PM पद की रेस में मोदी सबसे आगे : डीपी त्रिपाठी

Last Updated: Friday, January 31, 2014 - 23:53

महाराष्ट्र के एक मराठी अखबार में भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार की गुप्त मुलाकात की खबर प्रकाशित होने के बाद इस बात को लेकर चर्चा काफी गरम हो गई है कि शरद पवार कहीं कांग्रेस नीत संप्रग का दामन छोड़कर भाजपा नीत राजग में तो शिफ्ट नहीं हो रहे हैं। हाल में मोदी को लेकर प्रफुल्ल पटेल के बयान में दिखाई गई नरमी भी कुछ इसी ओर संकेत करते हैं। सियासत की बात में देश के अगले प्रधानमंत्री और राजनीतिक उठापटक को लेकर ज़ी रीजनल चैनल्स के संपादक वासिंद्र मिश्र ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के महासचिव और प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी से लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश :-

वासिंद्र मिश्र : डीपी त्रिपाठी एनसीपी के राष्ट्रीय महासचिव हैं और पार्टी के प्रवक्ता भी। भारतीय राजनीति के अगर हम कहें तो कुछ चुनिंदा वरिष्ठ लोगों में आते हैं डीपी त्रिपाठी जो राजनीति की नब्ज को बेहतर तरीके से समझते हैं। आपसे हम जानना चाहते हैं कि इस समय देश के जो राजनैतिक हालात हैं, लग रहा है कि पूरा का पूरा जो पॉलिटिकल सिस्टम है बायपोलर होता जा रहा है। कह सकते हैं राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी। आप इससे कितना सहमत हैं... और एक सेहतमंद लोकतंत्र के लिए ये कितनी अच्छी बात है?
डीपी त्रिपाठी : मैं समझता हूं कि ये लड़ाई राजनीतिक मोर्चे पर चुनाव के दो मोर्चों के बीच है। यूपीए-2 जिसकी अभी डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार चल रही है और भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रतिक गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी इन दो मोर्चों के बीच मुकाबला हो रहा है। वो लोकतंत्र जो कि भारतीय संदर्भ में बहुलतावादी हो चुका है उसमें एक पार्टी का राज नहीं रहेगा यानी किसी एक पार्टी को बहुमत मिलता तो नहीं दिख रहा है.. जिसे हम स्पष्ट बहुमत कहते हैं। Simple Majority किसी एक राजनीतिक दल को नहीं मिल रही है। मिलेगी भी तो मोर्चे को मिलने की संभावना की बात की जा रही है वह भी नहीं हो रहा है। जो तमाम सर्वे और आंकलन कहते हैं उसके अनुसार तो किसी मोर्चे को भी बहुमत नहीं मिल रहा। हां...नरेंद्र मोदी अवश्य प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में सबसे आगे हैं।

वासिंद्र मिश्र : तो क्या ये माना जाए कि इस समय जो पूरी की पूरी राजनीति है.. उसमें क्षेत्रीय दलों की.. एक बार फिर महत्वपूर्ण भूमिका होने जा रही है?
डीपी त्रिपाठी : निश्चित तौर पर.. मैंने कहा कि बहुलतावादी राजनीति है..एक नहीं भारतीय राजनीति में अनेक हैं..और विभिन्न क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण होने जा रही है और ये मुकाबला नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी इसलिए नहीं है कि कांग्रेस पार्टी ने अभी तक राहुल गांधी को अपना प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित नहीं किया है.. और कांग्रेस पार्टी कहती है कि जब चुनाव हो जाएगा उसके बाद हमारा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय होगा।

वासिंद्र मिश्र : एक hypothetical सवाल ही सही... अगर कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी को अपना Prime Ministerial candidate बनाती है चुनाव के पहले.. तो ऐसी स्थिति में एनसीपी क्या उस प्रस्ताव को मानेगी?
डीपी त्रिपाठी : नहीं, उस पर हम विचार करेंगे.. पहले कांग्रेस पार्टी उम्मीदवार घोषित करे..अभी तो ये विचार कल्पना में है.. अभी तक कांग्रेस पार्टी ने कोई ऐलान नहीं किया है.. उनका प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा..इस पर उन्होंने विचार करके कोई घोषणा नहीं की है.. एक बार वो इसे तय करें..फिर हम विचार करेंगे।

