यह उदासीनता आत्मघाती है ?

Last Updated: Sunday, February 16, 2014 - 21:25

अवधेश कुमार मिश्र
अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जब भारत के आध्यात्मिक जीवन और संस्कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा होती है, तब सरकार से लेकर समाज के हर वर्ग का सीना भारतीय होने के गर्व से चौड़ा हो जाता है। प्रतियोगिता की आंधी में उलझ चुकी पश्चिमी दुनिया, जब हिंदुस्तान में शांति की तलाश के लिए आती है, उस वक्त भी हमें अपने पुरखों की सहेजी विरासत पर फूल कर गुब्बारा होने का मौका मिल जाता है। लेकिन वर्तमान में हम अपनी उस विरासत को ठीक उसी तरह से खोते जा रहे हैं जैसे तेज बहाव वाली नदीं में पैरों के नीचे से बालू खिसक जाती है और स्नानार्थी जल की शीतलता के आनंद में ही मग्न रह जाता है, उसे होश तब आता है जब तेज़ जलधारा उसके पैरों को सतह से उखाड़ कर फेंक चुकी होती है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि “किसी देश की महानता और उसका नैतिक सम्बल इस बात से मूल्यांकित किया जा सकता है कि वहां पशुओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है”। हिंदुस्तान के लोकतांत्रिक जीवन में हर गतिविधि को गांधी के सिद्धान्तों से तौलने की एक परंपरा है, इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अगर उनके कथन को पशुओं के संदर्भ में देखा जाए तब बड़ी निराशाजनक तस्वीर देखने को मिलती है।

