इमोशनल कार्ड : मोदी बनाम राहुल

Last Updated: Saturday, October 26, 2013 - 17:57

वासिंद्र मिश्र
संपादक, ज़ी रीजनल चैनल्स

भारत में सियासत भावनाओं का खेल है। सियासतदान ये अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें कब क्या बोलना है और कितना बोलना है। हालांकि चीजें इस पर निर्भर करती हैं कि कैसे बोला गया। इसे समझना थोड़ा आसान हो जाएगा अगर आप राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के हाल ही में दिए गए भाषणों पर नज़र डालेंगे।
पांच राज्यों में चुनाव की घड़ी है। विधानसभा चुनावों को लेकर पार्टियां अपने-अपने तरीकों से वोटर्स को लुभाने में लगी हैं। विधानसभा चुनाव की बिसात पर लोकसभा चुनाव के सियासी दांवपेंच की बुनियाद खड़ी की जा रही है। इन सबके बीच देश की दो मुख्य पार्टियों के दो बड़े नेताओं की धड़ाधड़ रैलियां हो रही हैं। इन रैलियों में खास है इनका भाषण। नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों नेता अपनी परंपरागत स्टाइल से हटकर भाषण दे रहे हैं। हाव-भाव नहीं बदले हैं, लेकिन भाषण में मुद्दों की जगह इमोशन ने ले ली है। कल तक विकास की, युवाओं की बात करने वाले राहुल गांधी आजकल भावनाओं में बहते हुए दिख रहे हैं, वहीं नरेंद्र मोदी भी इमोशन का सहारा ले रहे हैं, लेकिन परोक्ष रूप से।
याद कीजिए 2012 का विधानसभा चुनाव और उस वक्त के राहुल गांधी के तेवर। कभी एक कागज के पुर्जे को समाजवादी पार्टी का प्रतीकात्मक घोषणा पत्र जताते हुए फाड़कर फेंकना तो कभी भट्टा पारसौल से अलीगढ़ के टप्पल तक की पदयात्रा करना। हालांकि इसका जो नतीजा हुआ वो भी आपके सामने है, एसपी का घोषणा पत्र ही उसके काम आया और सत्ता मिल गई। जिस अलीगढ़ तक राहुल ने पदयात्रा की, वहां की रैली में भी भीड़ जुटाने में स्थानीय कांग्रेसियों के पसीने छूट गए। ये सब इसीलिए कि क्या गुजरे दौर के इन्हीं वाकयों ने राहुल को समझदार बना दिया है, या फिर राहुल भावनात्मक वार करके कुछ और साधना चाहते हैं? आखिर राहुल की बदली रणनीति का मतलब क्या है ?
राहुल गांधी ने अपनी रणनीति बदल ली है, उनके भाषण इस बात की तस्दीक कर रहे हैं। अलीगढ़ और रामपुर की रैलियों में राहुल ने खाद्य सुरक्षा बिल पर चर्चा के दौरान सोनिया गांधी की बीमारी की बात की तो चुरु में एक कदम आगे बढ़कर खुद की जान को खतरा बता दिया। इंदौर में परिवार की चर्चा करने से बचे तो भावनाओं की रौ में बहने से खुद को नहीं रोक पाए। वहां उन्होंने पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई के मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित युवकों के लगातार संपर्क में होने की बात कह डाली। अपने इस बयान से भले ही राहुल गांधी विरोधी पार्टी पर देश की छवि खराब करने और गलत रणनीतियों से देश की सुरक्षा को खतरे में डालने का आरोप लगाना चाहते थे, लेकिन उनके इस बयान ने विरोधियों को उन पर कई आरोप लगाने का मौका दे दिया है।

ऐसे में सवाल ये उठते हैं कि क्या राहुल और उनके रणनीतिकारों को ऐसे सियासी हमलों का अंदाजा नहीं है? दरअसल ऐसा सोचना सही नहीं होगा। चुनावी मुहिम के लिए ये राहुल की नई रणनीति है, जिसमें परिवार की दुहाई भी है, कुर्बानी की दलीलें भी हैं, सुरक्षा का आश्वासन भी है और गांधी परिवार की विरासत की हनक भी है। मुजफ्फरनगर हिंसा को लेकर राहुल का बयान भी इसी की एक मिसाल भर है। हालांकि राहुल के भावनाओं से भरे ये बयान भी विरोधियों को रास नहीं आ रहे। विरोधी पार्टियां देश में गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों की दुहाई देते हुए राहुल के भावुक बयानों की बखिया उधेड़ रहे हैं, लेकिन क्या सियासत में जनता को खुद से जोड़ने के लिए भावनाओं का घालमेल सिर्फ ‘शहज़ादे’ यानी राहुल गांधी ही कर रहे हैं?
झांसी में नरेंद्र मोदी खुद को पिछड़े वर्ग का और चाय वाला बताकर क्या आम लोगों की भावनाओं से जुड़ने की कोशिश नहीं कर रहे। क्यों नरेंद्र मोदी राहुल से कह रहे हैं कि किसी कौम पर इल्जाम लगाने के लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए या फिर क्यों नरेंद्र मोदी सिख दंगों के आरोपियों को बचाए जाने की दुहाई दे रहे हैं। यहां ये भी याद रखना होगा कि ये वही नरेंद्र मोदी हैं जिनके हाईटेक भाषणों में जीडीपी, पर कैपिटा इनकम, ग्रोथ रेट और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसी चीजों की बात हुआ करती थी। क्या ये भावनाओं के आधार पर परोक्ष रूप से वर्ग विशेष की दुखती रग को सहलाने की कोशिश नहीं है?
ऐसा नहीं है कि भावनात्मक आधार पर राजनीति सिर्फ गांधी परिवार या कांग्रेस पार्टी ही करती है। भारत के करोड़ों भावुक लोगों के जज्बातों से खेलने में भारतीय जनता पार्टी सहित बाकी दल भी पीछे नहीं हैं। ये सच है कि आज़ादी के बाद गांधी परिवार से हटकर अगर किसी राजनेता के प्रति आम जनता में, दलीय भावना से ऊपर उठकर सर्वाधिक सम्मान और श्रद्धा रही है तो वो अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति रही है। भारतीय जनता पार्टी के कर्णधारों को इस सच्चाई का भरपूर अहसास है और शायद इसीलिए दिली तौर पर उनके अपमान का अरमान पाले बीजेपी के तमाम बड़े नेता, खुले तौर पर अपनी जनसभाओं में अटल बिहारी वाजपेयी की फोटो लगाकर जनता से समर्थन की गुहार लगाते दिखाई दे रहे हैं।
बीजेपी के इतिहास और मौजूदा कद्दावर नेताओं के पुराने बयानों पर नज़र डालें तो अटल जी की आलोचना पार्टी के अंदर रहते हुए भी कई बार देखने और पढ़ने को मिली थी लेकिन चुनावी मौसम में जब साख, छवि, स्टेट्समैन और कुशल प्रशासक के धनी व्यक्ति की जरूरत पड़ती है, तो अटल जी के बगैर बीजेपी का काम नहीं चल रहा।



First Published: Saturday, October 26, 2013 - 17:57


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