मोदी की सुनामी: बह गए राहुल...

Last Updated: Thursday, May 8, 2014 - 15:32

संजीव कुमार दुबे
2014 का चुनावी महाभारत। इस बार के चुनाव में बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार विपक्ष यानी कांग्रेस पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि लोकसभा चुनाव कांग्रेस या बीजेपी में नहीं बल्कि मोदी और बाकी पार्टियों के बीच हो रहा है। यह हमेशा से चर्चा का विषय रहा है कि क्या राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी को चुनौती दे पाएंगे? कौन बेहतर प्रधानमंत्री होगा मोदी या राहुल? हालांकि सर्वे की बात करे तो मोदी हमेशा राहुल पर भारी पड़ते रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत में भी मोदी राहुल को कई पहलुओं से पछाड़ते दिख रहे हैं।
एक तरह से भाजपा के नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के बाद कांग्रेस ने भी राहुल गांधी को आगे बढ़ा कर अघोषित रूप से उन्हें अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना तो दिया है लेकिन राहुल खुद की चुनावी मार्केटिंग कर पाने में नाकाम साबित हुए है।
दोनों की तुलना करना दिलचस्प है जिसमें सबसे पहले बात उनके शख्सियत की आती है। मोदी एक मंझे और तपे-तपाए नेता हैं जबकि राहुल नेता बनने के गुर फिलहाल सीखते हुए नजर आते हैं। बतौर सियासतदान राहुल अब तक कुछ भी हासिल नहीं कर पाए है। अमेठी से सांसद के रूप में संसद में बैठने के अलावा वह अपनी मौजूदगी दर्ज करा पाने में नाकाम रहे हैं। सिर्फ उनका सर्टिफिकेट यही नजर आता है कि वह देश के सबसे बड़े राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखते है।
दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी की छवि विकास पुरुष की है । लगातार तीन बार गुजरात में सत्तासीन होकर मोदी ने खुद को साबित किया है। वह अपने हर भाषण में विकास की बात करते हैं। यहां तक कि कभी -कभी कभी उनके भाषण से ऐसा लगता है कि गुजरात और विकास एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हो गए हो।
मोदी जनाधार वाले नेता हैं। अच्छे वक्ता हैं और यही वजह है कि लोग उनको ध्यान से सुनते भी हैं। वह मंच पर समां बांध देते हैं। उन्हें जनता से जुड़ने और रैली को संबोधित करने का अंदाज बेहतर आता है। वह किसी भी रैली या जगह पर जाने से पहले उसके बारे में गहन अनुसंधान करते हैं। यह सब बातें उनकी रैलियों के भाषणों में झलकती है। जबकि राहुल सिर्फ समस्याओं की बात करते हैं। ज्यादातर इंटरव्यू में वह किसी समस्या का निदान इंटरव्यू लेने वाले से ही पूछते नजर आते हैं। यह उनकी बड़ी कमियों से एक मानी जा सकती है।
यह बात एक उदाहरण से समझी जा सकती है। मोदी वाराणसी में पिछले दिनों नामांकन भरने गए तो वहां जाने से पहले ही उन्होंने गंगा नदी पर एक ब्लॉग लिखा और ट्विटर पर उसका लिंक डाल दिया। नामांकन के बाद उन्होंने बातचीत में वाराणसी और अपने गुजरात की जन्मभूमि को भगवान शंकर से जोड़कर समां बांध दिया और खूब वाहवाही लूटी। यह उनकी सबसे बड़ी खासियत है कि किसी भी एक सिरे को पकड़कर भाषण के तमाम बिंदुओं को सिलसिलेवार बुनते चले जाते हैं और श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनता रह जाता है।
राहुल गांधी ने यूपी में विधानसभा चुनाव के दौरान जमकर प्रचार किया था। राहुल ने कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था लेकिन वह सफल नहीं हो पाए थे। इससे पहले बिहार में विधानसभा चुनाव में भी राहुल ने जमकर प्रचार किया था लेकिन कांग्रेस की हालत और बुरी हो गई। लिहाजा राहुल में एक नेता के लिए जो करिश्माई व्यक्तित्व होना चाहिए उसका सर्वथा अभाव है, यह बात सियासी पंडित भी कहते रहे हैं।
