अब देना ही होगा पाक को मुंहतोड़ जवाब

Last Updated: Wednesday, October 23, 2013 - 19:39

संजीव कुमार दुबे
पाकिस्तान का सीमा पर लगातार गोलीबारी करना, सीजफायर तोड़ना और घुसपैठ की संख्या में इजाफा का होना, ना सिर्फ भारत में भविष्य के खतरे की तरफ इशारा करता हैं बल्कि जल्द से जल्द नई और ठोस रणनीति बनाए जाने की मांग भी कर रहा हैं। पिछले दिनों जो सीजफायर और घुसपैठ की घटनाएं हुई है उससे एक बात साफ हो जाती है कि पाकिस्तान अपनी सेना के नेतृत्व में लश्कर जैसे आतंकी संगठन मिलजुलकर घुसपैठ और गोलीबारी की साजिश रच रहा हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पाकिस्तान उन नापाक मुल्कों में शुमार होता है जिसने हमेशा आतंकवाद को शह दिया है।
खौफनाक होती तस्वीरें दिनोदिन हमें सचेत होने का आभास कराती है। सिर्फ इस साल पाकिस्तान संघषर्विराम का 136 बार सीजफायर का उल्लंघन कर चुका है, जो पिछले आठ सालों में सबसे ज्यादा है । नियंत्रण रेखा पर सेना की तैयारियों पर ऐसे समय सवाल उठ खड़े हुए हैं जब पिछले 10 महीनों में भारतीय क्षेत्र के अंदर भारतीय सैनिकों पर हमले की दो से ज्यादा घटनाएं हो चुकी हैं । सवाल उठना लाजिमी भी है क्योंकि ऐसा नहीं होता तो केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे वहां फौज की टुकड़ियां भेजे जाने की बात नहीं करते।
पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ के मामलों में पिछले साल की तुलना में तेजी से इजाफा होता चला जा रहा है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2012 में 120 आतंकवादी भारत में घुसे थे जबकि 2013 में अब तक 90 से अधिक आतंकवादी भारतीय सीमा में घुसपैठ कर चुके हैं। इस बात को समझने की जरूरत है कि नवाज शरीफ के पाकिस्तान की सत्ता संभालने के बाद से घुसपैठ के मामले तेजी से बढ़े हैं। यानी नवाज ने सत्ता संभालने के बाद जो दोनों देशों के बीच शांति,अमन,चैन की दलील दी थी , वह थोथी और खोखली निकली।
रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि जो लोग नवाज शरीफ से उम्मीद लगाए बैठे हैं, उन्हें भ्रम से बाहर आने की जरूरत है। जानकारों का दावा है कि नवाज का मकसद भी वही है, जो पाकिस्तान की सियासत से जुड़े अन्य लोगों का है। यह कहा जा रहा है कि नवाज शरीफ की सोच है कि घुसपैठ जारी रखें, वार्ता भी करते रहें और इसकी आड़ में ढेरों छूट ले लें। यहीं वजह है कि नवाज अपने मुल्क से चल रही आतंकियों गतिविधियों पर लगाम लगा पाने में नाकाम रह हैं। क्योंकि वह ऐसा करना भी नहीं चाहते हैं।
देश के हुक्मरानों को यह बात समझ में भले ही नहीं आ रही है लेकिन ऐसा लगता है कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला इस खतरे को भांप चुके हैं। तभी उन्होंने कहा है कि कि नियंत्रण रेखा पर अगर पाकिस्तान संघर्ष विराम का लगातार उल्लंघन करता है तो केंद्र को अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए। उमर के इस बयान में एक ठोस रणनीति जो कूटनीति से भरी हुई है, उसके बनाए जाने पर जल्द से जल्द पहल करने की बात साफ झलकती है। उमर की बातों पर अगर गौर करें तो वह साफ कहते हुए नजर आते हैं कि हम कबतक निशाना बनते रहेंगे।
