अमित शाह: बीजेपी के नए 'शहंशाह'

By Bimal Kumar | Last Updated: Thursday, July 31, 2014 - 21:05
अमित शाह: बीजेपी के नए 'शहंशाह'

बिमल कुमार

नरेंद्र मोदी के अत्‍यंत करीबी और पार्टी के वरिष्‍ठ नेता अमित शाह को भारतीय जनता पार्टी की कमान आखिरकार सौंप दी गई। हाल में हुए लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में अभूतपूर्व जीत हासिल करने के बाद बीजेपी ने उस जीत के मुख्य रणनीतिकार और सूत्रधार रहे अमित अनिलचंद्र शाह यानी अमित शाह की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी कर दी। महज 50 साल की उम्र में भारतीय जनता पार्टी का मुखिया बनना किसी असंभव से कम नहीं, लेकिन शाह ने इसे मुमकिन कर दिखाया।

चुनावी रणनीति और कुशल प्रबंधन में माहिर माने जाते शाह के मुकाबले अध्यक्ष पद की रेस में पार्टी के महासचिव जेपी नड्डा और गुजरात के प्रभारी ओम माथुर काफी पीछे छूट गए। राजनाथ सिंह के मोदी सरकार में केंद्रीय गृह मंत्रालय का प्रभार संभालने के बाद ही बीजेपी के नए अध्‍यक्ष को लेकर रेस तेज हो गई थी। बीते कई दिनों से इस पद को लेकर पार्टी के अंदर भारी मशक्‍कत हुई। आखिरकार संघ, मोदी व अन्‍य वरिष्‍ठ नेताओं की सहमति के बाद अमित शाह के  बीजेपी का नया 'शहंशाह' बनने का रास्‍ता प्रशस्‍त गया। राजनैतिक रूप से सौम्य शाह ने पार्टी का सबसे युवा अध्यक्ष बनकर इतिहास लिख दिया। हालांकि, इससे पहले तक बीजेपी के अध्यक्ष पद पर शुरुआत से अब तक सिर्फ वरिष्ठ नेताओं की ही नियुक्ति हुई है।

शाह को बीजेपी का नया अध्यक्ष बनाया जाना पार्टी के इस प्रमुख चुनाव रणनीतिकार के लिए एक असाधारण और तेज प्रगति है। अमित शाह ही वह रणनीतिकार हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में पार्टी के लिए अभूतपूर्व जीत की पटकथा लिखी। अब शाह के बीजेपी अध्‍यक्ष बनने के बाद ऐसा संयोग भी बना है कि प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी के प्रमुख दोनों एक ही राज्य यानी गुजरात से संबंध रखते हैं। शाह ने गुजरात भाजपा के मजबूत नेता से राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का मुख्यिा बनने तक में एक साल से भी कम समय लिया। आरएसएस से जुड़े रहे शाह ने अपने राजनीतिक जीवन में जो सफलता अर्जित की हैं, वह उनकी कड़ी मेहनत का नतीजा है। इसमें कोई संशय नहीं है कि शाह ने अपने नेतृत्व क्षमता का शानदार परिचय देते हुए बहुत कम समय में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। इन्हीं अभूतपूर्व और संगठनात्मक क्षमताओं के कारण वे पार्टी के एक समर्पित कार्यकर्ता से राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए। पार्टी के कई वरिष्‍ठ नेता भी इस बात को मानते हैं कि मोदी के नेतृत्व में जहां देश विकास की नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है, वहीं शाह के नेतृत्व में बीजेपी के संगठन को एक नई दिशा मिलेगी।

