नरेंद्र मोदी

Last Updated: Monday, March 31, 2014 - 18:33

प्रवीण कुमार
`अच्छा क्या है और बुरा क्या है उसे मतदाता भली-भांति समझता है। जब भी स्वतंत्र रूप से निर्णय करने का अवसर आता है, वह सभी चीजों को ध्यान में रखकर निर्णय करता है।`  भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने यह वक्तव्य दिसंबर 2012 में तब दिए थे जब उन्होंने तीसरी बार गुजरात की सत्ता संभाली थी। शायद मोदी को तभी भान हो गया था कि अब उन्हें मिशन-2014 के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस जैसी पार्टी से मुकाबला करने के लिए निकलना होगा। अनुमान सही निकला और फिर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी निकल पड़े कांग्रेस मुक्त भारत के राष्ट्रीय मिशन पर।
किसी जमाने में अपने बड़े भाई के साथ चाय की दुकान चलाने वाले नरेन्द्र भाई मोदी का जन्म दामोदरदास मूलचन्द मोदी व उनकी पत्नी हीराबेन मोदी के बेहद साधारण परिवार में उत्तरी गुजरात के मेहसाणा जिले के गांव वड़नगर में 17 सितंबर, 1950 को हुआ था। अपने माता-पिता की कुल छह सन्तानों में तीसरे नरेंद्र दामोदर दास मोदी खानपान से विशुद्ध शाकाहारी हैं।

कहते हैं कि 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान नरेंद्र मोदी ने एक किशोर स्वयंसेवक के रूप में रेलवे स्टेशनों पर सैनिकों की खूब आवभगत की। युवावस्था में ही वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई और तत्पश्चात वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। बाद में उन्हें संगठन की दृष्टि से भारतीय जनता पार्टी में संघ के प्रतिनिधि के रूप में भेजा गया। वड़नगर से स्कूली शिक्षा लेने के बाद गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। नरेन्द्र जब विश्वविद्यालय के छात्र थे तभी से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में नियमित रूप से जाने लगे थे। इस प्रकार उनका जीवन संघ के एक निष्ठावान प्रचारक के रूप में शुरू हुआ। गुजरात में शंकर सिंह वघेला का जनाधार मजबूत बनाने में नरेन्द्र मोदी की रणनीति को आज भी सराहा जाता है।
अप्रैल 1990 में जब केन्द्र में मिली जुली सरकारों का दौर शुरू हुआ, मोदी की मेहनत रंग लाई और गुजरात में 1995 के विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अपने बलबूते दो तिहाई बहुमत प्राप्त कर सरकार बना ली। इसी दौरान दो राष्ट्रीय घटनाएं इस देश में घटीं। पहली घटना थी सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की रथ यात्रा जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी के प्रमुख सारथी की भूमिका में नरेन्द्र मोदी का मुख्य सहयोग रहा। इसी प्रकार की दूसरी रथ यात्रा कन्याकुमारी से लेकर सुदूर उत्तर में स्थित कश्मीर तक की नरेन्द्र मोदी की ही देखरेख में आयोजित हुई। इन दोनों यात्राओं ने मोदी का राजनीतिक कद काफी ऊंचा कर दिया जिससे चिढ़कर शंकर सिंह वघेला ने पार्टी से त्यागपत्र दे दिया। तब केशुभाई पटेल को गुजरात का मुख्यमन्त्री बनाया गया और नरेन्द्र मोदी को दिल्ली बुलाकर भाजपा संगठन केन्द्रीय मन्त्री का दायित्व सौंपा गया।

