कर्ज़ माफी किस कीमत पर!

By Vasindra Mishra | Last Updated: Friday, June 13, 2014 - 17:51
कर्ज़ माफी किस कीमत पर!

वासिंद्र मिश्र
संपादक, ज़ी रीजनल चैनल्स

बैंकिंग सेक्टर में किसानों के लिए सरकारों की कर्ज माफी योजना के खिलाफ माहौल बन रहा है, डूब सकने वाले कर्ज से जूझ रहे बैंक किसानों के लिए सरकार की कर्ज माफी योजनाओं का रास्ता कानूनी रूप से बंद करवाने पर विचार कर रहे हैं। कर्ज माफी का हालिया मामला आंध्र प्रदेश की सरकार की तरफ से लिया गया है। आंध्र प्रदेश की तेलुगु देशम पार्टी की सरकार ने सत्ता में आते ही किसानों को दिए गए 54 हज़ार करोड़ रुपए की कर्ज माफी का ऐलान किया है।

चंद्रबाबू नायडू ने दरअसल अपनी चुनावी रैलियों के दौरान कर्ज माफी का ऐलान किया था..हालांकि तमाम बैंक इसके खिलाफ थे और उन्होंने वित्त मंत्री तक से इस मामले में हस्तक्षेप की अपील की थी, लेकिन चुनावी वादे के मुताबिक तेलुगु देशम पार्टी की सरकार ने किसानों को दिया गया कर्ज माफ कर दिया है।

हालांकि, तेलुगुदेशम पार्टी की सरकार के इस फैसले से प्रदेश की माली हालत पर असर पड़ना तय माना जा रहा है, और सरकार के इस कदम के खिलाफ बैंक भी कानूनी लड़ाई लड़ने का मन बना रहे हैं। जाहिर है अगर ऐसा होता है तो पहली बार ऐसा होगा कि बैंक और सरकार आमने सामने होंगे। बैंकर्स किसानों की कर्ज माफी की योजना से सहमत नहीं हैं। बैंकर्स मानते हैं कि इससे ना सिर्फ लोन ना चुकाने की आदत को बढ़ावा मिलता है बल्कि फाइनेंशियल सेक्टर की हालत भी खराब होती है। ऐसे में बैंकर्स कई सुझाव भी देते हैं मसलन हर तरह के कृषि कर्ज़ का अनिवार्य बीमा कर दिया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में दी जाने वाली कर्ज माफी से बचाव मिल सके।

बैंक अपनी तरफ से स्कीम भी चलाते हैं जिसके तहत शॉर्ट टर्म लोन को लॉन्ग टर्म लोन में बदल दिया जाता है ताकि इसे चुकाने में किसानों को दिक्कत ना हो। बैंकिंग सेक्टर के लोग ये भी मानते हैं कि फाइनेंशियल सपोर्ट इस तरह का दिया जाना चाहिए जिससे किसानों की उत्पादकता बढ़े। भारत की एक बड़ी आबादी किसान है और किसानों के लिए लोकलुभावन योजनाओं का ऐलान कर सत्ता हासिल करने का फॉर्मूला कई पार्टियां अपनाती रही हैं।  

हालांकि उनके इस फॉर्मूले को पूरा करने की असल कीमत आम आदमी ही चुकाता है। ऐसे में सवाल उठने लाजिमी हैं कि इस तरह की योजनाएं कहां तक जायज़ हैं? देश में चुनावों के दौरान किसानों को कर्ज़ माफी के ऐलान के साथ सत्ता की सीढ़ी चढ़ने का फॉर्मूला पुराना हो चुका है। इसकी शुरुआत वी पी सिंह ने ही कर दी थी जब वो कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाकर चुनावी मैदान में आए थे। युनाइटेड फ्रंट की सरकार बनने पर पीएम का पद संभालने के बाद वी पी सिंह ने किसानों के कर्ज माफी के लिए तकरीबन 10 हज़ार करोड़ का पैकेज दिया था। किसानों का कर्ज माफ हो गया लेकिन इसका नुकसान उठाना पड़ा,  फाइनेंशियल और बैंकिंग सेक्टर को, नतीजा ये हुआ कि कई सहकारी बैंक बंद ही हो गए।

उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी किसानों की कर्ज माफी का ऐलान कर सत्ता पा चुकी है। अखिलेश सरकार ने सत्ता में आने के कुछ दिनों बाद किसानों का लगभग 1650 करोड़ रुपए का कर्ज़ माफ कर दिया था। यहां ये समझना ज़रूरी है जब किसानों का कर्ज माफ किया जाता है तो वो रकम सरकार बैंक को देती है और सरकार की तरफ से दी जाने वाली रकम सरकारी खज़ाने का होता है जो टैक्सपेयर अपनी जेब से देते हैं।  ये पैसा विकास और बिजली, सड़क, पानी जैसी आधारभूत सुविधाओं के लिए होता है। ऐसे में सरकार अगर कर्ज माफ करती है तो परोक्ष रूप से आम आदमी पर ही इसका असर होता है। साथ ही साथ सरकारी ख़ज़ाना भी खाली होता है। ऐसे में पार्टी भले ही फायदे में रहे लेकिन फाइनेंशियल सेक्टर, बैंकिंग सेक्टर और आम आदमी को इसकी कीमत चुकानी होती है।

देश की वित्तीय हालत पहले से ही चिंताजनक है। देश का Public Debt यानि केंद्र सरकार पर कर्ज़, जीडीपी का लगभग 67.59 फीसदी है। वहीं जीडीपी का 5.2 फीसदी बजट डेफिसिट है। भारतीय बैंकों का NPA यानि नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स भी बढ़ता जा रहा है। पब्लिक सेक्टर के बैंकों का NPA लगभग 2 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है। जिसे लेकर बैंकर्स अक्सर चिंता भी जाहिर करते रहे हैं। बहुत मुमकिन है कि जुलाई के पहले हफ्ते में आने वाले केंद्रीय बजट में नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स भी एक मुद्दा रहे।

ऐसे में सवाल ये कि क्या देश की वित्तीय हालत को देखते हुए केंद्र या राज्य़ सरकारों की तरफ से लिए जाने वाले कर्ज़ माफी के ऐसे फैसले कहां तक जायज़ हैं? जबकि इसके लिए बैंकिंग सेक्टर की तरफ से सुझाई गई योजनाओं पर भी अमल किया जा सकता है। सियासी दलों ने अपने वादे पूरा करने की कीमत सरकारी ख़ज़ाने से चुकाई है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि इससे देश के वित्तीय ढ़ांचे को हो रहे नुकसान के बारे में क्यों नहीं सोचा जाता?... टैक्सपेयर्स का पैसा अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए लुटा देना कहां तक जायज़ है?

 

एक्सक्लूसिव

First Published: Friday, June 13, 2014 - 16:51


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