राजनैतिक साजिश का शिकार विदर्भ

By Vasindra Mishra | Last Updated: Thursday, July 31, 2014 - 21:03
राजनैतिक साजिश का शिकार विदर्भ

तेलंगाना के गठन के बाद देश में विदर्भ राज्य के गठन की मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। विकास के मसले पर विदर्भ को अलग राज्य बनाए जाने की मांग लंबे समय से की जा रही है। अलग-अलग क्षेत्र के लोग विदर्भ को अलग राज्य बनाए जाने की मांग कर रहे हैं, इनमें महाराष्ट्र के पूर्व डीजीपी प्रबीर चक्रवर्ती, डा. रमेश कुमार और धनंजय धार्मिक शामिल हैं। हमारे खास कार्यक्रम 'सियासत की बात' में ज़ी रीजनल चैनल्स के संपादक वासिन्‍द्र मिश्र ने इनसे खास बातचीत की, पेश हैं इसके प्रमुख अंश:-  

 
वासिन्द्र मिश्र : सबसे पहले चक्रवर्ती साहब आपसे जानना चाहेंगे कि विदर्भ को अलग राज्य बनाने की मांग कब से चल रही है और इसमें क्या अड़चने हैं जिस वजह से देश में अलग-अलग छोटे-छोटे राज्य बने लेकिन विदर्भ को लेकर अभी भी केन्द्र सरकार या महाराष्ट्र की सरकार कोई फैसला नहीं ले पा रही है?
प्रबीर चक्रवर्ती : इसका जो ऐतिहासिक साक्ष्य मिलता है उसके मुताबिक 1905 में सबसे पहले विदर्भ की मांग की गई और वो मांग इसलिए की गई थी कि तब निज़ाम के चार जिले जिसको बरार प्रांत कहते हैं। अभी उन्हें सेंट्रल प्रोविंस में मिलाया गया था, उस समय भी ये कहा गया था कि बरार और उसके साथ लगे हुए 4 जिले, जो अब 6 हो गए हैं, ये अलग राज्य बनें। दिलचस्प बात ये है कि इसकी सिफारिश तत्कालीन डिविज़नल कमिश्नर ने की थीं, लेकिन मसला वही रह गया। 1920 में और 1928 में कांग्रेस के जो 2 अधिवेशन हुए, उसमें भी उन्होंने कहा कि विदर्भ अलग होना चाहिए। विदर्भ असल में एतिहासिक दृष्टि से, सामाजिक दृष्टि से और आर्थिक दृष्टि से हमेशा ही एक स्वतंत्र राज्य के रुप में ही रहा है। अगर आप हमारे पुराणों को देखें तो उसमें आपको मिलेगा कि विदर्भ की चर्चा है। विदर्भ की कन्या रुकमणि का हरण श्री कृष्ण ने किया। विदर्भ की विदुषी लोपामुद्रा का विवाह अगस्त मुनि से हुआ तो इस तरह के रेफरेंस आपको मिलते रहेंगे।

