बढ़ावा देने की जरूरत है, तभी पलायन और दैवीय आपदाओं से छुटकारा मिल सकता है।
बुजुर्ग राजनीतिक विश्लेषक और अधिवक्ता रणवीर सिंह चैहान का कहना है कि सभी दल किसानों की झूठी हमदर्दी दिखाकर अपना मकसद पूरा करते हैं और अभागे किसान आत्महत्या तक कर रहे हैं। कुल मिलाकर इस लोकसभा चुनाव में भी किसानों के पलायन को दलों ने गंभीरता से नहीं लिया और यह मुद्दा जातीय बयार के आगे दब सा गया है।



First Published: Monday, April 28, 2014 - 13:06


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