सरकार बदलते ही राज्यपालों को देना चाहिए इस्तीफा : राम नाइक

By Vasindra Mishra | Last Updated: Friday, August 8, 2014 - 17:27
सरकार बदलते ही राज्यपालों को देना चाहिए इस्तीफा : राम नाइक

पेट्रोलियम मंत्रालय पर उद्योगपतियों का दबाव : राम नाइक

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और पूर्व पेट्रोलियम मंत्री राम नाइक राज्यपालों के तबादले और नियुक्तियों को लेकर कार्यक्रम 'सियासत की बात' में खुलकर अपनी बात रखी। इस दौरान उन्होंने ज़ी मीडिया के एडिटर (न्यूज़ ऑपरेशंस) वासिंद्र मिश्र के साथ खास बातचीत में राजनीति समेत कई मुद्दों से जुड़े सवालों के जवाब बेबाकी से दिए।  पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश:   

वासिंद्र मिश्र : नमस्कार आज हमारे खास मेहमान है उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रामनाइक जी...हम जानने की कोशिश करेंगे कि....सार्वजनिक जीवन में इतने लंबे समय तक रहते हुए...मंत्री के रूप में रहते हुए या कार्यकर्ता के रूप में या फिर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के राज्यपाल की भूमिका में ..इतनी अलग-अलग भूमिकाओं में रहते हुए खुद को बेदाग कैसे बनाए रखा...और हम कह सकते है कि उत्तर प्रदेश की विषम राजनीतिक परिस्थिति है...उसमें वो अपनी भूमिकाकिस हद तक और किस रूप में स्थापित करने का इरादा रखते हैं...महामहिम जी आपका बहुत-बहुत स्वागत है, इस समय देश में अचानक एक चर्चा शुरू हो गई है, सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ रहा है और संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी अपील की है खासतौर पर विश्व हिंदू परिषद से कि वो किसी ऐसे कार्यक्रम का आयोजन न करें जिससे सामाजिक सद्भाव बिगड़े..उत्तर प्रदेश एक लंबे समय तक इस सांप्रदायिक सद्भाव के बिगड़ने का शिकार रहा है..बहुत नुकसान हुआ है उसका। एक गर्वनर के नाते आप इसे किस रूप में देखते हैं...इस पूरी परिस्थिति को जो देश में बन रही है खासतौर पर उत्तर प्रदेश में..।

राम नाइक : मोटे तौर पर मुझे ऐसा लगता है कि सद्भाव और सद्भाव बना कर रखना ये अपनी देश की वैचारिक मूल परंपरा है। जब कोई संसद में जाता है तो संसद भवन पर एक बाहर संस्कृत श्लोक लगा है। वो ये कहता है। अयं निजपरोवैती, गणनाम लघु चेतसाम। ये मेरा, ये तेरा, इस प्रकार की सोच छोटे दिल वाले रखते हैं और दूसरी पंक्ति में उन्होंने कहा है कि उदार चरितानाम् तू वसुधेव कुटुंबकम। जिनका चरित्र उदार है...ऐसे लोगों के लिए सारी दुनिया एक परिवार जैसी है। मैं मानता हूं कि इस भारतीय विचार का पालन केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया में रहने वाले सभी लोगों को करना चाहिए। निश्चित तौर पर सद्भाव बनाकर रखना हर एक नागरिक की जिम्मेदारी है। साथ ही साथ कोई भी जनसंगठन हो ,चाहे सामाजिक स्तर पर हो, सांस्कृतिक स्तर पर हो या राजनीतिक स्तर पर हो, सभी को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि अपना व्यवहार ऐसा हो कि जिससे मित्रता बनी रहे। ऐसा व्यवहार नहीं रखना चाहिएजिससे समाज में कुछ त्रुटियां निर्मित हों। मैं ऐसा मानता हूं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हो या विश्व हिंदू परिषद या आपने मेरी पार्टी का नाम नहीं लिया..अब मैं भी उस पार्टी का नहीं रहा हूं...क्योंकि राज्यपाल बनने से पहले मैंने इस्तीफा दे दिया। राज्यपाल की भूमिका में पार्टी से ऊपर उठकर कार्य करने की आवश्यकता होती है और इस प्रकार का सद्भाव बनाए रखना हर किसी का काम है ऐसा मैं मानता हूं।