वासिन्द्र मिश्र : या और पीछे चलें तो इन्दुमती...?
प्रबीर चक्रवर्ती : इन्दुमती मतलब...श्री रामचन्द्र जी की दादी...दमयन्ती...वो भी विदर्भ से थीं। दमयन्ती वो भी विदर्भ से थीं तो इस तरह एक ऐतिहासिक दृष्टि से भी ये एक अलग भाग रहा है। बीच में जो पीरियड आया उसमें भी ये गोंड, भोंसलों का जो राज रहा उसमें भी ये अलग ही रहा है। भोंसला जो है ये कभी भी पेशवा के ठीक अधीन नहीं रहे ये अलग ही अपना स्वतंत्र रहे। इस तरह से एक स्वतंत्र राज्य की कल्पना विदर्भ के मानसिकता में बहुत पहले से है। हम अगर और नज़दीक आएं तो 1938 में जब डोमेनियन रुल में पहली बार प्रोवेंशियल एसेंबलीज बनी, तो उस समय अलग विदर्भ राज्य का प्रस्ताव एक मत से पारित किया। 1948 में जस्टिस दर की अध्यक्षता में, उन्होंने भी कहा कि विदर्भ अलग होना चाहिए। 1950 में एआईसीसी की बनाई हुई 'जेवीपी' मतलब जवाहर लाल नेहरु, वल्लभ भाई पटेल और पट्टाभी सीतारमैया की समिति ने भी कहा था कि महाराष्ट्र और विदर्भ को अपना राज्य चुनने का अधिकार होना चाहिए। राज्य पुनर्रचना आयोग जिसे फज़ल अली कमीशन के नाम से जानते हैं, ने बाकी राज्यों की कल्पना भाषावार प्रांत में की, लेकिन विदर्भ के बारे में उन्होंने खास पूरा एक चैप्‍टर लिखा। इस चैप्‍टर में उन्होंने 2-3 बातें साफ बताई। पहली बात उन्होंने बताई कि विदर्भ जो है वो एक सम्पन्न भाग है और इस सम्पन्न भाग को अगर महाराष्ट्र के साथ शामिल कर दिया जाए तो इसपर सतत अन्याय होता रहेगा और महाराष्ट्र सुधरता रहेगा। आश्चर्च की बात है कि 1955 में उन्होंने जो ये भविष्यवाणी  की थी वो सारी की सारी सही निकली। आपको याद होगा फज़ल अली कमीशन के चेयरमैन जस्टिस फज़ल अली जी थे, हृदयनाथ जी कुंजरु और साथ में सरदार पणिक्कर, ये उसके सदस्य थे।

वासिन्द्र मिश्र : तो अब आपको लगता है कि जो अलग राज्य नहीं बन रहा है विदर्भ, उसके पीछे राजनैतिक  कारण ज्यादा है, आर्थिक या सामाजिक कारण कम है?
प्रबीर चक्रवर्ती : बिल्कुल, राजनीतिक कारण ही है क्योकि 1953 में भी जब विदर्भ को वहां मिलाया गया और एक नागपुर पैक्ट बना, ये पैक्ट विदर्भ के उस समय के नेताओं और बाकी महाराष्ट्र के उस समय के नेताओं के बीच हुआ था इसमें सीधा-सीधा ये था 23 प्रतिशत विदर्भ की लोकसंख्या है तो 23 प्रतिशत हमें नौकरियां मिलेंगी, 23 प्रतिशत मिनिस्टर मिलेंगे, 23 प्रतिशत बजट का भाग मिलेगा और 23 प्रतिशत उच्च शिक्षा और वोकेशनल ट्रेनिंग का भाग हमको मिलेगा। आश्चर्य की बात ये है कि इस पर कभी अमल नहीं हुआ। हालांकि 1960 में जब ये री-आर्गेनाइजेशन बिल उस समय के बॉम्बे असेंबली में आया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री यशवंत राज जी चौहान, ने अपने भाषण में कहा कि विदर्भ को नागपुर पैक्ट के मुताबिक ही नहीं बल्कि नागपुर पैक्ट से कुछ ज्यादा ही देंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
 
वासिन्द्र मिश्र : अभी तक जो आंकड़े हैं, कहा जाता है कि लगभग 30 हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं और दूसरी तरफ आपकी जो समिति है, उसका दावा है कि नेचुरल रिर्सोसेज इतना ज्यादा है विदर्भ के पास कि उसको किसी भी राज्य या केन्द्र सरकार से मदद की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। अगर उसको अलग राज्य बना दिया जाए, उसको अपने रिर्सोसेज को ही अपने विकास के लिए, अपने को सस्‍टेन करने के लिए इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी जाए, इसमें क्या सच्चाई है?
प्रबीर चक्रवर्ती : बिल्कुल सही बात है, सच्चाई ये है कि आज विदर्भ में सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में जितना भी वन संपत्ति है, वो प्रैक्टिकली सारी विदर्भ में है। उसके बाद जो खनिज संपत्ति है, वो भी करीब-करीब सारी विदर्भ में है। एक सिर्फ एल्युमनाइट छोड़ दिया जाए तो बाकी सब हमारे पास है। बिजली की जो पैदावार है वो मेरे ख्याल से धार्मिक साहब उस पर ज्यादा काम करते हैं, तो वो ज्यादा उस पर गौर करेंगे। लेकिन मैं जानता हूं कि सबसे ज्यादा बिजली पूरे राज्य में वहीं तैयार होती है तो इस तरह से हमारा भाग जो है वो संपन्न भाग है। अब उसकी संपन्नता जो कम हो गई वो क्यों हुई, इसके बारे में धार्मिक साहब के पास ज्यादा जानकारी है।