वासिंद्र मिश्र : दूसरा सबसे बड़ा सवाल है कि एनसीपी और कांग्रेस के बीच में हर चुनाव के पहले देखा जाता है कि लव एंड हेट का रिश्ता दिखाई देता है .. चाहे वो महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव हों..या फिर देश का चुनाव हो.. इसके पीछे क्या कारण है..कहा जाता है कि आप और खास तौर से शरद पवार...और आप दोनों लोग कांग्रेस पार्टी को हमेशा tenterhooks पर रखना चाहते हैं।
डीपी त्रिपाठी : नहीं, ये बिल्कुल सही नहीं है..कांग्रेस पार्टी ही हमेशा अपने सहयोगी दलों के साथ अनुचित व्यवहार करती है.. कभी भी उन्होंने गरिमामयी रिश्ता नहीं रखा.. आप देखिए यूपीए-2 में भी हम लोगों ने बहुत मांग की। तब एक समन्वय समिति (को-ऑर्डिनेशन कमेटी) जिसकी मीटिंग ही नहीं होती है। कोई विषय जो को-ऑर्डिनेशन कमेटी में आना चाहिए... नीतिगत फैसलों पर इस कमेटी में विचार करने के बाद फैसले किए जाएं.. जिस पर कोई फिर ऐतराज नहीं करेगा ... उससे यूपीए-2 मजबूत होगा.. कांग्रेस पार्टी वो नहीं करती है। जहां तक alliance partner के साथ व्यवहार करने का प्रश्न है.. उसमें वो हमेशा हमको दबाने की कोशिश करते हैं... किस तरह एनसीपी को अलग-थलग रखा जाए.. किसी भी बड़े विषय पर उन्होंने हमसे विचार नहीं किया.. इस तरह व्यवहार करते हैं, जैसे एक पार्टी का राज हो, जबकि ये गठबंधन सरकार है। अपने से भी नहीं सीखते वो.. जैसे केरल में यूडीएफ की सरकार है.. कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में बहुत अच्छी coalition सरकार चल रही है ... हम उसके खिलाफ हैं केरला में... लेकिन फिर भी गठबंधन चाहे वो यूडीएफ हो या फिर एलडीएफ हो.. दोनों गठबंधन केरल में बहुत तरीके से चल रहे हैं.. कांग्रेस उससे भी नहीं सीखना चाहती।

वासिंद्र मिश्र : आपको लगता है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी गठबंधन की राजनीति करने में पूरी तरह विफल रही है?
डीपी त्रिपाठी : गठबंधन के व्यवहार में पूरी तरह विफल रही है.. उसपर मुझे उर्दू की एक रूबाई याद आती है..कांग्रेस के साथ गठबंधन के व्यवहार पर...
हूं न अहबाब दुश्मनों के कभी, मेरे नादान साथियों की तरह,
मुझको अपनों ने ही कुचल डाला, राजा पोरस के हाथियों की तरह...
कांग्रेस पार्टी हमेशा अपने सहयोगियों को दबाने की कोशिश करती रहती है