वासिंद्र मिश्र : राज्यपाल का एक रोल ये भी कि जहां संविधान के अनुरूप, संविधान की मर्यादा के खिलाफ, अगर कोई चुनी हुई सरकार या संस्था काम कर रही है तो संविधान की रक्षा के लिए अपनी तरफ से करेक्टिव एक्शन ले.. ये भी राज्यपाल के दायित्वों में आता है..ऐसी स्थित में जब लगातार धर्मांतरण की बातें आ रही हों..उत्तर प्रदेश से आ रही है..देश के अलग-अलग हिस्सों से पहले भी आती रही हैं..नॉर्थ इस्ट से  हों या फिर अब उत्तर प्रदेश में भी ऐसी चर्चाएं चल रही है.. पिछले 10-12 दिन से ऐसी बातें आ रही हैं...क्या आपने इस तरह की खबरों के आधार पर या जो चर्चाएं चल रही हैं उनके आधार पर उत्तर प्रदेश की सरकार से कोई बातचीत की है कोई जवाब-तलब किया है अभी तक..।
 
राम नाइक : देखिए..मैं तो यहां आया हूं 22 जुलाई को तो उसके बाद जो प्रमुख घटनाएं हुई हैं उसके बारे में, मेरा यहां के मुख्यमंत्री से लगातार संपर्क रहा है...उदाहरण के लिए मोहनलालगंज में जो बड़ी घटना हुई..एक महिला की हत्या हुई....उनके रिश्तेदार  मुझसे आ कर मिले..उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की ..साथ ही साथ उनको कुछ मुआवजा दिया जाए...बच्चों की पढ़ाई कराई जाए..इस तरह की मांग मेरे पास आई...ये मांग मैंने मुख्यमंत्री तक पहुंचाई इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री को मैंने अपनी तरफ से आग्रह भी किया कि ये जायज मांग है...अब जब  देखता हूं मैं कि मुख्यमंत्री  ने उनके परिवार के लिए 10 लाख रुपए की सहायता राशि देने के लिए मान लिया है...साथ ही साथ बच्चों की पढ़ाई के लिए भी कहा है.. उन्होंने 10 वीं कक्षा तक की पढाई के लिए कहा था..मैंने उनको सुझाव दिया कि पूरी शिक्षा का खर्चा वहन करना चाहिए.. इसके अलावा मुख्यमंत्री जी ने केंद्र सरकार के पास इस घटना की सीबीआई जांच के लिए भी आग्रह किया है....सहारनपुर में सिक्ख और मुस्लमानों में एक संघर्ष हुआ..कर्फ्यू लगा... वहां जांच करने की जो बात थी वह हुई..इस प्रकार  से जो महत्वपूर्ण घटनाएं होती है उस घटना के बारे में मुख्यमंत्री के साथ एक संवाद  हमने रखा है.. और मुझे लगता है कि राज्यपाल की भूमिका यही है ..कि ऐसी जो घटनाएं दिखाई देती हैं जनमानस जिसके कारण आंदोलित होता है... ऐसे आंदोलित जनमानस को सरकार की तरफ से एक योग्य प्रकार की दिशा दी जाए। ऐसा काम मैं करता हूं..करता रहूंगा।  

वासिंद्र मिश्र : महामहिम आपके सुझाव से या आपके संवाद के चलते मुख्यमंत्री ने तमाम करेक्शन किए हैं प्रशासनिक तौर पर.. चाहे मोहनलालगंज की घटना हो या और भी जो मुजफ्फरनगर या फिर बाकी घटनाएं हैं सहारनपुर की.. इस अनुभव के आधार पर ,क्या  धर्मांतरण की जो  बात चर्चा में आ रही है जिसको लेकर आपके केंद्र सरकार के कुछ मंत्रियों ने भी मांग की है कि उत्तर प्रदेश सरकार को इसकी जांच सीबीआई को सौंप देना चाहिए...क्या आप धर्मांतरण के सवाल पर भी मुख्यमंत्री से बात करेंगे।