वैदिक-काल से ही इस देश में पशुओं को धन की श्रेणी में रखा जाता रहा है, फिर वह चाहे दुधारू पशु रहे हों या ऐसे जिनसे मानव जीवन कोई लाभ नहीं उठा सकता। लेकिन आज के हालात पर आप गौर करेंगे तो पता चलेगा कि गोधन-पशुधन की परिकल्पना को आत्मसात करने वाला देश, पशुओं के प्रति संवेदनहीनता और क्रूरता की पराकाष्ठा पर पहुंच चुका है। कहीं उन्हें काटकर बेंचने की होड़ लगी है तो कहीं ऑक्सीटोसिन की पीड़ादायी प्रक्रिया के साथ डेरी का व्यापार को चमकाया जा रहा है। यह वही देश है जिसने दुनिया को प्राणिमात्र पर दया करने का पाठ पढ़ाया है, फिर क्या वजह है कि हमारे आस-पास रहने वाले पशुओं को भूखे-प्यासे प्रताणित जीवन जीना पड़ रहा है। यह सवाल ऐसे हैं जिनका भागती-दौड़ती जिंदगी के बीच पिस रहे लोगों के लिए भले ही कोई मायने नहीं होंगे, लेकिन उनके लिए ये सवाल लाख टके का है जो भारतीय संस्कृति की अस्मिता को सहेजने की भावना रखते हैं या खुद को सांस्कृतिक मुहिम का पुरोधा समझते हैं।
हिंदुस्तान में बेजुबानों की हालत पर गौर करना है तो कभी ग्लोबल कंपटीशन की आंधी से थोड़ा वक्त निकालकर सड़क के किनारे पड़े कूड़े के किसी ढ़ेर या कूड़ेदान पर नज़र डालिएगा। उसके आस-पास भूख से तड़पते कुत्ते और गाय-बैलों का झुंड मिल जाएगा, जो इंसानी अपशिष्ट में अपने जीवन की किरण तलाश रहा होगा। खाने की तलाश में ये जानवर कई बार भयंकर दुर्घटना के शिकार होते हैं और कई दिनों तक तड़पने के बाद दम तोड़ देते हैं, लेकिन इनके बगल से गुजरने वाली ग्लोबल कंपटीशन की आंधी को कोई फर्क नहीं पड़ता। यहां एक बात पर गौर करना बेहद जरूरी है कि सड़क पर दम तोड़ देना ही इन जानवरों के लिए बेहतर होता है, क्योंकि अगर गलती से ये किसी सरकारी बाड़े में पहुंच गए तब वहां की बदइंतज़ामी ना तो इन्हें मरने देती है और ना ही जीने लायक छोड़ती है।
ऐसा नहीं है कि पशुओं के प्रति यह सामाजिक उदासीनता केवल देश के सांस्कृति पक्ष को ही नुकसान पहुंचा रही है। यह उदासीनता इतनी भयंकर है कि देश के आंतरिक ढ़ांचे और सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा पैदा हो गया है। दरअसल एनीमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया द्वारा बनाई गई समिति ने 6-4-2001 में केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें कहा गया था कि भारत से भारी मात्रा में पशुओं की तस्करी बांग्लादेश के लिए की जा रही है, लेकिन सरकार ने उस रिपोर्ट को शायद कूड़े के ढ़ेर में ही फेंकना उचित समझा। पशु तस्करी को रोकने की सिफारिश वाली वह रिपोर्ट इसलिए नहीं थी कि जानवरों पर दया की जाए, बल्कि पूरी दुनिया इस बात को लेकर चिंता जता रही है कि पशुओं की तस्करी से जमा होने वाला फंड आतंकवाद को पालने-पोषने में इस्तेमाल किया जा रहा है। जहां दुनिया भर में पशु-तस्करी को रोकने के लिए मजबूत तंत्र विकसित किया जा रहा है वहीं आएदिन आतंक के तमाचों और धमाकों से हिले रहने वाले हिंदुस्तान के रहनुमाओं की नींद ही नहीं टूट रही है। पशु-तस्करी और आतंक के कनेक्शन के मद्देनजर ही देश के एक बड़े अखबार ने 3-10-2008 को एक खबर प्रकाशित की जिसमें उत्तरप्रदेश सरकार के उस खुलासे का जिक्र था जिसमें कहा गया था कि प्रदेश से लगभग 15 हजार करोड़ रुपए सालाना की पशु तस्करी की जा रही है और उस धन का अधिकतम हिस्सा आतंकियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और उन्हें आर.डी.एक्स, डेटोनेटर मुहैया कराने में किया जा रहा है। इतना सब कुछ होने के बाद भी देश के रहनुमा चुप बैठे हैं, इसे देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहेंगे ?
ऐसा नहीं कि पशुओं के प्रति अत्याचार और उदासीनता की ये कहानी केवल तस्करी तक ही सीमित है। तस्करी भले ही चोर-छिपे हो रही है लेकिन कई कहानियां ऐसी भी हैं जिन्हें डंके की चोट पर अंजाम दिया जा रहा है और पशुओं के कल्याण से संबंधित विभाग आंख मूंद कर बैठे हैं। पशुओं के स्तर पर हो रहे सरकारी नाकारापन की तस्वीर के बाद इस बात पर भी गौर करना ज़रूरी है कि आखिर मानवीय जीवन को लेकर सरकार कितनी बेफिक्र हो चुकी है। हॉर्वड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ(बोस्टन) ने अपने शोध के बात ये निष्कर्ष दिया कि रेड मीट(स्तनधारियों का मांस) मानव जीवन के लिए बेहद खतरनाक है और यह कैंसर के बड़े कारक के तौर पर समाने आ रहा है। अपने नागरिकों के स्वास्थ्य के प्रति सजग जहां कई देशों ने इस रिसर्च के सामने आने के बाद लोगों के बीच जागरुकता अभियान शुरु कर दिया वहीं हिंदुस्तान का ध्यान केवल मुनाफा देने वाले रेड-मीट उद्योग के बढ़ाने में लगा रहा।
आंकड़ों की कहानी पर गौर करें तो पता चलता है कि भारत में मांस का निर्यात हर साल रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज करते हुए करोड़ों टन प्रतिवर्ष तक पहुंच चुका है, भैंसों के मांस का निर्यात करने के मामले में भारत दुनिया में चौथा स्थान रखता है, लेकिन यह खतरनाक उपलब्धि जिन परिस्थितियों में हासिल की जा रही है वह पशुओं पर की जाने वाली क्रूरता की हर हद को पार कर चुकी है। देश के लगभग चार हजार लाइसेंसी कत्लगाहों में केवल पशुओं की ही हत्या नहीं की जा रही बल्कि उन मानकों की भी हत्या हो रही है जिसके अंतर्गत पशु को काटने का निर्देश ‘’एनिमल एक्ट’’ में दिया गया है।
कई सामाजिक संगठनों ने 12वीं पंचवर्षीय योजना में मांस निर्यात पर रोक लगाने की मांग योजना आयोग से की थी, लेकिन जिस देश में नागरिकों के हक की बात सुनने की ताकत हुक्मरान ना रखते हों वहां पशुओं की सिफारिश सुनने का वक्त भला किसके पास है।
हैरानी वाली बात तो यह है कि जिस वक्त दुनिया भर के वैज्ञानिक चीख-चीख कर यह बात कह रहे हैं कि रेड मीट स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक साबित होता है, उस वक्त हिंदुस्तान में रेड मीट के उत्पादन और उपभोग को बढ़ाने की मुहिम चल रही है। जहां पूरी दुनिया इस बात को लेकर चिंतित है कि पशुतस्करी आतंक के लिए संजीवनी साबित हो रही है वहीं हिंदुस्तान में इस विषय पर बातचीत करना भी सत्तानवीसों को ज़रूरी नहीं लगता। भौतिक जीवन सरकारी नीतियां बर्बाद कर रही हैं और सांस्कृतिक मूल्यों से समाज मुंह मोड़ने लगा है। जिन बच्चों के हांथों में कभी गाय और कुत्तों को खिलाने के रोटियां पकड़ाई जाती थीं, आज उनके हाथों में डिजिटल ज़माने के रिमोट दिए जाने लगे हैं। बचपन से ही मिलने वाली सेवा-दया की भावना मार-काट वाले वीडियों गेम्स में गायब हो रही है लिहाजा ये समझना मुश्किल नहीं कि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत से दूर क्यों होते चले जा रहे हैं। साथ ही ग्लोबल पीस इंडेक्स पर हिंदुस्तान की बिगड़ती हालत के पीछे भी समाजिक दायित्वों के प्रति उदासीनता एक बड़े कारण के तौर पर देखी जा सकती है। लिहाज़ा वक्त रहते संभल जाना बेहद ज़रूरी है।

(लेखक ज़ी रीजनल चैनल्स मध्यप्रदेश/ छत्तीसगढ़ में एसिस्टेंट प्रोड्यूसर हैं)



First Published: Sunday, February 16, 2014 - 21:21


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