वासिंद्र मिश्र : तो यही कारण है कि समय-समय पर आपके जो नेता हैं शरद पवार जी कभी एमएनएस से बात करते हैं, कभी उद्धव ठाकरे से बात करते हैं.. कभी सीनियर स्वर्गीय बाला साहेब ठाकरे से बात किया करते थे.. और अभी हाल में जो बयान आया है प्रफुल्ल पटेल जी का..कि गुजरात दंगे के बारे में अब जो बयानबाजी हो रही है वो अब बंद होनी चाहिए...क्योंकि नरेंद्र मोदी को अदालत से क्लीन चिट मिल गई है।
डीपी त्रिपाठी : देखिए मैं दूसरी बात कहता हूं.. प्रफुल्ल पटेल ने सर्वथा उचित बात कही है.. जब अदालत फैसला देती है, तो हर मामले में अदालत का फैसला हम मानते हैं.. तो नरेंद्र मोदी को क्यों अलग करके देखें.. जब अदालत का फैसला हर चीज़ में स्वीकार है.. तो नरेंद्र मोदी के मामले में क्यों नहीं स्वीकार होना चाहिए.. अदालत ने एक फैसला दिया है.. उससे बड़ी बात मैं आपसे कहना चाहता हूं कि पुराने घावों को कभी कुरेदना नहीं चाहिए.. जितना उसको भूला जा सके..भुलाया जा सके...उतना करना चाहिए.. जिससे जनता के बीच सामंजस्य बना रहे... विभिन्न समुदायों के बीच में आखिर 2002 के दंगों के बाद तो गुजरात में दंगे नहीं हुए.. तो कम से कम एक अच्छी बात है कि 12 वर्षों में दंगे नहीं हुए गुजरात में .. इसके लिए गुजरात की जनता का धन्यवाद करना चाहिए... सरकार का नहीं।

वासिंद्र मिश्र : चार बड़ी घटनाएं हुई हैं देश में.. बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया जाना.. गुजरात का दंगा..सिख दंगा..जो दिल्ली और देश के बाकी हिस्सों में हुए.. और अभी हाल में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगा हुआ....आपने अभी कहा कि जो पुराने जख्म हैं..उसको कुरेदने से कोई फायदा नहीं है.. सद्भाव बनाने की कोशिश होनी चाहिए.. तो ये convenience की पॉलिटिक्स क्यों होती है... जो मुद्दे वोट दिलाने में कामयाब हों.. उसे तो कुरेदा जाता है और जिससे लगता है कि इन मुद्दों से वोट नहीं मिलेगा उसे कवरअप कर दिया जाता है।
डीपी त्रिपाठी : नहीं, नहीं, वोट के लिए, वही तो मैं कह रहा हूं.. सिर्फ वोट के लिए ..राजनीतिक रूप से जनता के बीच जो भी भेद पैदा करने वाली चीज हैं... फूट पैदा करने वाली चीजें हैं...उसे नहीं उठाना चाहिए.. जाति की बात हो...धर्म की बात हो...क्षेत्र की बात हो..उसे नहीं उठाना चाहिए..हमें चुनाव और राजनीति के माध्यम से भी देश की एकता को मजबूत करने की कोशिश करनी चाहिए.. जो लोगों को एक करे..उनको साथ ले आए.. ऐसी नीतियों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

वासिंद्र मिश्र : आपको लगता है कि आने वाले चुनाव में जो मुद्दे होंगे... उसमें इसी तरह के मुद्दों को ज्यादा तवज्जो दिया जाएगा?
डीपी त्रिपाठी : मेरा ख्याल है कि राजनीतिक दल अगर ऐसा न भी करें.. जो कि लगता है कि नहीं करेंगे.. तो भी जनता अपने स्तर पर..एकता की ताकतों को मजबूत करेगी।

वासिंद्र मिश्र : जो मौजूदा हालात हैं, जिस तरह polarisation हो रहा है, बहुत हाइटेक कैंपेनिंग देखने को मिल रही है... खास तौर से बीजेपी के उम्मीदवार की तरफ से... करोड़ों रुपया खर्च किया जा रहा है, उसके जवाब में कांग्रेस पार्टी भी पैसा बहाने में लगी है...आपको लगता है कि इतने महंगे चुनाव कैंपेन से कोई बहुत ज्यादा फायदा होने जा रहा है, इन दलों को या इन प्रत्याशियों को?
डीपी त्रिपाठी : आपने बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। असल में ये प्रश्न पहली बार आप पूछ रहे हैं ... दुर्भाग्य की बात है और लोगों को भी पूछना चाहिए था... पहली बात अगर आप मोदी की रैलियों को देखिए और राजनीतिक रैलियों को देखिए.. तो एकदम जैसे corporate mobilisation होता है, पूंजीवादी तरीके से जनता को इकट्ठा करने की कोशिश होती है... ये वैसा ही है ... करोड़ों रुपये खर्च करके, अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ ये रैलियां हो रही हैं.. इन सारी रैलियों को देखकर चुनाव की इस नई राजनीतिक तकनीक और व्यवस्था को देखकर मुझे हिन्दी के एक बड़े सुप्रसिद्ध कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की 1972 में लिखी गई कविता की चार पंक्तियां याद आती हैं....
अब लाठियों में तेल मलके आ रहा चुनाव
हत्याओं की गली से चलकर आ रहा चुनाव
बंदूक में उबल-उबल के आ रहा चुनाव
दौलत के संग उछल-उछल के आ रहा चुनाव

