कांग्रेस का नया फॉर्मूला

Last Updated: Wednesday, February 5, 2014 - 20:51

वासिंद्र मिश्र
संपादक, ज़ी रीजनल चैनल्स
आरक्षण को लेकर जनार्दन द्विवेदी का बयान और खाप पंचायतों को लेकर पी चिदंबरम का बयान कांग्रेस पार्टी में ट्रांसफोर्मेशन के दौर का इंडीकेटर है। कांग्रेस को लगने लगा है कि अब अम्ब्रेला पॉलिटिक्स का दौर खत्म हो रहा है। दिल्ली लोकसभा चुनाव के परिणामों ने कांग्रेस को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि देश में अब पारंपरिक तरीके से राजनीति करना आसान नहीं रह गया है।
मीडिया के एक्‍सप्‍लोजन और ग्लोबल विलेज की संस्कृति ने लोगों की सोच को बदलकर रख दिया है। अब जो संस्कृति विकसित हो रही है, उससे देश का मतदाता जागरुक हो चुका है। वो जाति संप्रदाय की सीमा से बाहर विकास, भ्रष्टाचार मुक्त शासन-प्रशासन, रोजगार, शिक्षा और अच्छी व्यवस्था को तरजीह दे रहे हैं और शायद यही वजह है कि कांग्रेस के दो जिम्मेदार नेताओं की तरफ से दो अहम मुद्दों पर बहस की पहल की गई है। जहां जनार्दन द्विवेदी ने रिजर्वेशन का मुद्दा उठाया है तो वहीं चिदंबरम ने खाप की संस्कृति पर बहस छेड़ दिया है।
इन मुद्दों को विरोध होना तय है, हो भी रहा है लेकिन जो पार्टियां ये विरोध कर रही हैं और अभी भी वही पुराने चुनावी मुद्दे लेकर आगे बढ़ रही हैं वो शायद समाज की नब्ज नहीं पकड़ पा रहीं। अभी भी कुछ दलों के लिए सियासत के ओर और छोर पर जाति ही है। सियासी दलों के सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी यहीं जातियां हैं। भारतीय जनता पार्टी जानती है कि उसके पास अगड़ी जातियों का वोट बैंक है लेकिन अगर उसे सत्ता में आना है तो उसे बैकवर्ड क्लास और मोस्ट बैकवर्ड क्लास का समर्थन चाहिए होगा और जब ये कॉम्बिनेशन बनेगा तो बीजेपी सत्ता में स्थान बना पाएगी यानि बीजेपी के लिए जो फॉर्मूला बन रहा है वो है
(अगड़ी जाति+अति पिछड़ा+महादलित= सत्ता)।

इसी तरह समाजवादी पार्टी के पास परंपरागत मुस्लिम और यादव वोट बैंक रहे हैं, लेकिन अगर इससे अगड़ी जातियां जुड़ जाएं तो समाजवादी पार्टी को सत्ता सुख मिल सकता है। (मुस्लिम+यादव+अगड़ी जाति= सत्ता)। बीएसपी का परंपरागत वोटबैंक है दलित जो कभी कांग्रेस के साथ हुआ करता था लेकिन बीएसपी इस वोटबैंक में सेंध लगाने में कामयाब हुई है। मायावती सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लेकर एक बार अगड़ी जाति को भी खुद से जोड़ने में कामयाबी हासिल कर चुकी है लेकिन इसे बनाए रखने के लिए वो अगड़ी जाति में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए रिजर्वेशन के मुद्दे को हवा दे चुकी हैं और एक बार फिर जो समीकरण बनाना चाहती है वो दलित, मुस्लिम और अगड़ी जाति है (दलित+मुस्लिम+अगड़ी जाति= सत्ता)।
इसी तरह कांग्रेस कई साल से अम्ब्रेला पॉलिटिक्स कर रही है लेकिन हाल के चुनाव परिणाम बताते हैं कि कांग्रेस को नए सिरे से सोचने की जरूरत है और नया फॉर्मूला चाहिए जो जीत का गणित बन सके। लिहाजा कांग्रेस की कोशिश है कि इतनी कंफ्यूजन क्रिएट कर दी जाए कि लोग वोट देने से पहले अपनी परंपरागत सोच को परे रख दें। वैसे भी कांग्रेस पर विरोधी डिवाइड एंड रूल करने का आरोप लगाते रहे हैं।
ऐसे में जब सभी पार्टियां अपना अपना वोटबैंक बनाने में लगी हुई हैं और कांग्रेस को लग रहा है कि उनका अपना परंपरागत वोट बैंक नहीं बचा है। मायावती और नीतीश सरीखे कुछ राजनेताओं ने आर्थिक रुप से कमज़ोर सामान्य वर्ग के लोगों को आरक्षण देने का ज़िक्र अपने मैनिफेस्टो में किया था, लेकिन अब इस नई बहस के शुरू होने के बाद उन क्षेत्रीय दलों को फायदा मिलना मुश्किल है। हालांकि कांग्रेस का ये नया शिगूफा उन सामान्य वर्ग के वोटरों को साधने की कोशिश माना जा सकता है, जिनका बिखराव है। सियासत में सबसे मजी हुई पार्टी माने जाने वाली कांग्रेस पर अक्सर ये आरोप लगते रहे हैं वो बांटो और राज करो की नीति अपनाती है या फिर सियासत में कन्फ्यूजन का फायदा उठाती है और माना जा रहा है कि इस बार कोशिश कुछ-कुछ वैसी ही है।

आप लेखक को टि्वटर पर फॉलो कर सकते हैं



First Published: Wednesday, February 5, 2014 - 20:49


comments powered by Disqus