राम नाइक : ऐसा है कि जो महत्वपूर्ण घटनाएं होती है उसके बारे में मैं लगातार संवाद बनाकर रखूंगा... और ये धर्मांतरण की घटना धर्मांतरण की घटना है कि नहीं है ये देखने की प्राथमिक जिम्मेदारी निश्चित तौर पर राज्य सरकार की है... और राज्य सरकार ने इस पर दखल दिया है ऐसा मैं मान रहा हूं और दखल देने के बाद योग्य रास्ता भी उनको निकालना चाहिए।

वासिंद्र मिश्र : महामहिम हम आप से ये जानना चाहते है कि आप सभी लोग एक लंबे समय तक सक्रिय राजनीति में रहे है और जब राज्यपालों की नियुक्ति हुआ करती थी, जब रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स को राज्यपाल बनाया जाता था तब आप सब विरोध किया करते थे, कहते थे कि राज्यपाल की कुर्सी है..राजभवन को राजनीति का अड्डा नहीं बनाया जाना चाहिए ..अब जो नई सरकार देश में आई है उन्होंने भी कुछ POLITICAL लोगों को राज्यपाल के पद पर नियुक्त किया है आप को भरोसा है कि जिस तरह से आप ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दिया, राज्यपाल बनने से पहले इस तरह बाकी लोग भी आप की तरह स्थापित...मानदंड का पालन करेंगे राज्यपाल की कुर्सी पर बैठ कर।

रामनाइक : संविधान में जो बातें कही गई हैं और राज्यपाल की जो भूमिका है...अगर राज्यपाल किसी को नियुक्त करना है और वो राजनीतिक पृष्ठिभूमि का है, अधिकारिक भूमिका का है..इसमें हम विवाद करते रहेंगे तो ऐसा व्यक्ति मिलना मुश्किल होगा। बात ये है कि कोई भी राज्यपाल की भूमिका निभाने की शपथ लेता है, जब संविधान की शपथ लेता है हाथ में रखकर...मैं संविधान के हिसाब से काम करूंगा...फिर वो राजनीति में हो... कोई अधिकारी हो.... कोई खिलाड़ी हो सबको उसके हिसाब से चलना चाहिए,,,,मुझे लगता है राजनीतिक लोगों को राज्यपाल नियुक्त करने की एक परंपरा है, वो परंपरा बन गई है और इसमे खराबी जैसा कुछ नहीं है.....बात सिर्फ इतनी है,,,नियुक्त होने के बाद उन्हें पार्टी के हितों के उपर उठकर काम करना चाहिए....मुझे जो सही लगा वो किया और मुझे ये लगता है कि बाकी के लोग भी उसके अनुसार अनुकरण करें....एक बात निश्चित है उसके बाद मुझे लगता है कि उसके बारे में गलतफहमी नहीं रखनी चाहिए । राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा होती है और राष्ट्रपति जो केंद्र कि चुनी हुई सरकार है उसके सलाह पर अपने विवेक के आधार पर राज्यपालों की नियुक्ति करते है ...इसलिए राजनीति में जो काम करता है वो अछूता हो गया या ब्यूरोक्रेसी में जो अच्छा काम किया अछूता हो गया...इस प्रकार की भूमिका बिलकुल नहीं है ।जिन्होंने दुनिया देखी है..जिन्होंने सरकार देखी है जिनका लोगों के साथ संबंध है .जो मेच्चोर हैं...ऐसे लोगों को ये पद देना योग्य है...और ये भी समझना चाहिए कि केवल परंपरा के लिए नहीं कि जब सरकार बदलती है तो राजनीतिक तौर पर इस तरह की नियुक्ति होती है इसमें कोई संदेह रखने की आवश्कता नहीं है क्योंकि जो केंद्र की सरकार है वो पार्टी की सरकार होती है ..और वो सरकार राष्ट्रपति को सलाह देती है और राष्ट्रपति उसके अनुसार काम करते है और इसलिए राजनीति में जो है उसको नियुक्त नहीं करना चाहिए ये बात विचार की दृष्टि से ठीक नहीं है ....करना तो ये चाहिए कि जब नियुक्ति करते समय वो कोई राजनीतिक पद का हो या ब्यूरोक्रेट्स पद का हो तो जब उसकी सरकार बदल जाती हो तो उसको स्वंय अपने पद से अलग हो जाना चाहिए... ऐसा होता रहा है ..जैसे राज्यपाल की नियुक्ति के बारे में है वैसे केंद्र में प्लानिंग कमीशन के उपाध्यक्ष और प्लानिंग कमीशन के सभी सदस्यों को  भी अपने अपने पदों से इस्तीफादे देना चाहिए ...इन्होंने किया नहीं इसलिए ऐसा विवाद खड़ा हुआ।