वासिन्द्र मिश्र : धार्मिक जी से आपसे जानना चाहते हैं कि अगर विदर्भ में इतनी संपन्नता है तो फिर वहां के किसान इतनी बड़ी तादाद में आत्महत्या क्यों करते हैं? और आत्महत्या के लिए मजबूर क्यों हैं?
धनंजय धार्मिक : इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि विदर्भ में सबसे ज्यादा कपास की खेती होती है लेकिन विदर्भ में कभी कपास के कारखाने नहीं लगे जहां इसके प्रोडक्ट्स बन पाएं और यहां कपास की प्रासेसिंग के लिए जो भी मिलें बनीं, वो सिस्‍टेमेटिकली कॉरपोरेट सेक्‍टर में बनवाकर खत्म कर दी गईं। नागपुर संतरा पूरे देश में प्रसिद्ध है, आज स्थिति ये है कि पिछले कई सालों में एक भी संतरे का प्रोसेसिंग यूनिट विदर्भ में बन नहीं पाया तो जो विदर्भ की फसल है उसका जो प्रोसेसिंग आगे होना है, उसके इंडस्‍ट्रीएलाइजेशन का कभी कोई प्रयास किसी ने किया नहीं और ऐसा नहीं करने की वजह से किसान को उसकी मेहनत का जो मुआवज़ा मिलना चाहिए वो कभी मिला नहीं। दूसरी एक बात ये है कि जैसे हमारे यहां चावल ज्यादा होता है, 5 जिलों में चावल होता है, गेंहू भी होता है लेकिन इसकी एमएसपी यानि मिनिमम सपोर्ट प्राइस केंद्र सरकार तय करती है। वो किसानों के लिए बहुत ही कम होता है। इसके साथ ही किसानों के साथ बंधन होता है कि उन्हें एग्रीकल्‍चर प्राइस मार्केटिंग कमिटी (एपीएमसी) में बेचना चाहिए। आज स्थिति ये है कि अगर 1500 रुपये गेंहू का भाव है तो एपीएमसी में इसका भाव 1200-1300 होता है।

वासिन्द्र मिश्र : तो माने उसको ओपेन मार्केट में बेचने की इजाज़त नहीं है?
धनंजय धार्मिक : नहीं है।

वासिन्द्र मिश्र : और सिंचाई की क्या व्यवस्था है वहां?
धनंजय धार्मिक : सिंचाई की हालत इतनी खराब है, असल में अगर पूरे महाराष्ट्र में देखें तो सबसे ज्यादा नदियां विदर्भ में हैं। प्रेमगंगा, पाटली गोदावरी, वहां बांध नहीं बनने से सिंचाई की व्यवस्था हो ही नहीं पा रही है। उसके कारण 45 लाख हेक्टेयर का पोटेशिंयल होने के बावजूद, पानी ना मिलने के कारण उतना प्रोडक्‍शन नहीं हो रहा और और किसानों को नुकसान हो रहा है।