तो जो चुनाव की ये नई प्रक्रिया शुरू हुई है राजनीतिक दलों के द्वारा वो अपने आप में महत्वपूर्ण भी है और इसका नए तरीके से विश्लेषण करने की भी जरूरत है।

वासिंद्र मिश्र : तो जो लोग प्रायोजित कहें या लाई हुई भीड़ के दम पर बड़े-बड़े वायदे कर रहे हैं... इस तरह की चुनावी रैलियों में करोड़ों अरबों रुपया खर्च करके गरीबों की बात कर रहे हैं... कह रहें की अगर उनको सत्ता मिलती है तो वो गरीबों के लिए नीतियां बनाएंगे, बेरोजगारों के लिए नीतियां बनाएंगे, आर्थिक व्यवस्था को गरीब और बेरोजगारों से जोड़कर चलाने की कोशिश करेंगे जो अर्थ नीति होगी देश की । आपको लगता है कि जब हम कारपोरेट घरानों की फंडिंग के दम पर, कई सौ करोड़ रुपया कारपोरेट घरानों से लेकर जब हम चुनावी सभाओं में खर्च कर रहे हैं, तो ऐसे में हम accidently या कहें कि fortunately अगर सत्ता मिल भी जाती है... तो हम उस वर्ग का ध्यान रखकर नीति बना पाएंगे। या उन कार्पोरेट घरानों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाएंगे जिन्होंने हमे फंडिंग की है चुनाव के दौरान?
डीपी त्रिपाठी : यही तो सबसे बड़ा अंतर्विरोध है। इसको समझने की कोशिश करनी चाहिए। पहली बार भारत के राजनीतिक पटल पर.. सही अर्थों में गरीब से भी गरीब आदमी सत्ता के शिखर पद का उम्मीदवार है। नरेंद्र मोदी जिन्होंने स्वयं ट्रेनों में चाय बेची है.... संघर्ष और गरीबी को देखा है... आज वह गरीब आदमी सबसे धनी रैलियों के बीच बोल रहा है.. इस अंतर्विरोध को समझने की आवश्यकता है और उसे समझने के साथ ही हम कुछ उस राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं... जो आपके प्रश्न में निहित है, जब हम इन लोगों के बल पर अपने राजनीति के सारे इंतजामात करेंगे तो फिर जब निर्णय का अवसर हमारे हाथों में होगा तो क्या करेंगे... निश्चिय ही उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप फैसले होंगे।

