अब दिखेगा केजरीवाल सीजन-2?

Last Updated: Sunday, February 16, 2014 - 15:28

सुधीर चौधरी
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पद से इस्तीफा दे दिया है। केजरीवाल और एएपी के लोग इस इस्तीफे को राजनीतिक शहादत बता रहे हैं। समर्थकों का तर्क है कि जनलोकपाल के लिए केजरीवाल ने मुख्यमंत्री की कुर्सी त्यागने में भी एक पल नहीं लगाया। लेकिन, क्या वास्तव में ऐसा है? क्या वास्तव में अरविंद केजरीवाल राजनीति के ‘शिकार’ हुए हैं या एक ‘शिकारी’ के तौर पर उभरे हैं? क्या केजरीवाल ने वास्तव में कोई त्याग किया है? या 48 दिनों की उनकी राजनीति और फिर जनलोकपाल के लिए इस्तीफा एक कसी पटकथा का हिस्सा है?
चलिए, बात शुरु से करते हैं; अरविंद केजरीवाल एंड टीम को दिल्ली में 70 में से सिर्फ 28 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी को 32 सीटें। सरकार बनाने के लिए उन्हें 36 सीटों की ज़रुरत थी। दिल्ली में उन्हें सरकार में देखने वालों से कहीं ज्यादा उन्हें विपक्ष में देखने वाले थे। इसका सीधा मतलब यह कि दिल्ली में एएपी को जनादेश नहीं मिला था। लेकिन, पूरे ड्रामे के बाद जनमत संग्रह का कार्यक्रम किया गया और एएपी ने सीमित लोगों की इच्छा को दिल्ली की जनता का जनादेश कहकर जनादेश ओढ़ लिया। सरकार बन गई।
48 दिनों में अरविंद केजरीवाल ने धुआंधार बल्लेबाजी की। ताबड़तोड़ तरीके से कुछ वादों को निभा भी दिया। बिजली के दामों में 50 फीसदी की कटौती करने की घोषणा की। 700 लीटर पानी प्रतिदिन मुफ्त देने की घोषणा कर दी। भ्रष्टाचार की शिकायत के लिए कॉल सेंटर बना। नर्सरी एडमिशन के लिए हैल्पलाइन का गठन हुआ। इसके अलावा कभी बयानबाजी-कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस और कभी कोरी ड्रामेबाजी से अपनी सक्रियता का अहसास कराया। लेकिन, 48 दिन बाद अरविंद केजरीवाल से कुछ सवाल तो पूछे ही जाने चाहिए?
आखिर, केजरीवाल रॉबर्ट वाड्रा को लेकर चुप क्यों रहे, जबकि सत्ता में आने से पहले वह लगातार वाड्रा के खिलाफ बोलते रहे थे। उनकी राजनीतिक ज़मीन तैयार करने में उनके वाड्रा विरोध का हाथ रहा था और लोग वाड्रा के खिलाफ कदम उठाए जाने की उनसे अपेक्षा कर रहे थे लेकिन वह चुप रहे।
कानून मंत्री सोमनाथ भारती को लेकर अरविंद केजरीवाल क्यों चुप रहे? इन 48 दिनों में अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस को बिलकुल परेशान नहीं किया। शीला दीक्षित को जरुर परेशान किया लेकिन शीला दीक्षित तो खुद कांग्रेस में हाशिए पर ढकेली जा चुकी हैं। अरविंद केजरीवाल ने पूछा जाना चाहिए कि हर बात पर जनादेश करने वाली एएपी ने इस्तीफे के वक्त जनादेश क्यों नहीं किया?
दरअसल, एएपी का लक्ष्य लोकपाल नहीं लोकसभा है, और केंद्र में आम आदमी नहीं आम चुनाव हैं। और इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ही अरविंद केजरीवाल ने एक स्क्रिप्ट लिखी थी। बेहद सधी और कसी पटकथा। इस पटकथा में आम आदमी का दर्द था, जज़्बातों का सैलाब था, कानून के खिलाफ मोर्चा खोलता नायक था, भीड़ थी, खलनायक थे और कुर्बानी की नौटंकी भी।
अरविंद केजरीवाल ने एक पटकथा लिखी और 48 दिनों तक पटकथा पर डटे रहे। यह उनकी खासियत थी। अपनी स्क्रिप्ट में उन्होंने सलीम जावेद जैसे स्क्रिप्ट राइटर्स को भी पानी पिला दिया। क्योंकि, शुरु से अंत तक वही हुआ, जो केजरीवाल चाहते थे। इस बीच, लीक से हटकर अपनी सोच के बूते केजरीवाल ने यह तो दिखा ही दिया कि चाहने पर कुछ भी हो सकता है। देश के सड़े गले राजनीतिक सिस्टम पर केजरीवाल ने करारी चोट की और लाल बत्ती और वीआईपी कल्चर के खिलाफ मुहिम छेड़ी। जनता से सीधे संवाद कर केजरीवाल ने बीजेपी-कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टियों को संदेश दे दिया कि अब पुरानी राजनीति के लिए जगह नहीं बची है और राजनीति करनी है तो जनता को साथ लेना होगा।
हां, केजरीवाल बंगलों से लेकर सुरक्षा के मुद्दे पर कई बार आम आदमी से खास आदमी बनते दिखे, और अधूरे वादों पर लोगों के निशाने पर भी आए। लेकिन, उन्हें मालूम था कि जनलोकपाल का मुद्दा ही उन्हें सुरक्षित बाहर निकलने का मौका दे सकता है। यह उनकी स्क्रिप्ट का `पीक प्वाइंट` था। और केजरीवाल ने इस पीक प्वाइंट पर अपनी स्क्रिप्ट में वह टर्निंग प्वाइंट दिया है, जहां से आगे की राह सीक्वल की तरफ जाती है।
तो क्या अब केजरीवाल की फिल्म का सीक्वल दिखायी देगा। अगर केजरीवाल के 48 दिनों को टीवी के सीरियल की तरह देखें तो कहना होगा कि क्या केजरीवाल के सीरियल का सीजन-2 अब दिखायी देगा?
(लेखक ज़ी न्यूज के एडिटर हैं और आप उन्हें ट्विटर पर फॉलो कर सकते हैं-



First Published: Saturday, February 15, 2014 - 16:38


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