बिहार: 'महागठबंधन' की राजनीति और नए समीकरण

By Bimal Kumar | Last Updated: Monday, July 28, 2014 - 17:44
 
Bimal Kumar  

बिहार की राजनीति में हाल के समय तक धुर विरोधी रहे और एक-दूसरे को अक्‍सर कोसते रहने वाले दो दिग्‍गज नेता जब एक साथ आ जाएं तो इसे 'महागठबंधन' की राजनीति के दौर की ही शुरुआत कहेंगे। महागठबंधन शब्‍द से आशय यह है कि अभी तक दो या इससे अधिक दलों के बीच के गठजोड़ को गठबंधन नाम दिया जाता था। मामला जब राष्‍ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड के बीच का हो, तो स्‍वाभाविक तौर पर इन दोनों दलों के बीच की युति महागठबंधन ही कहलाएगी। इसे दूसरे शब्‍दों में यूं कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद देश भर की राजनीतिक फिजा कुछ ऐसी बदली और बदल रही है कि अधिकांश गैर भाजपाई दल (जिनकी बुनियाद ही एक-दूसरे के विरोध की थी) आपस में गलबहियां करने के लिए मजबूर हो चले हैं। यदि यह किसी मायने में ये राजनीतिक मजबूरी है तो यह 'मजबूरी का महागठबंधन' भी कहा जा सकता है।  

जिक्र योग्‍य है कि अगले माह बिहार में दस विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं। उपचुनाव की घोषणा के बाद से ही राज्य में सभी राजनीतिक दल जीत के लिए जोड़-तोड़ में जुट गए हैं, वहीं बिहार में नए समीकरण भी बनने लगे हैं। बीते लोकसभा चुनाव तथा विधानसभा चुनाव की तुलना में राज्य का मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य बदला हुआ है। मोदी दौर के बाद की राजनीति को भांपते हुए बिहार के दो दिग्‍गज राजनेता लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने आपस में हाथ मिलाने में ही अपनी भलाई समझी और साथ आने के फैसले को लेकर तनिक भी देर और हिचकिचाहट नहीं दिखाई। मई महीने में लोकसभा चुनाव के परिणामों ने दोनों नेताओं के माथे पर पसीना ला दिया और इन्‍हें अपने सूबे में राजनीतिक जमीन खिसकती नजर आई। अभी तक राजनीतिक इतिहास यही रहा है कि, अपनी राजनीतिक सरजमीं को लेकर उठते सवालों के बीच बड़े-बड़े सूरमा साथ आने में नहीं हिचकते हैं। तो फिर लालू और नीतीश भला क्‍यों हिचकें? भले ही ये दोनों नेता इस बात को भूल जाएं कि एक-दूसरे के विरोध पर ही इन दोनों नेताओं की बिहार में राजनीतिक जमीन तैयार हुई, मगर जनता इनके बीच गठबंधन को किस रूप में देखेगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। विदित है कि लालू के 'जंगलराज' का विरोध करके ही नीतीश कुमार ने बिहार में सत्‍ता की चाभी हासिल की थी। जनता भी लालू शासन के दौर से त्रस्‍त चुकी थी और नीतीश पर भरोसा कर उन्‍हें सूबे की सत्‍ता में बिठाया।

यह देखना भी दिलचस्‍प होगा कि इस महागठबंधन के बाद चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार और लालू प्रसाद जब एक मंच पर साथ दिखेंगे तो जनता की क्‍या प्रतिक्रिया होगी। इस पर भी नजरें रहेंगी कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद एक मंच से गंठबंधन के प्रत्याशियों के लिए जब वोट मांगेंगे, तो जनता जनार्दन इन्‍हें कौन सी कसौटी पर कसेगी। उनका रुझान इस महागठबंधन की तरफ होगा या फिर बीजेपी की अगुवाई वाले गठबंधन की तरफ।

जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस महागठबंधन में सीटों के बंटवारे पर मुहर लगने के बाद विधानसभा उपचुनाव में चार-चार सीटों पर जेडीयू और आरजेडी तथा दो सीटों पर कांग्रेस अपने उम्‍मीदवार खड़े करेगी। यह भी तय किया गया है कि सभी सीटों पर तीनों दलों के नेता प्रचार भी करेंगे। सूबे की राजनीति में यह एक अनोखा प्रयोग नजर आ रहा है। अनोखा इस मायने में कि जेडीयू अपने विचारधारा से समझौता करने के बाद आरजेडी और कांग्रेस के साथ आ खड़ी हुई है। और इसके मूल में वजह सिर्फ एक है, और वह बीजेपी का विरोध। यानी मोदी और बीजेपी के 'खौफ' ने इन दलों को इस कदर भयाक्रांत और आशंकित कर दिया कि इन्‍हें अपने लिए नया फॉर्मूला निकालने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसे में बिहार में इस महागठबंधन को समय की मांग कहा जाए या देश में अभी जो राजनीतिक हालत है, उस दृष्टिकोण से गोलबंदी।

केंद्र में एनडीए सरकार बनने के बाद भी महंगाई थमने का नाम नहीं ले रही है। महंगाई का असर रोजमर्रा के इस्‍तेमाल के अन्‍य चीजों पर भी है। जिससे लोगों को काफी दुश्‍वारियां पेश आ रही हैं। हालांकि, सूबाई चुनाव में स्‍थानीय मुद्दे ज्‍यादा हावी होते हैं, लेकिन महंगाई और भ्रष्‍टाचार को दरकिनार करना सत्‍तारूढ़ दल के लिए आसाना साबित नहीं होगा। इन हालात में बिहार में अगली सरकार बीजेपी अपने दम पर बनाएगी, यह अभी से कहना थोड़ी जल्‍दबाजी होगी।

हालांकि, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का गठबंधन आत्‍मविश्‍वास से लबरेज है चूंकि हालिया लोकसभा चुनाव में इस गठबंधन ने जीत का तगड़ा स्‍वाद चखा है। नरकटियागंज, राजनगर, जाले, छपरा, हाजीपुर, मोहिउद्दीनगर, परबता, भागलपुर, बांका और मोहनिया में ये उपचुनाव होने हैं। हालांकि ये दस सीटों के लिए उपचुनाव है, मगर इसके परिणाम अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव की तस्वीर भी साफ कर देंगे। पिछले विधानसभा चुनाव में चुनाव में इन दस सीटों में से छह पर बीजेपी, तीन पर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और एक पर जनता दल (यूनाइटेड) की जीत हुई थी।

इस चुनाव में जहां बीजेपी को लोकसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत को दोहराने की चुनौती होगी, वहीं जेडीयू के आरजेडी के साथ नई दोस्ती की भी परीक्षा होगी। आरजेडी और जेडीयू का चुनावी तालमेल ऐसा बन गया है कि इन पर विशेष तौर पर निगाहें टिकी होंगी। इतना तय है कि इस उपचुनाव में राजनीतिक समीकरण अवश्‍य बदलेंगे। एक ओर जहां जेडीयू और आरजेडी के लिए लोकसभा के परिणाम को सुधारने का मौका होगा, वहीं बीजेपी के समक्ष लोकसभा चुनाव के परिणाम बनाए रखने की कड़ी चुनौती होगी।

सवाल यह भी उठता है कि बिहार में अब तक कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू का शासन देखने के बाद जनता क्‍या बीजेपी की अगुवाई वाले गठबंधन को मौका देती है। ये भी देखना होगा कि बिहार के दो धुर विरोधी साथ आकर नए गठबंधन का प्रयोग कर रहे हैं तो बिहार की जनता इन्‍हें किस रूप में स्‍वीकार करती है।

एक्सक्लूसिव

First Published: Monday, July 28, 2014 - 17:43


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