अवसरवादिता की राजनीति

By Vasindra Mishra | Last Updated: Tuesday, June 17, 2014 - 22:36
अवसरवादिता की राजनीति

वासिंद्र मिश्र
संपादक, ज़ी रीजनल चैनल्स

राजनीति में ना तो कोई दोस्त होता है ना दुश्मन, जरूरत के हिसाब से रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं। अब जब एक बार फिर लगभग तीन दशक बाद देश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है तो क्षेत्रीय दलों में खलबली मच गई है। ये खलबली अस्तित्व की लड़ाई से जुड़ी हुई है। लिहाजा भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते हुए प्रभाव को कम करने के लिए राजनीतिक ध्रुवीकरण होने लगा है।

शुरुआत हुई है बिहार से जहां मुद्दे को आधार बनाकर राजनैतिक विरोधी जनता दल युनाइटेड और राष्ट्रीय जनता दल एक साथ आ गए हैं। विरोधी होते हुए भी दोनों ही पार्टियां एक मुद्दे पर सहमत हैं कि बीजेपी को सत्ता में नहीं आने देना है। लिहाजा जब नीतीश ने इस्तीफा दिया और पार्टी में टूट की खबरें आने लगीं तो मदद का हाथ बढ़ाया आरजेडी ने जो पिछले कई साल से बिहार की राजनीति में आमने सामने की लड़ाई लड़ रहे थे।

शुरुआत मुद्दा आधारित तालमेल से हुई है जो बहुत मुमकिन है कि आगामी चुनाव तक गठबंधन में बदल जाए। दोनों पार्टियों के तेवर देश की राजनीति में हुए बड़े बदलाव की वजह से बदले हैं। दरअसल बीजेपी को मिली शानदार जीत ने कई राज्यों के क्षत्रपों का सूपड़ा साफ कर दिया। लिहाजा अपने अपने राज्य में ये क्षत्रप अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए मजबूर दिखाई दे रहे हैं और ये हाल सिर्फ बिहार का नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों का भी यही हाल है। बहुजन समाज पार्टी का लोकसभा से सूपड़ा साफ हो चुका है और समाजवादी पार्टी महज अपनी पारिवारिक सीट बचा पाई है। दोनों ही पार्टियों को अपने ऐसे राजनीतिक हश्र का इल्हाम नहीं रहा होगा। लिहाजा जब हार का स्वाद चखना पड़ा है और अस्तित्व बचाए रखने की जद्दोजहद चल रही है तो लगभग एक ही तरह क्राइसिस से जूझ रहे राजनीतिक दलों में आपसी सौहार्द बढ़ रहा है।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार मायावती के परिवार के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई से बच रही है। मायावती के करीबी रिश्तेदारों का कारोबार विवादों के बाद भी निर्बाध चल रहा है। बल्कि उनके कारोबार में इज़ाफा होता जा रहा है। नोएडा प्राधिकरण में मायावती के करीबी यादव सिंह की बहाली भी इसी आापसी सौहार्द के तहत उठाया गया एक कदम है। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के चेयरमैन और सीईओ रमारमण भी मायावती के कार्यकाल से लेकर अभी अपने पद पर बने हुए हैं और इनके खिलाफ जांच ठंढ़े बस्ते में जा चुकी है।

नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस वे में अहम पद पर काबिज रहे मोहिंदर सिंह का नाम भी इसी लिस्ट में शामिल है जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं और ऐसा लगता था कि मायावती की सरकार जाने के बाद इनके खिलाफ आरोपों की जांच होगी लेकिन इनके खिलाफ भी मामला ठंढ़े बस्ते में डाला जा चुका है। मुलायम सिंह यादव का ये लचीला रुख शायद भविष्य के राजनैतिक गठबंधन के विकल्प को खुला रखने की कवायद है। यहां इस बात का ध्यान भी रखना होगा कि तमाम कड़वाहटों के बीच दोनों पार्टियों के सामने एक ही तरह का संकट है और वो है अस्तित्व की लड़ाई। ये बात भी गौर करने लायक है कि इन दोनों पार्टियों के बीच पहले भी गठबंधन हो चुका है और उस बार भी इनका समझौता बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए ही हुआ था। ये भी सच है कि इनके गठबंधन का खात्मा बड़े ही नाटकीय अंदाज में हुआ जब गेस्ट हाउस में समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने 2 जून 1995 को मायावती पर हमला कर दिया था, क्योंकि मायावती ने समाजवादी पार्टी से समर्थन वापस ले लिया था और समाजवादी पार्टी की सरकार गिर गई थी। फिर मायावती बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गईं लेकिन ये भी सच है कि बीएसपी के संस्थापक कांशीराम पहली बार मुलायम सिंह यादव के सहयोग से ही इटावा की सीट से लोकसभा पहुंचे थे।

अभी ये बात भले ही पढने और सुनने में अजीब लग रही हो लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। इतिहास इस बात का गवाह है कि सत्ता तक पहुंचने के लिए धुर विरोधी पार्टियां भी पास आती रही हैं और इस बार के चुनाव का जो गणित है वो इस बात को और बल देता है। समाजवादी पार्टी हो या फिर बहुजन समाज पार्टी इनका वोट परसेंट अच्छा रहा है। दरअसल चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक वोट परसेंटेज के लिहाज से बीएसपी तीसरे और एसपी चौथे नंबर पर रही है और सीट के मामले में बीएसपी के हाथ खाली हैं जबकि समाजवादी पार्टी की झोली में 5 सीटें आई हैं। बीएसपी को 4.1 फीसदी वोट मिला है जबकि समाजवादी पार्टी को 3.4 फीसदी वोट मिले हैं। ऐसे में अगर ये दोनों पार्टियां साथ आती हैं तो इनका वोट बेस काफी मजबूत हो जाएगा। बिहार की दोनों पार्टियों आरजेडी और जेडीयू का वोट प्रतिशत भी कई पार्टियों से बेहतर है। आरजेडी को जहां इस बार 1.3 फीसदी वोट मिले हैं वहीं जेडीयू 1.1% वोट हासिल कर पाई है। ऐसे में इनकी भी सियासी मजबूरी है कि आपसी सौहार्द बनाए रखें ताकि अपने अपने दलों का राजनीतिक भविष्य सुरक्षित रख सकें। साथ ही दूसरी ताकतवर पार्टियों को चुनौती देने की हालत में रहें।

एक्सक्लूसिव

First Published: Tuesday, June 17, 2014 - 22:36


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