वासिंद्र मिश्र : एक और बात है....आप हर चीज का सीधा जवाब दे रहे है तो आप से सीधा सवाल पूछा जा सकता है। क्षेत्रीयता के आधार पर पॉलिटिकल स्लोगन क्वाइन किए जाते है जो क्षेत्रीयता के आधार क्षेत्रीय राजनीति करते है उसको आप कहां तक जायज मानते है क्या वो देश के विकास के लिए उचित है।

रामनाइक : क्षेत्रीयता क्यों पनपती है या क्यों बढ़ती है देखना चाहिए...कई बार क्षेत्रीयता अन्याय की वजह से बढ़ती है..इसलिए अन्यायपूर्ण व्यवहार न रहे तो निश्चित तौर पर इस तरह की बात नहीं होगी..लेकिन क्षेत्र की भी कुछ विशेषता होती है और उस विशेषता के अनुरुप जैसे मैं महाराष्ट्र का हूं ...मराठी कहने बाद स्वभाविक तौर पर छत्रपति शिवाजी के बारे में मन में आदर होगा वही आदर होना चाहिए पश्चिम बंगाल के लोगों में वही आदर होना चाहिए, उत्तर प्रदेश के लोगों में भी ......लेकिन क्षेत्रीयता एक सीमा तक ही ठीक है। भाषा के आधार पर भी कई बातें आ जाती है अपना देश इतना बड़ा है और इतनी संपन्न भाषा है। संविधान भी कई भाषाओं को इस प्रकार की मान्यता देता है। संविधान भी पिछड़े हुए क्षेत्रों को विशेष अधिकार देने की बात करता है ...और इस भूमिका में यदि व्यवहार होता है तो मुझे लगता है कि क्षेत्रीयता नहीं बढ़ेगी ...लेकिन क्षेत्रीयता यदि लक्ष्मण रेखा का विचार करें  तो कुछ सीमा तक अच्छी भी होती है इसलिए क्षेत्रीयता का भी एक महत्व है....क्षेत्रीयता ,प्रादेशिक और देश का भाव इसको जोड़ते रहने का काम होना चाहिए ऐसा जब होता है तो किसी को राणा प्रताप के बारे में आदर होगा, किसी को गंगा के बारे में आदर होगा किसी को कृष्णा नदी के बारे में आदर होगा. गोदावरी के बारे में होगा अब ये जो गंगा का महत्व है..कृष्णा नदी का महत्व है एक तरह से देखा जाए तो क्षेत्र का है और दूसरी तरह से देखा जाए तो नहीं होगा ।इसलिए मुझे लगता है कि सबसे बड़ी चीज होती है समन्वय।

वासिंद मिश्र : उत्तर प्रदेश में लगभग दो दर्जन से ज्यादा यूनिवर्सिटीज हैं...और तमाम प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान भी हैं...लेकिन हायर एजूकेशन की स्थित देश की  बाकी राज्यों से बहुत अच्छी नहीं है..क्या कारण है? इसको ठीक करने के लिए एक राज्यपाल के नाते आप क्या प्रयास कर रहे हैं..किस तरह से।

