सोनिया का 'पुत्र मोह' कहीं पार्टी पर भारी न पड़ जाए!

Last Updated: Wednesday, November 6, 2013 - 20:16

सुधीर चौधरी
लोकसभा चुनावों के लिए देश के दोनों मुख्य राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है और मिशन-2014 में फतेह के लिए कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने अपना दांव एक-एक राजनेता पर खेल दिया है- राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी। बीजेपी के भीतर आम कार्यकर्ताओं और आरएसएस की इच्छा यही थी कि पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़े। लेकिन, सवाल बीजेपी का नहीं कांग्रेस का है। कांग्रेस के लिए 2014 का चुनाव संभवत: 1977 में इमरजेंसी के बाद सबसे मुश्किल चुनाव है, जब उत्तर भारत में कांग्रेस के लिए अपना अस्तित्व बचाना बड़ी चुनौती है।
महंगाई और भ्रष्टाचार का डंक कांग्रेस को डरा रहा है और विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहे पार्टी के तमाम बड़े नेता खास उम्मीद जगाते नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में पार्टी के लिए ज़रुरी था कि अनुभवी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी मोर्चा संभालतीं और मुश्किल वक्त में पार्टी की दशा-दिशा तय करतीं। लेकिन, मिशन-2014 के लिए बिछी बिसात में सोनिया गांधी नदारद हैं। कांग्रेस के पोस्टर पर सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी हैं। कांग्रेस अपनी फिल्म को सिर्फ इसी सोलो हीरो के बूते हिट कराने पर आमादा है, जबकि उसके पास सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह जैसे कुछ ऐसे मजबूत कलाकार हैं, जिनकी विश्वसनीयता कम से कम अभी भी है। सवाल उठना लाज़िमी है कि कांग्रेस के पूरे प्रचार अभियान से सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह नदारद क्यों हैं?
मनमोहन सिंह को लेकर एक धारणा यह है कि वह अब सिर्फ वक्त काट रहे हैं। अगर यूपीए-3 की सरकार बन भी गई तो मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री नहीं होंगे। फिर मनमोहन सिंह न तो शानदार वक्ता हैं और ना उनके दूसरे कार्यकाल में ऐसी उपलब्धियां हैं, जिन्हें वो शान से गिना सकें। इसके अलावा कोल ब्लॉक्स आवंटन मामले में उनका नाम घसीटे जाने के बाद कई कांग्रेसी उनसे दूरी बनाना चाहते हैं।
लेकिन, सोनिया गांधी पूरे कैंपेन से दूर क्यों हैं? इसकी दो वजह हो सकती हैं। सोनिया गांधी की तबियत नासाज चल रही है और उनकी बीमारी शायद उन्हें राजनीति में सक्रिय पारी खेलने की इजाजत नहीं दे रही हो। लेकिन, बड़ी संभावना यह है कि सोनिया ने राहुल को पार्टी की कमान पूरी तरह सौंप दी है, और अब वे राहुल की रणनीति में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहतीं।
भारतीय संस्कृति में माताएं पुत्रों को सत्ता के सर्वोच्च पद पर देखने को आतुर रहती हैं। अनेक भारतीय पौराणिक कहानियां इस धारणा की पुष्टि करती हैं। रामायण में कैकेयी का भरत के लिए पुत्र मोह विख्यात है। दिलचस्प बात यह है कि इटली की पौराणिक कहानियों में भी पुत्रमोह संबंधी कहानियों का भंडार है। इटली में मां-बेटे का संबंध भारत और कई मामलों में भारत से अधिक प्रगाढ़ देखा जाता है। हाल में हुए एक सर्वे के मुताबिक इटली में दस में से तीन तलाक की वजह यह है कि मां अपने बेटे की जिंदगी में बहुत अधिक दखल देती हैं। इटली की संस्कृति यूरोपीय संस्कृति और जीवन शैली से अलग है। इटली में आज भी ज्यादातर महिलाएं घर में रहना पसंद करती है और अपने बेटों के भविष्य के लिए चिंतित रहती हैं।
सोनिया गांधी का संबंध इटली और भारत दोनों से है, और दोनों देशों की परंपरा और संस्कृति पुत्र मोह के लिए विख्यात है। तो क्या सोनिया ने इसी पुत्र मोह में कांग्रेस से दूरी बनाकर राहुल को पार्टी का सर्वेसर्वा बना दिया है? राहुल बिंदास-बेबाक होकर फैसले ले रहे हैं और बातें कर रहे हैं। लेकिन, उनका बिंदास अंदाज और बेबाक बयान पार्टी को लगातार विपक्ष के सामने कमजोर कर रहा है। इंदौर में आईएसआई संबंधी उनके बयान पर चुनाव आयोग ने उसने जवाब तक मांग लिया है।
कांग्रेस के पास सोनिया और प्रियंका के रूप में तुरुप के इक्के हैं, जो चुनाव प्रचार में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। साफ साफ कहें तो नरेंद्र मोदी की लहर का सामना कर सकते हैं। लेकिन, सोनिया और प्रियंका को चुनाव प्रचार से दूर रखना कहीं कांग्रेस के लिए बड़ी राजनीतिक भूल तो नहीं है?