वासिंद्र मिश्र : भारतीय इतिहास पर अगर नज़र डालें तो गांधी, नेहरू, पंत से लेकर मौलाना आजाद तक जिनका हम लोग उदाहरण देते हैं हम अपने सार्वजनिक जीवन में उनकी सादगी का, उनके विजन का, उनकी फिलॉसफी का... जो उनकी लाइफ स्टाइल थी एक अमीर परिवार से रहते हुए भी उन्होंने गरीबी की तरफ ध्यान लगाया.. गरीबों के बारे में सोचा... एक सादगी भरे जीवन की तरफ बढ़ने की कोशिश की और सादगी भरा जीवन बिताने की कोशिश की... जो contradiction नरेंद्र मोदी, मायावती, लालू यादव की जीवन शैली में देखने को मिलती है.. एक तरफ ये लोग खुद को गरीब परिवार से बताते हैं कि बहुत नीचे तबके से उठकर ऊपर आए हैं राजनीति में.. ये उस वर्ग की सेवा करना चाहते हैं... लेकिन ज्योंही इनको सत्ता मिलती है, तो इनकी जीवन शैली है किसी भी राजा, महराजा या कुलीन वर्ग से ज्यादा lavish दिखाई देती है... ये क्या है? विडंबना नहीं है हमारी भारतीय राजनीति की.. या hypocrisy नहीं है?
डीपी त्रिपाठी : बहुत बड़ी विडंबना है जो आप कह रहे हैं.. ये भी आपने बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है... इसको भी कोई देखने की कोशिश नहीं करता.. आप ये देखिए जिसे लोहिया द्विजवाद कहते थे ...दक्षिण भारत में तो समाप्त हो चुका है... राजनीतिक सत्ता, आर्थिक सत्ता, सामाजिक सत्ता कहीं भी दक्षिण भारत में द्विजवाद नहीं बचा है... उत्तर भारत में द्विजवाद के खिलाफ लड़कर जो पिछड़े आए वो अगड़ों से भी अगड़े राजाओं, महाराजाओं से भी ज्यादा धनिकों जैसा व्यवहार करते हैं ...विद्रूप रूप से धन और दौलत का प्रदर्शन कर रहे हैं। चाहे उत्तर प्रदेश चाहे बिहार में या कहीं भी आप पिछड़े वर्ग के नेताओं को देखें जिनका जिक्र आप कर रहे हैं ... तो ये परिवारवाद, धनवाद में और भोगवाद में भी ये विद्रूपता से ऊपर चले गए हैं। नीतीश कुमार को अगर आप छोड़ दें तो जितने भी पिछड़े वर्ग के नेता हैं... कोई भी सहज, सामान्य और सादगी भरा व्यवहार नहीं कर रहे हैं।

वासिंद्र मिश्र : तो जिन मूल्यों का ये लोग विरोध करके राजनीति में आए थे... जिन मूल्यों और नीतियों का विरोध करके उन लोगों ने राजनीति और सत्ता तक अपनी जगह बनाई। जब सत्ता में आ गए तो उन्होंने उसको वीभत्स और गंदे तरीके से उसको implement किया अपने निजी जिंदगी में और अपने पॉलिटिकल लाइफ में भी?
डीपी त्रिपाठी : बिल्कुल...अभी भी कर रहे हैं... लगातार कर रहे हैं... उसकी तुलना में। अगर अभी भी आप कांग्रेस पार्टी में देखें तो तमाम लोग, अगर आप एक बंगला छोड़ दीजिए तो अहमद पटेल बहुत सादगी से रहते हैं... मैं आपसे कह रहा हूं .. वो मेरी पार्टी में नहीं हैं... मैं उनकी पार्टी में नहीं हूं.. फिर भी कह रहा हूं अहमद पटेल बहुत सादगी से रहते हैं.. बंगला छोड़ दीजिए वो मदर टेरेसा क्रिसेंट पर एक बंगले में रहते हैं, उसी में 1984 से रह रहे हैं। वो बांग्ला भी नहीं बदला उन्होंने.. आप जनार्दन द्विवेदी को देख लीजिए, कैसे रहते हैं... कांग्रेस पार्टी के महासचिव हैं ...ये कोई एमपी का बंगला है ... उसके अलावा बाकी कोई अतिरिक्त सुविधा उनके यहां किसी भी धनाढ्य वर्ग जैसी नहीं दिखेगी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दिखाता नहीं है... आप दिखा दीजिए एक बार, कांग्रेस पार्टी के महासचिव मोहन प्रकाश कैसे रहते हैं और ये अरविंद केजरीवाल कैसे रहते हैं... अरविंद केजरीवाल इस जीवन में उस सादगी से नहीं रह सकते... जिस सादगी से मोहन प्रकाश रहते हैं।