राम नाइक : ऐसा है कि कुल मिलाकर  देश के उच्च शिक्षा की बात कहते आए हैं...तो उच्च शिक्षा की कई सुविधाएं अपने यहां है.... लेकिन उसके साथ ही साथ कुल मिलाकर विश्वविद्यालयों  का शिक्षा स्तर नीचे जा रहा है। ये विसंगति है लेकिन सच्चाई है। जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है..उत्तर प्रदेश में  जो उत्तर प्रदेश के कानून के तहत विश्वविद्यालय बने  हैं....24 बने हैं। उस कानून के तहत जो राज्यपाल होता है वहीं उनका चांसलर होता है, बाकी के वाइस चांसलर होते हैं.. कुलपति होते है...तो ये 24 विश्वविद्यालय जो हैं ऐसे विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के साथ अलग-अलग, लगभग आधा-आधा घंटा प्रत्येक से मैंने 6-7 दिन में बातचीत की और समझने की कोशिश की उनकी कौन सी कठिनाइयां है। सरकार के साथ उनकी कौन सी समस्या अब तक सुलझी नहीं है। उदाहरण के लिए ऐसा है कि कुछ पोस्ट सेक्शन करना है...तो पोस्ट सेक्शन नहीं हुए तो इसके कारण शिक्षकों की भर्ती नहीं हो रही है या रजिस्ट्रार मंजूर नहीं किया गया वैगरह-वैगरह.....और राजभवन के साथ भी कुछ समस्या है क्योंकि यूनिवर्सिटी के कामकाज में यदि कोई गलत बात होती है तो वाइस चांसलर निर्णय करेंगे...लेकिन उससे कोई नाराजगी है तो वह अपना अपील राज्यपाल से कर सकता है....राज्यपाल के पास भी इस प्रकार की कई बातें आती हैं।  तो ये दोनों अलग करके ...मैंने सबसे चर्चा की और हर एक को मैंने कहा सरकार के साथ जो बातें है उससे मुझे लिख कर  दीजिए...राज्यपाल के साथ जो जुड़ी हुई बातें हैं वो लिख कर दीजिए..  उनमें से चार बिंदु मैंने सामने रखें, पहला बिंदु ये था अभी की दृष्टि से कि क्या सभी के एडमिशन हो गए हैं या नहीं हुए हैं....जो परीक्षाओं के परिणाम आने थे वो अब भी कुछ विश्वविद्यालयों के नहीं आए हैं....मेरे पूर्व राज्यपाल जो जोशी जी थे उन्होंने एक सीमा डाली थी कि 30 जून तक सभी परीक्षाओं के परिणाम आने चाहिए... लेकिन वो नहीं आए हैं तो क्यों नहीं आए हैं...ये दूसरी बात। और तीसरी बात  प्ररीक्षा पास होने के बाद जो कॉन्वोकेशन होता है....मैंने देखा कि कुछ यूनिवर्सिटीज में दो-दो, तीन-तीन साल कॉन्वोकेशन नहीं होता है। मैंने तो सारी चर्चा के बाद उनको एक कलैंडर बना कर दिया है। 24 में से 3 यूनिवसिर्टिज नई हैं... तो वहां से डिग्री प्राप्त करने में समय लगेगा और 2 साल का.... बाकी के 21 को मैंने मेरे यहां से डेट दी है कि ये डेट पर आपका कॉन्वोकेशन होना चाहिए.... कोई कारण से आपको सुविधा नहीं होगी, तो दूसरा डेट जो होगी मुझे बता दीजिए....लेकिन जो मैंने 21 बताया है उसमे से कोई मत ले लो...ऐसा करके एक सुचारू ढंग से ...कॉन्वोकेशन के... आखिर विद्यार्थी पढ़ाई करता है 4 साल 5 साल , परीक्षा पास होता है..उसे सम्मान से जो डिग्रीज मिलनी चाहिए वो नहीं मिलती है विडंबना है.. इसमें सुधार किए जा सकते हैं....और शिक्षा का स्तर भी बढ़ाने की दृष्टि से जो आवश्यक चीजें है..इन सारी बातों को लेकर मैं मख्यमंत्री जी के साथ व्यक्तिगत चर्चा करुंगा और उसमें से रास्ता निकालूंगा .... मैंने उनको ये भी कहा है कि इस प्रकार  की बात मैं जानकारी ले रहा हूं.....और 15 अगस्त के बाद एक दफा बैठकर इसके विषय में  चर्चा करेंगे और केवल चर्चा नहीं निर्णय करने की कोशिश करेंगे।

