परंपरा के नाम पर भी ना हो क्रूरता

Last Updated: Tuesday, June 17, 2014 - 16:10
परंपरा के नाम पर भी ना हो क्रूरता

 अवधेश कुमार मिश्र
 

अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के.एस. राधाकृष्णन और पिनाकी चंद्र घोष की पीठ ने पशुओं के ऊपर होने वाली क्रूरता पर बंदिश लगाने वाला एक अहम फैसला सुनाया है। मामला तमिलनाडु और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में होने वाली जल्लीकट्टू प्रतियोगिता का है जो परंपरा के तौर पर सदियों से चली आ रही है। जनवरी से जून तक चलने वाले जल्लीकट्टू आयोजन में एक अनियंत्रित बैल को भीड़ के बीच छोड़ा जाता है और उसे काबू करने की जद्दोजहद घंटों तक चलती है। इस खतरनाक खेल में बैलों को भयंकर पीड़ा और कई बार गंभीर चोटों का सामना करना पड़ता है। यही नहीं इस खेल में अब तक सैकड़ों लोगों की जानें भी जा चुकी है।

इस प्रतियोगिता को रोमांचक बनाने के लिए बैल को पहले गुस्से में लाया जाता है, और इस काम के लिए बैल को कई घंटो तक बिना खाना-पानी के रखा जाता है, उसे संकरी गलियों में दौड़ाया जाता है और आक्रामक बनाने के लिए कई तरह से प्रताड़ित किया जाता है। जल्लीकट्टू के इसी पीड़ादायी पक्ष पर बंदिश लगाने के लिए कई संगठन लंबे समय से आंदोलनरत थे और इस परंपरा का विरोध कर रहे थे। जबकि दूसरी तरफ हर विरोध को दरकिनार कर तमिनलनाडु सरकार ने 2009 में जल्लीकट्टू को कानूनी जामा पहना दिया और इस खेल के संचालन के लिए तमिलनाडु रेग्युरेशन और जल्लिकट्टू एक्ट(टी.एन.आर.जे.) बना दिया।

जल्लीकट्टू के नाम हो रही क्रूरता पर रोक लगाने के लिए एनीमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया और पीपुल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स संस्था की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गई। याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि परंपरा के नाम पर जो क्रूरता हो रही है उसे तुरंत रोकने की ज़रूरत है। सर्वोच्च न्यायालय ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया और तमिलानाडु रेग्युलेशन ऑफ जल्लिकट्टू एक्ट 2009 को भी अवैध घोषित कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि तमिलनाडु रेग्युलेशन ऑफ जल्लिक्ट्टू एक्ट, प्रिवेन्शन ऑफ क्रुएलिटी टू एनिमल्स एक्ट(पी.सी.ए.) का विरोधाभासी है जो कि एक कल्याणकारी एक्ट है। साथ ही टी.एन.आ.जे एक्ट संविधान के अनुच्छेद 254(1) का उल्लंघन करता है, लिहाज़ यह अवैध है। दरअसल संविधान के अनुच्छेद 254(1) में प्रावधान है कि अगर समवर्ती सूची में शामिल किसी विषय को लेकर केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कानून और राज्य विधानमंडल के कानून में कोई विरोधाभास आ जाए, तब केंद्र सरकार का कानून ही प्रभावी माना जाता है और इसी आधार पर टी.एन.आर.जे को अवैध घोषित कर दिया गया।

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि संसद से अपेक्षा है कि पी.सी.ए. एक्ट में आवश्यक संशोधन किया जाए और पशुओं पर क्रूरता के मामले में उचित दंड का प्रावधान हो। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह माना है कि 1960 में बनाए गए पी.सी.ए एक्ट में जिन दंडों का प्रवाधान है वह अपर्याप्त है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद एक उम्मीद जागी है कि कम से कम अब पशुओं पर होने वाली क्रूरता को रोकने के लिए ठोस कदम उठाया जाएगा। अब नज़रें देश की नई सरकार पर है जिससे यह अपेक्षा है कि  पी.सी.ए. एक्ट में ज़रूरी और सशक्त ससंशोधन किए जाएंगे और इस फैसले को केवल जल्लीकट्टू ही नहीं बल्कि विस्तृत परिप्रेक्ष्य में हर तरह की क्रूरताओं को ध्यान में रखते हुए दंड का प्रावधान किया जाएगा।

(लेखक ज़ी मध्यप्रदेश/छत्तीसगढ़ में एसिस्टेंट प्रोड्यूसर हैं)

एक्सक्लूसिव

First Published: Tuesday, June 17, 2014 - 16:06


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