वासिन्द्र मिश्र : तो ये जो इतने बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं, सिंचाई विभाग में, यहां आपके महाराष्ट्र सरकार के बहुत ज़िम्मेदार एक मंत्री हैं, कई रिपोर्ट्स में उनका नाम आया था। उसके बाद भी वहां सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई, इतने हज़ारों करोड़ रुपया खर्च करने के बाद भी?
धनंजय धार्मिक : हालत ऐसी है कि जहां पानी नहीं है वहां डैम बन गए। कृष्णा नदी पर जो डैम बने हैं वो अगले 10 साल में पानी कितना  और बढ़ेगा उसको ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। आज पानी ना होने के बावजूद और विदर्भ के हिस्से का गोदावरी का 150 टीएमसी पानी आंध्रा को जा रहा है क्योंकि पानी नीचे पानी बह रहा है। गोदावरी पर ना डैम बनाए गए। गोशीखुर्द में 1200 करोड़ का घोटाला हुआ है। पिछले 30 साल से डैम बन रहा है। डैम बन गया तो distributries नहीं बनीं, अब उसके लिए  कह रहे हैं कि 3 हज़ार करोड़ और चाहिए।  

वासिन्द्र मिश्र : तो ये जो डैम बना या जहां पानी नहीं है वहां डैम बन गया। जहां पानी ज्यादा है उसके लिए कोई व्यवस्था नहीं हुई तो किस आधार पर ये फैसले हुए महाराष्ट्र सरकार में और उसके लिए कौन लोग ज़िम्मेदार हैं?
धनंजय धार्मिक : इसके लिए हमारे राजनेता जिम्मेदार हैं जो पॉवर में रहे हैं, जो इरीगेशन डिपार्टमेंट कंट्रोल करते हैं, जो मुख्यमंत्री रहे हैं इन लोगों ने कभी भी विदर्भ के लिए कुछ नहीं किया। एक ही इनका ये रहा कि विदर्भ का जितना भी दोहन किया जाए, जितना भी शोषण किया जाए, वो करें क्योकि इनके पास में नैसर्गिक संपत्ति है नहीं। बिजली चाहिए इनको, तो विदर्भ में कोयले का भंडार है, इसलिए विदर्भ से बिजली ले लो। इंडस्ट्री उनको वहां नहीं चाहिए। इसका एक सबसे बड़ा उदाहरण है अमरावती का इंडियाबुल का थर्मल पॉवर स्टेशन जिसमें ये आयातित कोयला इस्तेमाल करते हैं इन्हें विदर्भ से कोयला नहीं लेना है। ऐसे में पावर स्टेशन अमरावती में क्यों है इसे बॉम्बे में होना चाहिए क्योंकि बॉम्बे में पोर्ट है। इंपोर्ट होकर कोयला वहीं आता है। वहां से नजदीक होता लेकिन वहां नहीं ले रहे।

वासिन्द्र मिश्र: तो इसका फायदा किसको मिल रहा है शरद पवार जी को, अजीत पवार को या उनकी पार्टी को?
धनंजय धार्मिक : वो तो है ही, उनको फायदा तो मिल ही रहा है, इसके अलावा दूसरी पार्टी के भी जो नेता हैं उन्होंने भी वही किया है। वसेना-बीजेपी की सरकार में भी यही हुआ है। कांग्रेस-एनसीपी सरकार भी शुरू से ही यही कर रही है। विदर्भ में ज़मीन सस्ते में मिल जाती है। रोने-चिल्लाने वाला कोई नहीं है, इसलिए जो सिंचाई का पानी है वो भी डायवर्ट किया जा रहा है थर्मल पॉवर स्टेशन्स के लिए, और वो वेस्टर्न महाराष्ट्र में इसलिए नहीं बने रहे कि वहां इसके लिए किसान ज़मीन लेने नहीं देंगे।

वासिन्द्र मिश्र : तो अब तो फिर वहां चुनाव होने जा रहा है आपके महाराष्ट्र में। जब कुछ दिन में चुनाव होगा आप लोग किस तरह से अपनी डिमांड रखने जा रहे हैं इन पॉलिटिकल पार्टीज के सामने और आपको क्या उम्मीद है कि ये पार्टियां इस चुनाव में आपकी डिमांड को कोई खास तवज्जो देंगी?
धनंजय धार्मिक : हमारी एक ही डिमांड है कि अभी हमको महाराष्ट्र के साथ में नहीं रहना है। हमारा दोहन आपने काफी कर लिया अब हम आगे allow नहीं करेंगे। आप शांति से हमें दे दें। अभी तक हम शांति से आंदोलन कर रहे हैं। आप शांति से हमारा राज्य अलग कर दें। हम आपसे कुछ नहीं मांग रहे हैं। और अगर आप नहीं करेंगे तो फिर जो भी आगे होगा, उसके ज़िम्मेदारा आप होंगे।

