नरेंद्र मोदी की `सुनामी` में बहे क्षेत्रीय क्षत्रप

By Bimal Kumar | Last Updated: Saturday, May 17, 2014 - 08:39

बिमल कुमार
16वीं लोकसभा के चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम की ऐसी सुनामी चली, जिसका अनुमान संभवत: किसी ने नहीं लगाया था। हां, यह जरूर था कि देश भर में मोदी की लहर है और उनकी अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी का डंका बजेगा। लेकिन बीजेपी नेता का ऐसा जादू चला कि कई बड़े बड़े सूरमा धाराशायी हो गए। मोदी इफेक्‍ट को यूं समझा जा सकता है कि साल 1984 के बाद यह पहली बार है कि किसी राजनीतिक दल को स्‍पष्‍ट बहुमत मिला है। बीजेपी की इस ऐतिहासिक जीत के महानायक नरेंद्र मोदी हैं और उनके बिना शायद बीजेपी का यह प्रभावशाली प्रदर्शन सामने नहीं आ पाता।
भारतीय जनता पार्टी पिछले 30 वर्षों के दौरान लोकसभा चुनाव में अपने दम पर बहुमत हासिल करने वाली पहली पार्टी बन कर उभरी है। 545 सदस्यीय लोकसभा में आधी संख्या यानी 272 से भी अधिक। बीजेपी के लिए यह एक चमत्कार की तरह है, चूंकि 1984 के आम चुनाव में पार्टी ने मात्र दो सीटें जीती थी। उस समय जनता पार्टी से अलग होकर भाजपा ने पहली बार चुनाव लड़ा था। पूर्व में जनसंघ के रूप में इस पार्टी ने 1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी में शामिल हो गई थी। जिक्र योग्‍य है कि 84 के चुनाव में कांग्रेस ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर पर सवार होकर राजीव गांधी के नेतृत्व में भारी जीत हासिल की थी और उसे लोकसभा में 414 सीटें मिली थीं। मगर इस बार देश में अब तक हुए कुल 16 आम चुनावों में से कांग्रेस का सबसे बुरा प्रदर्शन रहा।
बीजेपी के इस शानदार प्रदर्शन में उत्‍तर प्रदेश, बिहार, राजस्‍थान, गुजरात, मध्‍य प्रदेश आदि राज्‍यों की भूमिका सर्वाधिक है। इनमें से खासकर उत्‍तर प्रदेश और बिहार में बीजेपी का इस तरह उभरना क्षेत्रीय दलों के लिए खासा संकट बन जाएगा। उत्‍तर प्रदेश और बिहार में मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने जो ऐतिहासिक जीत हासिल की है, उससे समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, राष्‍ट्रीय जनता दल आदि क्षेत्रीय दलों के सामने खासी मुश्किलें खड़ी हो गई है। मुलायम सिंह यादव, मायावती, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव सरीखे क्षेत्रीय क्षत्रप इस बार मोदी की सुनामी में तकरीबन बह गए। चुनाव नतीजों को देखकर ऐसा लगता है कि इन क्षत्रपों के लिए अब आगे की राह कितनी मुश्किल होगी।
बीजेपी के उत्तर प्रदेश में अब तक के सबसे बेहतरीन प्रदर्शन में दो बातों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। पहला, मोदी का वाराणसी सीट से चुनाव लड़ना और पूर्वांचल के क्षेत्रों में मोदी लहर को और मजबूत करना। दूसरा, मोदी के करीबी और बीजेपी के वरिष्‍ठ नेता अमित शाह की ओर से सूबे के गांव-गांव में अभियान चलाकर मतदाताओं के रुझान को बीजेपी की तरफ मोड़ना। चुनाव परिणाम यह साबित करते हैं कि मोदी लहर और अमित शाह की रणनीति ने बीजेपी के लिए इसे बखूबी अंजाम दिया।