भारत में पाकिस्तान लंबे अरसे से अशांति फैलाने की कोशिश करता आ रहा है। सीजफायर का उल्लंघन कर वह बार-बार मर्यादा लांघता है। घुसपैठ की आड़ में आतंकियों को सीमा में दाखिल करवाने की उसकी पुरानी आदत है। पाकिस्तान आतंक के पाठशाला को ना जाने कितने रूप में चलाता है जिसकी हम-आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है कि पाकिस्तान के एक प्रसिद्ध समाचार पत्र डॉन की एक रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान में जिन 1,964 आतंकियों को रिहा किया, उनमें से 722 दोबारा आतंकी समूहों से जुड़ गये, जबकि 1,197 लोग सक्रिय रूप से राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं। एक आधिकारिक दस्तावेज के हवाले से रिहा हुए इन संदिग्ध आतंकियों में कम से 12 लोग मारे जा चुके हैं। खुफिया खबरों से संकेत मिलता है कि सीमा पार 42 आतंकवादी शिविर चल रहे हैं, जिनमें से 25 पाक अधिकृत कश्मीर में हैं और 17 पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में हैं ।
घुसपैठ के आंकड़े दिन-ब-दिन भयावह होते जा रहे हैं। भारत-पाक सीमा के जरिए वर्ष 2012 में कम से कम 90 पाकिस्तानी घुसपैठियों ने प्रवेश किया । कम-से-कम 125 आतंकवादी जम्मू कश्मीर में उस समय पकडे गये, जब वे घुसपैठ कर भारत में प्रवेश की कोशिश कर रहे थे । पाकिस्तानी घुसपैठियों की संख्या 2011 में जहां 63 थी, वहीं 2012 में 90 घुसपैठियों के प्रवेश से गृह मंत्रालय में खतरे की घंटी बजी और उसके बाद सुरक्षा एजेंसियों को सीमा पर चौकसी बढाने के लिए कहा गया । भारत-पाक सीमा से 2010 में 94 और 2009 में 69 पाकिस्तानी घुसपैठियों ने प्रवेश किया ।
आपको यह भी याद होगा कि सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह ने यह कहा था कि पाकिस्तानी सेना की जानकारी के बगैर जम्मू एवं कश्मीर में आतंकवादियों की घुसपैठ असंभव है। जनरल सिंह ने कहा था कि पाकिस्तानी सेना की जानकारी के बगैर नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर कोई आतंकवादी गतिविधि चल सकती। यानी यह साफ है कि सीमापार से हर खतरनाक गतिविधि में पाकिस्तानी सेना का हाथ होता है और उनके मंसूबे हर बार नापाक होते हैं।
यह सोचने की जरूरत सही मायने में है कि क्या पाकिस्तानी की तरफ से होनेवाले घुसपैठ को रोकने को लेकर हम जिस तरीके को अपनाते हैं क्या वह सही है। क्या संयम का आभूषण हम हमेशा ओढ़े रहेंगे या फिर आक्रामक होकर जवाब भी देंगे।
बदले और बदतर होते हालात में जम्मू-कश्मीर के उमर अब्दुल्ला की यह बात सार्थक और सटीक लगती है। भारतीय हुक्मरान और भारत के लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगा। सीजफायर, घुसपैठ कराना वह नहीं छोड़ सकते । हमारे धैर्य की भी एक सीमा है। कहीं ऐसा ना हो कि संयम का यह आवरण सीमा पार से आ रहे खतरों को नासूर में तब्दील कर दें। पाकिस्तान ऐसी नापाक हरकतों को सिर्फ इसलिए दोहराता है कि उसे कभी ठीक से जवाब मिला ही नहीं। वार्ता एक अलग सियासी प्रक्रिया है जिसे रोकना नहीं चाहिए लेकिन सीजफायर कर उल्लंघन कर गोलीबारी का पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब समय रहते नहीं दिया गया तो इस प्रकार का ‘संयम’ यकीनन हमारे लिए मुसीबत का सबब बन जाएगा।
भारतीय हुक्मरान यह भी जानते हैं कि पाकिस्तान से वार्ता एक सियासी कवायद है जिसका ठोस परिणाम शायद ही कभी निकलेगा। उमर जिस वैकल्पिक विचार की बात करते हैं उसमें सिर्फ निशाना बनते रहने की बात नहीं । बल्कि सठ साठ्यम समाचरेत यानी जैसे को तैसा का जवाब देने की वकालत की है। दुष्ट को उसी की भाषा में जवाब देना होता है। हमारा दुश्मन सीमापार से गोलियां बरसा रहा हो तो उसकी गोलियां वार्ता से शांत नहीं होगी बल्कि उसका जवाब गोलियां ही होगी। हम धीरे धीरे उस लकीर की तरफ बढ़ रहे हैं जो इस बात की तरफ इशारा कर रही है- अब नहीं तो कभी नहीं।



First Published: Wednesday, October 23, 2013 - 19:36


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