वासिंद्र मिश्र : तो क्या पूरा गेम ब्रांड मार्केटिंग का है, पब्लिसिटी स्टंट है और जो सच्चाई है उसको पर्दा डालते हुए अगर हम कहें कि hypocrites और hypocrisy को बढ़ावा देना है?
डीपी त्रिपाठी : बिल्कुल, पूरी तरह से।

वासिंद्र मिश्र : राजनीति में इस समय एक चर्चा चल रही है कि हर दल अपनी तरफ से एक प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर रहा है, शरद पवार की काबिलियत की, उनके व्यक्तित्व की एनसीपी से ज्यादा दूसरे दलों के लोग तारीफ करते हैं समय-समय पर, कभी मुलायम सिंह यादव बोलते हैं, कभी कई बीजेपी के नेता भी कहते हैं कि शरद पवार में जो प्रधानमंत्री के गुण होने चाहिए, वो सारी चीजें मौजूद हैं। क्या इस चुनाव में आप लोग मानते हैं कि शरद पवार को as a prime minister project किया जाना चाहिए?
डीपी त्रिपाठी : नहीं...हम लोग अपनी सीमाएं समझते हैं... हम राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल हैं... फिर भी हम एक छोटी पार्टी हैं... हमारी सबसे बड़ी समस्या ये है कि हम एक बहुत बड़े नेता शरद पवार के नेतृत्व में हैं, लेकिन एक छोटी पार्टी हैं... बड़ा नेता, छोटी पार्टी। महाराष्ट्र और कुछ अन्य राज्यों में हमारा प्रतिनिधित्व है, लेकिन हम अपनी सीमाओं को समझते हैं, इसलिए हम प्रधानमंत्री पद पर अपने नेता की उम्मीदवारी की बात नहीं करते।

वासिंद्र मिश्र : Alliance को लेकर क्या है आपका प्लान? राष्ट्रीय स्तर पर जो alliance चल रहा है आपका यूपीए-2 से वो सभी राज्यों में रहेगा या सिर्फ महाराष्ट्र और दिल्ली के कुछ राज्यों में?
डीपी त्रिपाठी : सभी राज्यों में रहता है या नहीं वो तो कांग्रेस पार्टी पर निर्भर है... कांग्रेस पार्टी alliance को मजबूरी समझती है... सहज राजनीतिक प्रक्रिया नहीं समझती... इसलिए वो अपने सहयोगी दलों को निरंतर कमजोर करने की कोशिश में लगे रहते हैं... हम यूपीए के सदस्य हैं.. हमने पिछले दस वर्ष में किसी भी सवाल पर सरकार के विरूद्ध कोई बात नहीं की.. हमेशा सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का समर्थन किया।

वासिंद्र मिश्र : आपको लगता है कि महाराष्ट्र में आपकी पार्टी कांग्रेस के साथ मिलकर बेहतर करेगी? या महाराष्ट्र में कोई अलग फॉर्मूला आजमाना पड़ेगा आपको?
डीपी त्रिपाठी : नहीं अभी कोई अलग फॉर्मूले की बात नहीं है, मैंने कहा ये कांग्रेस के व्यवहार पर निर्भर करेगा। हम लोग चाहते हैं कि यूपीए सशक्त हो, यूपीए के सहयोगी दल कांग्रेस के साथ मिलजुल कर आगे बढ़ें।

वासिंद्र मिश्र : आने वाले चुनाव में आपकी नजर में कौन से मुद्दे होने चाहिए, जिस पर जनादेश हासिल होने की कोशिश होनी चाहिए राजनैतिक दलों की तरफ से?
डीपी त्रिपाठी : सबसे बड़ा मुद्दा विकास के लिए समर्पित सरकार.... विभाजनकारी मूल्यों के विरूद्ध काम करने वाली राजनीति और मजबूत सरकार का मुद्दा ये तीन बातें चुनाव में प्रमुख रूप से आगे आने चाहिए।



First Published: Friday, January 31, 2014 - 23:47
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