मंच पर भाषण देते वक्त राहुल एक ही बात को बार-बार दोहराते है जिससे उनका भाषण बोझिल हो जाता है जबकि मोदी अगर किसी बात को दोहराते भी है तो कुछ मुहावरे या चुटीली बातों के जरिए उसमें कुछ नया चुनावी रंग भर देते है जिससे अमुक रैली में मोदी-मोदी के स्वर गूंजायमान होने लगते हैं।
राहुल गांधी के विरोधी हमेशा उनपर आरोप मढ़ते रहे हैं कि वह राजनीति के अनाड़ी खिलाड़ी है और उन्हें सियासत की समझ नहीं । इन सबका आरोप है कि राहुल के पास देश के सामने चुनौती बनकर खड़े सवालों के जवाब नहीं हैं। इन आरोपों मे यह कहा जाता है कि राहुल क्या सोचते हैं, यह देश नहीं जानता। वह कोई जिम्मेदारी नहीं लेते हैं और कभी किसी बड़ी चुनौती का सामना सार्वजनिक तौर पर नहीं करते हैं। सिर्फ सांसद होने या माहिर सियासतदान होने में फर्क है।
राहुल के भाषणों में कही बात को कैसे काटनी है, इसमें मोदी माहिर खिलाड़ी हैं। मिसाल के तौर पर राहुल गांधी ने पिछले कुछ चुनावी भाषणों में आरटीआई, मनरेगा जैसी योजनाओं का बखान किया। उन्होंने इन भाषणों में कहा था- पहले नारा था- आधी रोटी खाएंगे, कांग्रेस को जिताएंगे, लेकिन अब यह नारा हो गया है पूरी रोटी खाएंगे, कांग्रेस को जिताएंगे। राहुल के इन बातों और दावों पर मोदी ताबड़तोड़ आक्रामक हमला बोलते हैं। मोदी ने कहा- कि राहुल गांधी ने गरीबों का मजाक बनाया । उन्होंने राहुल के भाषण पर कहा था कि आधी रोटी से पूरी रोटी में 60 साल लग गए। क्या पूरे पेट भर रोटी के लिए 100 साल लगाएंगे?
लोगों से संवाद करने की कला में मोदी माहिर हैं। क्योंकि यह किसी भी राजनेता की सबसे बड़ी क्षमता मानी जाती है।
राहुल जनता से असरदार ढंग से संवाद नहीं कर पाते हैं इसलिए उनका रोड शो और रैलियां फीकी पड़ जाती है। जबकि मोदी जनता से सीधा संवाद करते हैं। मोदी तमाम अहम मुद्दों पर किसी न किसी तरह अपनी राय सार्वजनिक करते रहते हैं। राहुल के बारे में यह भी कहा जाता है कि सभाओं में राहुल बहुत साफगोई से समस्याओं के हल नहीं पेश करते हैं। बल्कि वे अक्सर सामने बैठे लोगों से ही समस्या का हल पूछने लगते हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर मोदी की गूंज हमेशा गूंजायमान रहती है जबकि राहुल ट्विटर से काफी कम मुखातिब होते हैं।
मोदी की तुलना में राहुल गांधी की चुनावी सभाएं कम हो रही हैं। लेकिन ऐसी जो भी सभा राहुल गांधी कर रहे हैं, उनमें मोदी की तुलना में कम भीड़ उमड़ रही है। राहुल युवा हैं उनकी उम्र 43 साल हैं और वह 19 जून, 1970 में जन्मे है। मोदी 64 साल के हैं और वह 17 सितंबर, 1950 में जन्मे हैं। लेकिन किसी भी रैली मे आप देख लें। मोदी युवा नेता जैसी ऊर्जा से लबरेज रहते हैं। चुनावी जानकारों के मुताबिक मोदी अपनी उम्र से नहीं बल्कि अपने अंदाज से युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। इसलिए उनकी रैलियों में भीड़ा का रेला आता है। पिछले दिनों अमेठी की रैली में मोदी लगातार एक घंटे तक बोलते रहे। रैली की शुरुआत में जो उनकी ऊर्जा थी वहीं ऊर्जा चुनाव के आखिर तक बनी रही। मोदी एक दिन में छह रैलियां तक कर रहे हैं और हर रैली में उनकी ऊर्जा में वहीं उबाल रहता है। जबकि राहुल गांधी कई रैलियों में थके हुए नजर आते हैं और ऐसा लगता है कि वह रैली को चुनावी मजबूरी के तहत कर रहे हैं।
चुनाव परिणाम क्या होगा, यह तो 16 मई को पता चल ही जाएगा। लेकिन इस वक्त देश में मोदी लहर के सामने कोई टिक नहीं पा रहा है। देखना यह है कि 16 मई को बीजेपी का अबकी बार मोदी सरकार का नारा हकीकत में तब्दील हो पाता है?



First Published: Thursday, May 8, 2014 - 15:32


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