हाल के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी यूं कहें कि बीजेपी के 272 प्लस मिशन को कामयाब बनाने में अमित शाह की बड़ी भूमिका रही। केंद्र की सत्ता में बीजेपी को बादशाहत दिलाने का सेहरा भले ही मोदी के सिर बंधा, मगर यह भी सच है कि अमित शाह के बिना पार्टी के लिए इतनी भारी कामयाबी संभव नहीं होती। इसे अमित शाह का बेहतर चुनाव प्रबंधन और दूरदर्शिता कहें, जिसकी बदौलत एक मुश्किल लक्ष्य आसान बन गया। शाह की ताजपोशी के पीछे बीजेपी का विचारधारात्मक आधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी मानना था कि सरकार गठन के कारण पार्टी संगठन किसी सूरत में कमजोर नहीं होना चाहिए। संघ ने पूरा भरोसा शाह के ऊपर दिखाया है, ऐसे में यह उम्‍मीद की जा रही है कि उनके नेतृत्व में बीजेपी मजबूती के साथ और आगे बढ़ेगी। वैसे भी शाह ने पूरे देश में संगठन की मजबूती में अहम भूमिका निभाई है। खासकर पर उत्तर प्रदेश में बीजेपी को जो ऐतिहासिक बहुमत लोकसभा चुनाव में मिला, उसमें शाह का योगदान खासा अहम है। इन चुनावों में शाह यूपी के प्रभारी थे, जहां बीजेपी को 80 में से 71 सीटें हासिल हुईं और पार्टी ने नया इतिहास रच डाला। आंकड़ों पर गौर करें तो बीजेपी ने अपने राजनीतिक इतिहास में उत्तर प्रदेश में ऐसी अपार सफलता अब तक नहीं पाई थी।

विवादास्पद परिस्थितियों में पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी के पद से हटने के बाद राजनाथ ने यह पदभार संभाला था और अब उनकी जगह शाह पार्टी अध्यक्ष बने हैं। संसदीय बोर्ड ने अमित शाह के नाम पर सर्वसम्मति से मुहर लगाई है। राजनाथ सिंह भी यह कहने से नहीं चूके कि शाह के पास विचारों की भरमार है और उनकी संगठनात्मक और प्रबंधन की क्षमताएं बेमिसाल हैं। हालांकि शाह का राजनीतिक जीवन कुछ विवादों के चलते भी चर्चित रहा। शाह गजरात में गृह राज्यमंत्री भी रह चुके हैं और नारानपुरा से बीजेपी विधायक हैं। शाह सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति फर्जी मुठभेड़ मामले में आरोपी रहे और जेल में भी कुछ समय बिता चुके हैं। सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले के बाद शाह के समक्ष काफी मुश्किलें खड़ी हो गई थीं। इस समय दोनों ही मामलों में शाह को क्लीनचिट मिल चुकी है।

अस्‍सी के दशक में गुजरात की सियासत में मोदी के सफर के साथ ही अमित शाह के राजनीतिक कैरियर का भी आगाज हुआ। मोदी की सिफारिश पर ही उन्हें बाद में बीजेपी में शामिल किया गया। वहीं, बाद के समय में शाह की बदौलत ही गुजरात की सियासत में मोदी का कद निरंतर मजबूत होता गया। साल 2002 के गुजरात चुनाव में शाह ने सरखेज सीट से पहली बार विधानसभा में कदम रखा और सूबे में मोदी सरकार में गृह राज्यमंत्री समेत कई अहम मंत्रालयों का जिम्मा बखूबी संभाला। मोदी से अमित शाह की पहली मुलाकात अहमदाबाद में लगने वाली संघ की शाखाओं में हुई थी। बचपन से ही दोनों नेता इसमें जाया करते थे। मोदी एक बेहद सामान्य परिवार से आते थे, वहीं शाह गुजरात के एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखते थे।
 