समाजवादी पार्टी के लिए दुखद यह है कि सूबे की सत्‍ता में मौजूद होने के बावजूद इस चुनाव में महज चंद सीटों पर सिमटकर कर रह गए। और वो सीट भी सिर्फ मुलायम के परिवारों तक ही सीमित रही। मोदी की सुनामी में सपा के इस हश्र के लिए मुलायम सिंह यादव खुद जिम्‍मेवार हैं। सूबे में कानून-व्‍यवस्‍था की अनियंत्रित स्थिति, लोगों की बदहाली, सपा कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी, बेरोजगारी आदि समस्‍याओं से जनता काफी खिन्‍न हो चुकी थी, जिसका जवाब उन्‍होंने बीजेपी के पक्ष में `अच्‍छे दिन आने की उम्‍मीद` में वोट करके दिया। सूबाई सरकार के छत्रछाया में समाजवादी पार्टी का इस तरह हारना पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। समाजवादी पार्टी को लोकसभा चुनाव परिणामों की समीक्षा करने और यह पता लगाने की कोशिश करना चाहिए करेगी कि राज्य सरकार से कहां चूक हो गई कि पार्टी को चुनाव में इस तरह की करारी शिकस्‍त मिली।
बसपा की बात करें तो सोशल इंजीनियरिंग के नारे के साथ चुनावी मैदान में कूदने वाली पार्टी प्रमुख मायावती के हाथ पूरी तरह खाली रहे। मायावती को इस बात का कतई अंदाजा नहीं होगा कि इस चुनाव में उनकी पार्टी का यह हश्र होगा। प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से एक भी सीट बसपा के खाते में जाने की उम्‍मीद धूमिल पड़ गई। केंद्र में सत्ता संतुलन की बात करने वाली मायावती के लिए यह बहुत बड़ा झटका है। बसपा के नेता भले ही इस मामले में अभी कुछ न बोलें लेकिन हकीकत यह है कि मोदी की सुनामी में वाकई बसपा का यूपी से सूपड़ा साफ हो गया।
बिहार में निश्चित तौर पर यह मोदी के लिए लोकप्रियता, क्षमता और भरोसे को जनादेश है, मगर इसमें नीतीश कुमार की नाकामी भी एक बड़ी वजह है। एनडीए गठबंधन से अगल होना और धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर मोदी को कोसना जनता दल यूनाइटेड (जेडीय) के लिए महंगा पड़ गया। मोदी सुनामी में आलम यह हो गया कि जेडीयू बिहार से लगभग साफ होने पर आग गई। अल्‍पसंख्‍यक वोटों की चाह और बीजेपी नेताओं पर जहरीले बाण नीतीश की राह में कांटे बोते चली गई। संभवत: नीतीश को इस बात का अंदाजा नहीं था कि मोदी के जनप्रभाव में उनका यह हश्र होगा। अब सबसे बड़ी मुश्किल उनके सामने बिहार में अपनी सत्‍ता को बचाए रखने की है। आलम यह है कि जेडीयू के अधिकांश विधायक इस समय बीजेपी में आने के लिए आतुर हैं। मोदी का विरोध संभवत: नीतीश के जीवन के लिए सबसे बड़ी गलती साबित होगी। सत्तारूढ़ नीतीश के नेतृत्व वाली जेडीयू के लोकसभा चुनावों में करारी हार के बीच राज्य सरकार गिरने की आशंका जताई जाने लगी है। अजित सिंह की अगुवाई वाले राष्‍ट्रीय लोकदल की हालत भी बुरी तरह खस्‍ता हो गई। पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के कुछ हिस्‍सो में प्रभाव वाले इस दल का भी सूपड़ा साफ हो गया। निश्चित तौर पर मोदी लहर में अजित सिंह कोई असर छोड़ पाने में कामयाब नहीं हो पाए।

