तरक्की का 'मोदी मंत्र'

Last Updated: Saturday, June 14, 2014 - 20:42
 तरक्की का 'मोदी मंत्र'

वासिंद्र मिश्र
एडिटर न्यूज़ ऑपरेशन्स, ज़ी मीडिया

क्या कानूनों की जटिलता विकास की रफ्तार को धीमी कर देती है? क्या प्रक्रियाओं की उलझन में तरक्की के एजेंडे धरे के धरे रह जाते हैं? दरअसल बीते 10 सालों का राजनीतिक अतीत ये बताता है कि किस तरह देश में पिछली सरकार ने कानून तो कई लागू किए, लेकिन उनसे बजाय सहूलियत मुश्किलें और बढ़ती चली गईं। लिहाजा अब नई सरकार पिछली गलतियों से सबक लेने को तैयार है, जिसके संकेत अभी से मिलने शुरु हो गए हैं।

खबरें ये आ रही है कि शायद मोदी सरकार बहुत जल्द भूमि अधिग्रहण कानून से Social Impact Assesment को बंद कर सकती है। इसके तहत अधिग्रहण के पहले ये देखा जाता है कि इससे वहां के रहने वाले लोगों, उनके पीने के पानी की व्यवस्था और पूजा स्थल पर क्या असर पड़ता है।

दरअसल भूमि अधिग्रहण को लेकर देश भर के अलग अलग हिस्सों में मचे बवाल के बाद 2013 में यूपीए की सरकार ने कानून में कई बदलाव कर दिए थे। जो नया कानून बना उसके तहत ये ज़रूरी कर दिया गया कि ज़मीन अधिग्रहण के एवज़ में प्रभावित होने वाले 80 फीसदी लोगों की मंजूरी होनी चाहिए। इस कानून के बाद ज़मीन अधिग्रहण के मामले काफी कम हो गए, क्योंकि पूरी प्रक्रिया आसान नहीं रही। लिहाज़ा विकास की रफ्तार भी धीमी पड़ गई।

अब एनडीए की सरकार को ये अहसास हो रहा है कि अगर इसी तरह कानूनों का जाल बिछा रहा तो विकास को तेज़ रफ्तार देना मुमकिन नहीं होगा। लिहाजा कोशिश की जा रही है कि कानून में ज़रूरी बदलाव किए जाएं ताकि इंडस्ट्रीज़ को भी आसानी हो और ज़मीन मालिक को भी नुकसान ना हो। हालांकि इस मामले में बीजेपी अपने पुराने रुख से पलटती नजर आ रही है। बीजेपी ने विपक्ष में रहने के दौरान नए नए कानूनों की मांग करने से कभी भी परहेज नहीं किया। भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल की मांग होती रही जबकि पहले से ही करप्शन के खिलाफ कई कानून मौजूद हैं। लेकिन अब जबकि बीजेपी सत्ता में है शायद उसे ये अहसास होने लगा है कि विपक्ष में बैठकर सवाल उठाना और बात है जबकि सत्ता में बैठक सरकार चलाना और बात। लिहाजा बीजेपी का रूख बदला है और पीएम नरेन्द्र मोदी इस बदलाव के अगुवा बने हैं।

दरअसल नई सरकार को ये बात अच्छी तरह पता चल चुकी है कि यूपीए के कार्यकाल में जो पॉलिसी पैरालिसिस रहा है उसकी वजह कानूनों का जाल है जो पूरी प्रक्रिया को सुस्त कर देता है। लिहाजा मोदी सरकार की ओर से वो तमाम उपाय किए जा रहे हैं जिससे विकास की प्रक्रिया बाधित ना हो। इसीलिए एक ओर जहां सिंगल विंडो सिस्टम बनाए जाने की बात हो रही है तो वहीं एक्जीक्यूशन लेवल पर सरकार की भागीदारी बढ़ाने की भी बात हो रही है। इसी कोशिश में प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप को ये काम दिया गया है कि, वो ना केवल योजनाओं को क्लीयरेंस दिलाए, बल्कि ये भी देखे कि निर्धारित वक्त में इंडस्ट्री ने काम शुरु किया है या नहीं।

मोदी ने विकास को लेकर जीरो टॉलरेंस के रुख की झलक सत्ता संभालने के साथ ही देनी शुरु कर दी थी। सचिव स्तर के अधिकारियों के साथ हुई मोदी की बैठक में उन्होने सचिवों से ना केवल बेफिक्र होकर काम करने की छूट दी, बल्कि महज 24 घंटे के नोटिस पर उनसे सीधे मुलाकात का रास्ता भी खोल दिया। इतना ही नहीं अधिकारी खुलकर काम कर सके इसके लिए एंटी करप्शन लॉ में भी बदलाव की तैयारी चल रही है।

दरअसल किसी भी देश के समग्र विकास के लिए जरूरी है कि हर वर्ग के लिए सोची समझी रणनीति के साथ अहम बदलाव करते हुए समय के साथ फैसले किए जाएं। लेकिन ये तभी मुमकिन है जब इसके लिए ना केवल जरूरी साधन हों बल्कि प्रक्रिया भी आसान हो। बिना इसके विकास की रफ्तार कुंद पड़ जाती है। यहां प्रक्रिया का मतलब लालफीताशाही से है, और कानूनों से भी। वक्त के साथ कानून बदले जाने जरूरी है, लेकिन सियासी उतार चढ़ाव के हिसाब से बदले गए कानून किसी के हित में नहीं होते। अच्छी बात ये है कि नई सरकार ने शुरू में ही इस बात को समझ लिया है, और खालिस विकास के एजेंडे पर चलना शुरू किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ये कोशिश आने वाले दिनों में देश के लिए अच्छे दिनों की बुनियाद साबित होगी।

 



First Published: Saturday, June 14, 2014 - 20:29
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