गांधी परिवार नहीं बल्कि एक विचारधारा

देश के सबसे बड़े राजनीतिक खानदान कहे जाने वाले गांधी परिवार के नाम से अक्सर लोग ये गफलत पाल लेते हैं कि शायद गांधी की विरासत से इस परिवार का कोई ताल्लुक है। ये एक ऐसा सवाल है जिस पर हमेशा से ही चर्चा से परहेज किया जाता है लेकिन देश की जनता के सामने ये सच आना जरूरी है कि आखिर गांधी परिवार का वाकई गांधी से कोई रिश्ता है भी या नहीं और क्या इस परिवार ने गांधी के सरनेम से जुड़े आदर्शों का पालन किया है।

Updated: Jun 13, 2014, 07:30 PM IST
गांधी परिवार नहीं बल्कि एक विचारधारा

निहारिका माहेश्वरी
एंकर/प्रोड्यूसर/ज़ी मीडिया

देश के सबसे बड़े राजनीतिक खानदान कहे जाने वाले गांधी परिवार के नाम से अक्सर लोग ये गफलत पाल लेते हैं कि शायद गांधी की विरासत से इस परिवार का कोई ताल्लुक है। ये एक ऐसा सवाल है जिस पर हमेशा से ही चर्चा से परहेज किया जाता है लेकिन देश की जनता के सामने ये सच आना जरूरी है कि आखिर गांधी परिवार का वाकई गांधी से कोई रिश्ता है भी या नहीं और क्या इस परिवार ने गांधी के सरनेम से जुड़े आदर्शों का पालन किया है।

गांधी जी को हम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनेता और आध्यात्मिक नेता कह सकते हैं। स्वच्छ सियासत और सामाजिक प्रगति के लिए अहिंसा के सिद्धांतों का पालन करने वाले गांधी ने जिस तरह से सत्याग्रह और शांति के पथ पर चलते हुए अंग्रेज़ों को भारत थोड़ने पर मजबूर किया उसका शायद ही कोई उहादरण इतिहास में मिलता हो। सादा जीवन उच्च विचार के रास्ते पर चलने वाले मोहनदास करमचंद गांधी को आज समूचा देश पूरी श्रद्धा के साथ महात्मा या बापू कहता है लेकिन बदलते दौर में यह समझने की ज़रूरत है कि गांधी के व्यक्तित्व, उनके विचार उनके सिद्धांत उनके जीवन दर्शन को कितना समझकर आज तथाकथित जनप्रतिनिधि भारत को आगे ले जाने की बात कर रहे हैं।
 
परिवारवाद जातिवाद क्षेत्रवाद वोटबैंक की राजनीति से लबरेज़ आज के सियासतदान चुनावी मौसम में बापू के नाम का इस्तेमाल तो करते हैं लेकिन वो गांधीवादी विचारधारा और विरासत को समझना तो दूर वो उनकी राह पर एक कदम तक नहीं बढ़ा पाएं हैं। गांधी जी के कुछ सिद्धातों पर गौर करें तो बापू कहते हैं कि अहिंसा ही एकमात्र शक्ति है जिससे हम शत्रु को अपना मित्र बना सकते हैं। सीखें उस प्रकार जैसे आपको सदा जीवित रहना है। अधिकांश लोगों का सिद्धांत तक काम नहीं करता जब मौलिक बातों का अंतर इसमें शामिल हो आजादी का कोई अर्थ नहीं अगर इसमें गलतियां करने की आज़ादी शामिल न हो व्यक्ति अगर समाजसेवा में कार्यरत है तो इसे साधारण जीवन की ओर ही बढ़ना चाहिए।
 
गांधी जी के इन विचारों में लबा इतिहास है और इसके विभिन्न समुदायों में बहुत सी अवधारणाएं हैं पर दुख की बात यह है कि इन विचारों से कौसों दूर गांधी सरनेम का इस्तेमाल करने वाले एक तरफ जहां अपने आप को गांधी की बौद्धिक विरासत का उत्तराधिकारी दिखाने में पीछे नहीं वहीं चुनावी हवा के बीच गांधी सरनेम का मूल्यांकन परिवारवाद की कसौटी पर करने को आतुर दिखते हैं। असलियत यह है कि विचार के धरातल पर गांधी चिंतन को एक राजनैतिक ढाल बना चुके गांधी परिवार ने नकारा है। चर्चा का विषय यह भी है कि अखिर गांधी परिवार का वाकई गांधी से कोई वैचारिक रिश्ता है भी या नहीं। गांधी सरनेम की लोकप्रियता को भुनाने वाले गांधी परिवार के पास सत्ता तो रही लेकिन गांधी विचार पर चलकर जन मन पर पकड़ मज़बूत वो नहीं कर पाए इसके पीछे कारण यह है कि गांधी जी केवल विचार के लिए जिए, आदर्शों की उपासना की। दूसरे पर थोपने से पहले खुद पर अमल करने की कोशिशि की, शारीरिक रूप से दुर्बल लेकिन विचारों से मज़बूत गांधी दरअसल एक परिवार नहीं बल्कि एक विचार है और इसको सत्ता और पद के लिए खीचतान करने वालों को समझना काफी ज़रूरी है क्योंकि गांधी जी का एक विचार कहता है कि विचारों को थोपकर इसे राजनैतिक ढाल बनाने से पहले खुद पर प्रयोग करना ही गांधीवाद है।
 
जाहिर है सवाल कई हैं जो इस सच को जानने के बाद हर उस शख्स के मन में उठ सकते हैं जिसके लिए गांधी परिवार का मतलब राजनीतिक सरोकारों से ज्यादा रहा है क्योंकि नाम के साथ सियासत की सीढी चढना और बात है जबकि नाम के साथ न्याय करना और बात। सवाल यही कि क्या इंदिरा गांधी की पीढ़ियों के लिए गांधी सरनेम कहीं सिर्फ एक राजनीतिक ढाल भर तो नहीं।