नब्बे के दशक में अमित शाह के राजनीतिक जीवन में सबसे बड़ा मौका उस समय आया, जब साल 1991 में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए गांधीनगर का रुख किया।  उस समय शाह ने मोदी के सामने आडवाणी के चुनाव प्रबंधन की कमान संभालने की इच्छा जाहिर की थी। शाह का दावा था कि वे अकेले बेहतर तरीके से पूरे चुनाव की जिम्मेदारी संभाल सकते हैं। बाद में आडवाणी की उस सीट के चुनावी प्रबंधन की पूरी कमान शाह को सौंप दी गई। नतीजा यह हुआ कि आडवाणी उस चुनाव में भारी मतों से जीते। आडवाणी की इस जीत में अमित शाह की काबिलियत की बहुत बड़ी भूमिका थी। इस चुनाव के बाद से ही शाह का कद गुजरात की राजनीति में बढ़ता चला गया। वहीं, अटल बिहारी वाजपेयी ने जब गुजरात से लोकसभा का चुनाव लड़ा तो उसकी पूरी जिम्मेदारी फिर से अमित शाह को ही सौंपी गई। इस चुनाव में भी शाह ने अपनी क्षमता को पूरी तरह साबित किया। बाद के दिनों में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्‍ण आडवाणी के आशीर्वाद और मोदी के वरदहस्त ने शाह के राजनीतिक सपनों को उड़ान दे दी।

शाह की रणनीतिक क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गुजरात की सहकारी संस्थाओं पर यदि आज बीजेपी का कब्जा है तो वो शाह के कारण ही है। उन्‍होंने ही अपनी काबिलियत और प्रबंधन से कांग्रेस को वहां से उखाड़ फेंका, जहां उसका दशकों से कब्जा था। चुनावी राजनीति में माहिर अमित शाह के नाम एक हैरतअंगेज रिकॉर्ड भी दर्ज है कि उन्‍होंने अपने जीवन में अभी तक कुल 42 छोटे-बड़े चुनाव लड़े, लेकिन उनमें से एक में उन्होंने हार का सामना नहीं करना पड़ा। अमित शाह का जन्‍म व्‍यवसायी अनिलचंद्र शाह के घर 1964 में हुआ। उन्होंने बायोकेमेस्ट्री में बीएससी तक शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद पिता के व्‍यवसाय से जुड़ गए। बाद में उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जरिये बीजेपी में प्रवेश किया। उन्हें भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में विशेष आमंत्रित सदस्य भी बनाया गया। फिर वह आरएसएस से जुड़े और उसके साथ ही बीजेपी के सक्रिय सदस्‍य भी बन गए। बाद के दिनों में गुजरात के विभिन्‍न राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद शाह बहुत जल्‍द मोदी के सबसे करीबी बन गए। शाह अहमदाबाद के सरखेज विधानसभा क्षेत्र से लगातार चार बार से विधायक हैं। 2002 में जब बीजेपी ने मोदी के नेतृत्व में राज्य की 182 में से 126 सीटें जीतीं, तो शाह ने सबसे अधिक 1.58 लाख वोटों से चुनाव में जीतने का रिकॉर्ड बनाया। हालांकि बाद के चुनाव में उनकी जीत का अंतर और बढ़ गया। उनके ऊपर कई तरह के आरोप लगे लेकिन वे हर मौके पर इन सभी आरोपों को अपनी सूझबूझ से झुठलाते गए।  

हालांकि, शाह के लिए आने वाले समय में चुनौतियां कम नहीं हैं। यह दीगर है कि उन्‍होंने अब तक सभी चुनौतिओं से अपनी सूझबूझ और लगन के जयिरे बड़ी आसानी से पार पाया और कामयाबी हासिल की है। बतौर पार्टी अध्‍यक्ष अब उनके सामने कुछ राज्‍यों में होने वाले विधानसभा चुनाव एक नई चुनौती होगी।

यह विदित है कि चुनाव प्रबंधन और रणनीति बनाने में शाह का कोई मुकाबल नहीं है। शाह आज जिस तरह पार्टी के शीर्ष पद पर पहुंचे हैं, उससे उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं। हालांकि शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन उम्मीदों पर खरा उतरने की होगी। हालांकि अमित शाह को अध्‍यक्ष बनाकर बीजेपी ने फिर से अपना विश्वास जताया है। इस फैसले से निश्चित ही बीजेपी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और इस बीत की उम्‍मीद की जाने लगी है कि आने वाले समय में शाह के नेतृत्‍व में बीजेपी संगठनात्‍मक तौर पर नई ऊंचाइयों को छुएगी।

एक्सक्लूसिव

First Published: Wednesday, July 9, 2014 - 17:32


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