मुझे लगता है कि कांग्रेस की तरफ से सोनिया गांधी को मैदान में उतरना चाहिए। सोनिया गांधी आदर्श मां ज़रुर हैं, लेकिन वह देश की सबसे पुरानी पार्टी की प्रमुख भी हैं। वो कांग्रेस पार्टी, जिसकी अपनी विशिष्ट विचारधारा रही है, और कई बार लोग ठगे जाने की बात कहते हुए भी उस पर भरोसा जताते रहे हैं। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष छवि और अखिल भारतीय मौजूदगी उसके विस्तार का आधार रहा है।
राहुल गांधी के लिए यह पहला चुनाव है, जब वह फ्रंट फुट पर खेल रहे हैं। लेकिन, सोनिया का अनुभव वह कहां से लाएंगे? सोनिया की स्वीकार्यता यूपीए के बीच फेविकोल के जोड़ का काम करता है, जबकि राहुल को अभी इस मोर्चे पर खुद को साबित करना है। आज तीसरे मोर्चे की आहट ही इसलिए हो रही है क्योंकि यूपीए के कुछ घटक तीसरे मोर्चे में अपना भविष्य तलाश रहे हैं।
निश्चित रुप से आज कांग्रेस को सोनिया की सबसे ज्यादा ज़रुरत है। कांग्रेस के लिए यह वक्त सचेत होने का है। सोनिया गांधी के सलाहकारों को उन्हें सलाह देनी चाहिए कि वह सक्रिय हों और कहीं ऐसा न हो कि जब तक वह हालात की गंभीरता को समझें, तब तक काफी देर हो चुकी हो। विधानसभा चुनावों से पहले ही डैमेज कंट्रोल की कोशिश सोनिया की तरफ से होनी चाहिए। इसके लिए सोनिया को कम से कम दो रैलियां ज़रुर करनी चाहिए। एक दिल्ली में और दूसरी किसी दूसरे बड़े शहर में। यहां कांग्रेस को अपनी पूरी ताकत झोंक देनी चाहिए। इन रैलियों में सोनिया को मोदी के हर सवाल का जवाब सिलसिलेवार तरीके से देना चाहिए, जबकि कांग्रेस के नेताओं को जिम्मेदारी उठानी चाहिए कि रैली में भीड़ मोदी की रैलियों से कम न लगे।
आखिर मुकाबला दिलचस्प होना चाहिए। नरेंद्र मोदी रैलियों की भीड़ के सहारे वॉकआउट नहीं ले सकते। देश में दो बड़ी पार्टियां हैं तो दोनों के दावे और वादे कायदे से जनता के सामने आने चाहिए। आगामी लोकसभा चुनाव पर देश ही नहीं बल्कि दुनिया की नज़र है। इन चुनावों को रोचक होना ही चाहिए। इन चुनावों को रोचक होना ही होगा। लेकिन, ऐसा तब ही होगा जब कांग्रेस पूरी शिद्दत से मैदान में उतरेगी।
(लेखक ज़ी न्यूज के एडिटर हैं और आप उन्हें ट्विटर पर फॉलो कर सकते हैं-



First Published: Wednesday, November 6, 2013 - 13:16


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