वासिंद मिश्र : पेट्रोलियम मंत्रालय ऐसा मंत्रालय है, जिसके बारे में कहा जाता है कि औद्योगिक घराने तय करते हैं कि कौन पेट्रोलियम मंत्री होगा.. और जो पेट्रोलियम मंत्री कुछ चुनिंदा औद्योगिक घरानों के इशारे पर काम नहीं करता है...उसको मंत्रीमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। आप पेट्रोलियम मंत्री रहते हुए अपने को किस तरीके से बचा के रखे ...और क्या आपके जो मौजूदा पेट्रोलियम मंत्री हैं उनको नीजी तौर पर सरकार के हित में और देश के हित में कुछ वो मंत्र बताने की कोशिश करेंगे जिसके रास्ते पर चलकर आपने उस मंत्रालय को चलाया था।

राम नाइक : देखिए एक बात तो जानकारी के तौर पर, खुद का अहम बताने के लिए नहीं, 1963 में केमिकल्स, फर्टिलाइजर्स और पेट्रोलियम, ये तीनों विभाग का एक-एक मंत्रालय था... 1963 में पेट्रोलियम और नैसर्गिक अलग मंत्रालय बन गया.. और अभी हम 2014 में हैं, 51 साल हो गए हैं...51 साल में 5 साल जिसने पेट्रोलियम मंत्री करके काम किया है...वो अकेला आदमी एक ही है वो राम नाइक है....पहली बात मैं इसलिए बता रहा हूं  यहां बाजपेयी जी है..हम नीति निर्धारित करते थे और नीति निर्धारित करने के बाद... उसमें इमानदारी से प्रमाणिकता से काम करने की आवश्यकता थी.... आज अपनी इतनी बुरी परिस्थित है..हमारे समय पर 70 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करते थे... अब 80 प्रतिशत हो गया है..देश का उत्पादन जिस तरह से बढ़ना चाहिए था वो नहीं बढ़ा। और कच्चा तेल तो आना ही चाहिए...कारें चलनी चाहिए ट्रेन चलनी चाहिए..बिजली मिलनी चाहिए... इसलिए आयात करना पड़ रहा है...आयात करते समय बहुत पैसा देना पड़ रहा है.... और इस भूमिका में पेट्रोलियम की जो नीति अपनानी चाहिए, उसे ठीक से बनानी चाहिए और फिर उसे कार्यान्वयन करना चाहिए... मुझे ऐसा लगता है कि गए दस साल में ये बात नहीं हुई...चार पेट्रोलियम मंत्री हो गए.... जिसमें मणिशंकर अय्यर जैसे एक दृष्टि से देखा जाए तो विद्वान और फिर जिनको अच्छा ज्ञान है व्यापार का ऐसे मुरली देवड़ा जी पेट्रोलियम मंत्री थे, उनके बाद जयपाल  रेड्डी थे फिर मोइली जी थे..एक नीति न होने के कारण इस तरह की बातें होती हैं... मुझे ऐसा लगता है कि यदि ऐसा हो तो कोई तकलीफ नहीं है... देखिए देश में  कच्चे तेल का, गैस का उत्पादन बढ़ाना चाहिए...सीधे नजर से यदि हम काम करते हैं... और ये दबाव की जो बात है न, अलग-अलग प्रकार के लोग अलग-अलग प्रकार  से देखते हैं... मुझ पर किसी ने कोई दबाव नहीं डाला...क्योंकि वो भी जानते थे कि ऐसे दबाव से मुझे पर कोई परिणाम होने वाला नहीं है... बताऊं एक कहानी, छोटी सी।