वहीं, राष्‍ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव इस बार पूरा मंसूबा पाले हुए थे कि आधे बिहार पर उनका शासन होगा और 20 से अधिक सीटें उनके खाते में आएंगी। लेकिन मोदी लहर में आलम यह रहा कि उनकी बेटी मीसा भारती भी चुनाव हार गईं। चुनाव प्रचार के दौरान यादव और मुस्लिम समीकरण गांठने में लगे लालू को भी अंदाजा नहीं था कि मोदी की लहर में उनकी यह समीकरण भी ध्‍वस्‍त हो जाएगा। नीतीश की विफलता में अपनी सफलता ढूंढ रहे लालू के लिए भी बीजेपी नेता ने काफी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। अगले साल बिहार में विधानसभा के चुनाव होने हैं, ऐसे में लोकसभा चुनाव के ये नतीजे दर्शाते हैं कि मोदी की सुनामी में ये क्षत्रप उस समय बह जाएंगे।
दक्षिण के राज्‍य में भी मोदी की लहर देखने को मिली। हालांकि तमिलनाडु में बीजेपी के खाते में महज कुछ सीटें ही आईं लेकिन करुणानिधि की अगुवाई वाली डीएमके का पूरी तरफ सफाया हो गया। डीएमके को अब इस करारी पर नए सिरे से सोचना होगा क्‍योंकि उनके अस्तित्‍व पर ही सवालिया निशान लग गया।
क्षेत्रीय दलों को ये परिणाम अवश्‍य सोचने के लिए मजबूर करेंगे कि देश में राजनीति की दशा और दिशा बदलने लगी है। जनता की उपेक्षा करने वाले दलों के लिए भावी राजनीति में अपने लिए जगह बनाना अब आसान नहीं होगा। गुजरात में हुए विकास कार्यों में जनता अब अपने राज्‍य में बेहतर विकास का सपना देखने लगी है। वहीं, अपमानजनक हार से बुरी तरह आहत और हताश कांग्रेस ने भी स्वीकार कर ही लिया कि जनता से कटने का खामियाजा उन्‍हें भुगतना पड़ा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को भी इतने बड़े पतन की उम्मीद नहीं थी। कांग्रेस यह सोचने के लिए अवश्‍य मजबूर होगी कि परंपरागत राजनीति से परे हटकर अब उसे अब आत्मनिरीक्षण करने तथा रणनीति पर फिर से काम करने एवं मंथन करने की जरूरत है। कांग्रेस ही नहीं, देश के अनेक दलों के लिए बीजेपी की यह भारी जीत सोचने के लिए मजबूर करेगी, जिसका फायदा आगामी समय में जनता को ही मिलेगा। और श्रेय भी मोदी को भी जाता है।
मोदी का अब भारत का अगला प्रधानमंत्री बनना तय है लेकिन अगले पांच साल के कार्यकाल में चुनौतियां भी कम नहीं है। मजबूत शासन और अच्‍छे शासन की उम्‍मीद के बीच यह कयास लगाए जा रहे हैं कि मोदी सबसे शक्तिशाली बनकर उभरेंगे। यह उम्‍मीद भी लगाई जा रही है कि बीजेपी सरकार बनाने एवं अन्य अहम मुद्दों का हल निकालने में मोदी बेहतर प्रधानमंत्री साबित होंगे। हालांकि मोदी को शुरुआती कठिनाइयों, जैसे कैबिनेट में संतुलन और सहयोगियों से बेहतर तालमेल आदि मुश्किलें आएंगी पर यह भी उम्‍मीद है कि मोदी अब मौजूदा स्थिति में दुनिया भर में भारत की छवि को अवश्‍य मजबूत करेंगे।
चुनावी नतीजों से उत्साहित समूची देश की जनता अब सकारात्मक बदलाव की तरफ देखने लगी है क्‍योंकि उन्‍हें उम्‍मीद है कि मोदी के नेतृत्व में भारत अपना सही मुकाम हासिल करेगा और उनके लिए वाकई अच्‍छे दिन आएंगे।



First Published: Friday, May 16, 2014 - 18:57


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