1995 में राष्ट्रीय मन्त्री के नाते उन्हें पांच प्रमुख राज्यों में पार्टी संगठन का काम दिया गया जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। 1998 में उन्हें पदोन्नत कर राष्ट्रीय महामन्त्री (संगठन) का उत्तरदायित्व सौंपा गया। इस पद पर वे अक्तूबर 2001 तक काम करते रहे। भाजपा ने अक्तूबर 2001 में केशुभाई पटेल को हटाकर गुजरात के मुख्यमन्त्री पद की कमान नरेन्द्र मोदी को सौंप दी। नरेन्द्र मोदी अपनी विशिष्ट जीवन शैली के लिए राजनीतिक हलकों में जाने जाते हैं। उनके व्यक्तिगत स्टाफ में केवल तीन ही लोग रहते हैं। कोई भारी भरकम अमला नहीं होता। नरेंद्र मोदी एक लोकप्रिय वक्ता हैं जिन्हें सुनने के लिए बहुत भारी संख्या में श्रोता आज पहुंच रहे हैं।
गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए नरेंद्र मोदी ने पार्टी और अपने राज्य में बहुत लोकप्रियता हासिल कर ली। उन्हें एक प्रगतिशील नेता के रूप में पहचान भी मिली। जिस समय नरेंद्र मोदी को गुजरात का प्रभार सौंपा गया था, उस समय गुजरात आर्थिक और सामाजिक दोनों ही क्षेत्र में बहुत पिछड़ा हुआ था। नरेंद्र मोदी के प्रयासों से गुजरात ने उनके पहले कार्यकाल के दौरान ही सकल घरेलू उत्पाद में 10 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी दर्ज की जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। गुजरात के एकीकृत विकास के लिए नरेंद्र मोदी ने कई योजनाएं लागू की जिसमें पंचामृत योजना सबसे प्रमुख है।
जल संसाधनों का एक ग्रिड बनाने के लिए नरेंद्र मोदी ने `सुजलाम सुफलाम` नामक योजना का भी संचालन किया जो जल संरक्षण के क्षेत्र में बहुत प्रभावी सिद्ध हुई है। कृषि महोत्सव, बेटी बचाओ योजना, ज्योतिग्राम योजना, कर्मयोगी अभियान, चिरंजीवी योजना जैसी विभिन्न योजनाओं को भी नरेंद्र मोदी ने लागू किया।
2009 में एफडीआई पत्रिका ने सभी एशियाई देशों में से नरेंद्र मोदी को एफडीआई पर्सनैलिटी का खिताब प्रदान किया। वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट के दौरान अनिल अंबानी ने नरेंद्र मोदी को भारत के अगले नेता के रूप में संबोधित किया। गुजरात में आए भूकंप में राहत कार्य और आपदा प्रबंधन के सफल प्रयासों के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा नरेंद्र मोदी को योग्यता पत्र प्रदान किया गया।
नरेंद्र मोदी पर गुजरात दंगों में शामिल होने का आरोप है। जब तब उन्हें हिंदू-मुस्लिमों की आपसी भावनाओं को भड़काने और दंगों में प्रभावी कदम ना उठाने जैसे कई आरोपों का सामना करना पड़ता है। 27 फरवरी 2002 को अयोध्या से गुजरात वापस लौट कर आ रहे हिन्दू तीर्थयात्रियों को गोधरा स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में मुस्लिमों द्वारा आग लगाकर जिन्दा जला दिया गया। इस हादसे में 59 स्वयंसेवक भी मारे गये। रोंगटे खड़े कर देने वाली इस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप समूचे गुजरात में हिन्दू मुस्लिम दंगे भड़क उठे। मरने वाले लोगों में अधिकांश संख्या मुस्लिमों की थी। इसके लिए न्यूयॉर्क टाइम्स ने मोदी प्रशासन को जिम्मेवार ठहराया था। कांग्रेस सहित अनेक विपक्षी दलों ने नरेन्द्र मोदी के इस्तीफे की मांग की।
मोदी ने गुजरात की 10वीं विधान सभा भंग करने की संस्तुति करते हुए राज्यपाल को अपना त्यागपत्र सौंप दिया। राज्य में दोबारा चुनाव हुए जिसमें भाजपा ने मोदी के नेतृत्व में विधान सभा की कुल 182 सीटों में से 127 सीटों पर जीत हासिल की।

2007 में सोनिया के मौत के सौदागर वाले बयान को गुजरात की अस्मिता का सवाल बनाकर नरेंद्र मोदी ने वोटों की अच्छी फसल काटी और 49 प्रतिशत वोटों के साथ 117 सीटों पर जीत दर्ज कर एक बार फिर गुजरात में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। अप्रैल 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने विशेष जांच दल भेजकर यह जानना चाहा कि कहीं गुजरात के दंगों में नरेन्द्र मोदी की साजिश तो नहीं। यह विशेष जांच दल दंगे में मारे गए कांग्रेसी सांसद ऐहसान ज़ाफ़री की विधवा जकिया जाफरी की शिकायत पर भेजा गया था।
दिसम्बर 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी की रिपोर्ट पर यह फैसला सुनाया कि इन दंगों में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। आज नरेंद्र मोदी गुजरात में सत्ता का हैट्रिक बनाने के बाद देश के भावी प्रधानमंत्री की तरफ अपना कदम बढ़ा चुके हैं।



First Published: Monday, March 31, 2014 - 18:33


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