वासिंद मिश्र : जी बताएं।

राम नाइक : देश के कच्चे तेल के आयात पर कुछ उपाय करके, हमने गन्ने का जो शीरा होता है उसमें से ऐथेनॉल निकाला था...और ऐथेनॉल पेट्रोल में मिक्स किया जा सकता है..आज ब्राजील में पेट्रोल में 25-30 पर्सेंट ऐथेनॉल मिश्रित किया जाता है...अपने यहां भी करना चाहिए ...मैं जब मंत्री था...तब हमने 5 पर्सेंट पहले वर्ष में और दो वर्ष बाद 10 पर्सेंट मिक्स किया था जिससे किसानों को भी लाभ हुआ था...गन्ना उत्पादक किसान, शुगर फैक्ट्रीज को भी लाभ हुआ...देश का आयात भी कुछ मात्रा में कम हुआ,,इस प्रकार से हमने निर्णय किया... हमारे निर्णय लेने के तुरंत बाद 15 दिनों में..हमारे पास कुछ बड़े-बड़े लोग आएं...कि भाई आपने ये निर्णय किया...मैंने कहा किसानों के हित में किया है.. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को इससे ऊर्जा मिलेगी इसलिए किया है... लेकिन उन्होंने कहा कि इसका हमारे व्यवसाय पर गंभीर  परिणाम होगा... मैंने कहा आपकी बात तो सही है कि आपको सस्ते में शीरा नहीं मिलेगा....लेकिन मैंने ग्रामीण किसानों के हित में ये निर्णय किया है, मैं इसमें परिवर्तन करना उचित नहीं मानता हूं।

वासिंद मिश्र : राम नाइक जी जो सबसे बड़ी बात है..  वो इमानदारी की है..आपने जिस ईमानदारी से  उस मंत्रालय को चलाया है.... अभी आपने कहा कि मुरली देवड़ा जी के पास व्यापारिक ज्ञान भी था... बावजूद इसके चार मंत्री बदल गए दस साल में और गैस का भंडार भी ज्यादा देश में, लेकिन  गैस और पेट्रोलियम के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं.... क्या आपको उम्मीद है कि मौजूदा जो सरकार है.. वो इतनी संवेदनशील है कि वो उन लोगों के विरुद्ध कार्रवाई करने  में कोई परहेज नहीं करेगी जिनके कंधों में जिम्मेदारी है कि अगर भरपूर मात्रा में गैस है तो उसका सही दिशा में प्रयोग हो उसको निकाला जाए और देश की जनता तक पहुंचाया जाए।

राम नाइक : मुझे लगता है कि उसी बात को लेकर तो नरेंद्र मोदी जी की सरकार बनी है..जहां तक विषय का संबंध है..अभी का जो पेट्रोलियम मंत्री हैं और नरेंद्र मोदी जी ने एथेनॉल के उत्पादन को बढ़ावा देने का निर्णय भी किया है..और उसके अनुसार वो चलेंगे...देखिए हर जगह पर इस प्रकार से अगर काम होता है तो निश्चित तौर पर लाभ होगा....और पेट्रोलियम क्षेत्र में इसकी बहुत आवश्यकता है..क्योंकि वो लोगों को दिखाई नहीं देता है,लेकिन उसका बोझ बढ़ती हुई कीमतों के कारण...बढ़ती हुई कीमत गैस की होगी.. पेट्रोल की होगी..डीजल की होगी..माल ढ़ोने की होगी..बिजली उत्पादन की होगी... वो दिखाई नहीं देता लेकिन बोझ आम आदमी पर पड़ता है... और आम आदमी को बचाने के लिए इस प्रकार की पेट्रोलियम नीति होती है...उसके अनुसार उसका व्यवहार भी होना चाहिए...मुझे लगता है कि मोदी जी सरकार सक्षम है इस बारे में...और अभी जो पेट्रोलियम मंत्री बने हैं उनकी और मेरी बातचीत भी हुई है.. मुझे जो लगा मैंने उन्हें बताया भी है... औऱ जो पेट्रोलियम मंत्री बने हैं वो निश्चित रूप से अच्छा काम करेंगे... ऐसा मुझे विश्वास है।

वासिंद्र मिश्र:- बहुत बहुत धन्यवाद।

एक्सक्लूसिव

First Published: Friday, August 8, 2014 - 17:04


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