फिर करिश्मा दिखा पाएगी आम आदमी पार्टी?

धरने और आंदोलन के बूते भारतीय राजनीति में अपनी जगह बनाने वाली आम आदमी पार्टी ने भाजपा और कांग्रेस के परंपरागत वोटों में सेंध लगाकर दिल्ली में सरकार बनाई।

अंतिम अपडेट: Mar 31, 2014, 06:54 PM IST

रामानुज सिंह
धरने और आंदोलन के बूते भारतीय राजनीति में अपनी जगह बनाने वाली आम आदमी पार्टी ने भाजपा और कांग्रेस के परंपरागत वोटों में सेंध लगाकर दिल्ली में सरकार बनाई। 49 दिन की केजरीवाल सरकार ने ताबड़तोड़ फैसले और कुछ मंत्रियों के रवैये के चलते खूब सुर्खियां बटोरीं। दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को उसके वायदों पर ही विश्वास करके विधानसभा चुनाव में 28 सीटों का तोहफा दिया था, जिसके बल पर `आप` की सरकार की रूपरेखा बनी है, मगर सवाल यह है कि क्या आम आदमी पार्टी यही करिश्मा लोकसभा चुनाव में दोहरा पाएंगे।
आम आदमी पार्टी की ओर से आम लोगों को लुभाने में तीन प्रमुख वायदे किए गए थे। ये हैं बिजली की दरों में भारी कटौती, प्रतिदिन प्रत्येक परिवार को 700 लीटर पानी की मुफ्त मुहैया करना और सभी अनियमित बस्तियों का नियमितिकरण। वास्तव में दिल्ली की जनता को ये वादे काफी पसंद आए और केजरीवाल की एक साल पुरानी पार्टी पर भरोसा जताया। 70 सदस्यीय विधानसभा में 28 सीटें देकर देश की दो सबसे बड़ी पार्टी भाजपा और कांग्रेस को बैकफुट पर धकेल दिया था। क्या लोकसभा चुनाव में जनता इस पार्टी पर अपना भरोसा दिखा पाएगी। क्योंकि दिल्ली में केजरीवाल की सरकार ने 49 दिन में इस्तीफा देकर लोगों का न केवल भरोसा तोड़ा बल्कि विश्वास भी खो दिया।
राष्ट्रीय राजनीति और प्रदेश की राजनीति में अंतर होता है, राष्ट्रीय मुद्दे और राजस्तरीय मुद्दे अलग-अलग होते हैं। लेकिन भ्रष्टाचार, घोटाला, महंगाई, बेरोजगारी और काले धन के मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर एक समान हैं। चुनावी सर्वे बताते है कि इन दिनों भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की देश भर में लहर है। मोदी ईमानदार छवि और गुजरात का विकास मॉडल देश के मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल हो रहे हैं। ऐसे में केजरीवाल और उनकी पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर क्या अहमियत होगी। क्योंकि केजरीवाल का सरकार चलाने का रिपोर्ट कार्ड कोई खास नहीं रहा है। जबकि मोदी ने अपने 12 साल के कार्यकाल गुजरात के विकास में अमूलचूल परिवर्तन लाया है।
आम आदमी पार्टी ने विधानसभा में जो वायदे किए थे, उनमें से कुछ प्रमुख वादे इस तरह हैं। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सत्ता में आने के 15 दिनों के भीतर जन लोकपाल विधेयक पारित करना, करीब 3,000 मोहल्ला सभाओं की स्थापना, सरकारी काम के लिए पैसे का भुगतान केवल मुहल्ला सभाओं के काम के संतुष्ट होने के बाद होना, बिजली का बिल आधा करना और निजी वितरण कंपनियों का आडिट, बढ़ा हुआ बिल सुधारना और यदि बिजली वितरण कंपनियां सहयोग नहीं करेंगी तो उनका लाइसेंस रद्द करना। इसके अलावा, दो लाख सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालय बनाना, हर परिवार को प्रतिदिन 700 लीटर पानी मुफ्त पानी, दिल्ली पुलिस, दिल्ली विकास प्राधिकरण और नगर निगमों को दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र में लाना, अल्पसंख्यकों का संरक्षण, भ्रष्टाचारियों को बर्खास्त करना, हर वार्ड में नागरिक सुरक्षा बल बनाना आदि लुभावने वादे शामिल हैं। इन वायदों में केजरीवाल सरकार ने पानी, बिजली को छोड़कर कोई खास काम नहीं कर पाई। पानी-बिजली भी सिर्फ तीन महीने के लिए देकर खुद जिम्मेदारी बचते हुए भाग खड़ी हुई।
आम आदमी पार्टी मौलिक समस्यों के अलावे देश में छुआछूत, नस्लीय पूर्वग्रह, रंगभेद, समुदाय के भीतर समाजिक सुधार का अभाव, मुसलमानों के भीतर महिलाओं की स्थिति, जातिवाद, क्षेत्रवाद, संकीर्ण सामाजिक नेतृत्व और लैंगिक भेदभाव, खाप की राजनीति जैसे मुद्दों पर भी विचार स्पष्ट करने होंगे।
चुनाव पूर्व अक्सर तीसरे मोर्चे की चर्चा चलना आम बात है, चुनाव की घोषणा होते ही छोटे बड़े क्षेत्रीय राजनैतिक दल केंद्रीय सत्ता में ज्यादा से ज्यादा भागीदारी पाने को लालायित होकर तीसरे मोर्चे के गठन की कवायद तेज कर देते है, इस तरह के मोर्चे में ज्यादातर मौकापरस्त दल और नेता होते है जिन्हें एक दूसरे की नीतियों और विचारधारा से कोई मतलब नहीं होता, उनका मकसद येनकेन प्रकारेण संसद में सत्ता की मलाई से ओरों से ज्यादा चखने से रहता है। पर इन चुनावों में तीसरे मोर्चे के गठन की कवायद शुरू हुई पर बनने से पहले ही बिखराव भी दिखने लगा। इन हालातों में अरविंद केजरीवाल द्वारा गठित आम आदमी पार्टी एक नया विकल्प जनता के सामने रख पाएगी।