वासिन्द्र मिश्र: हम लोग चर्चा कर रहे थे कि जो भी पार्टी पावर में रही है चाहे एनसीपी-कांग्रेस हो, शिवसेना-बीजेपी हो, विदर्भ के प्रति उनका रवैया हमेशा सौतेला रहा है। डा. रमेश कुमार साहब आप भी सरकार में मंत्री रहे। क्या सरकार में जब आप मंत्री थे आपको इस बात का एहसास था कि विदर्भ के साथ न्याय नहीं हो रहा है। विदर्भ की जनता के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है?
रमेश कुमार : इसका हमें एहसास बहुत पहले हुआ था लेकिन जब तक बच्चे रोते नहीं मां भी दूध नहीं पिलाती। जब मैं मिनिस्टर था तभी इस बारे में गंभीरता से सोचते हुए हम लोगों ने सिंचाई की क्षमता बढ़ाने को लेकर अध्ययन किया था। विदर्भ में करीब 57 से 60 फीसदी वनक्षेत्र हैं। 1980 में फॉरेस्‍ट कनजर्वेशन एक्‍ट और वाइल्‍ड लाइफ प्रोटेक्‍शन एक्‍ट की वजह से वनक्षेत्र में रहने वाले लोगों की मुश्किलें बढ़ गईं। वहां पर नक्‍सलाइट मूवमेंट शुरू हो गया। हमारे यहां सौ फीसदी इरीगेशन पोटेंशियल है, फिर भी हम इसे यूटीलाइज नहीं कर पा रहे हैं। आज भी हमारा इरीगेशन बैकलॉग 40 फीसदी से ऊपर है तो इसका मतलब हमारे यहां एग्रीकल्‍चर इरीगेशन नहीं हो रहा। पूर्वी और पश्चिमी विदर्भ के पहाड़ी इलाकों में ज्यादातर आदिवासी, गैर आदिवासी और पिछड़े हुए लोग रहते हैं। यहां फॉरेस्‍ट बेस्‍ड इंडस्‍ट्रीज का नेटवर्क बनाया जा सकता है। हमारे पास जंगल है, एग्रीकल्‍चर लैंड है, पानी है लेकिन पानी का गलत इस्तेमाल हो रहा है।

वासिन्द्र मिश्र : तो क्यों नहीं बना अभी तक आप भी सरकार में थे...कौन लोग इसको रोकते थे? क्यों नहीं बना? क्यों नहीं planning हो पाई?
रमेश कुमार : उसके खिलाफ में बातें चलती रहीं लेकिन फॉरेस्‍ट कनजर्वेशन एक्‍ट और वाइल्‍ड लाइफ प्रोटेक्‍शन एक्‍ट केंद्र सरकार के तहत आता है और सेन्ट्रल गवर्नमेंट चाहती नहीं। दूसरी बात महाराष्ट्र में अगर कोई उद्योग लगाना है तो उसके लिए इनवायरमेंटल क्लियरेंस लेना पड़ता है। इनवायरमेंटल क्लियरेंस का जो इंडेक्स है वो विदर्भ का फारेस्‍ट यूटीलाइज करके दे देते हैं लेकिन इतना होने के बाद भी विदर्भ में इंडिस्‍ट्रयल कॉरिडोर नहीं बन पाया। उसके लिए भी काफी प्रयास कर रहे हैं हम लोग लेकिन फिर भी नहीं हो पाया।

वासिन्द्र मिश्र : अगर हम अपने दर्शकों को सरल भाषा में समझाने की कोशिश करें तो जो आप इनवायरमेंटल क्लियरेंस की बात कर रहे हैं, फॉरेस्ट कवर की बात कर रहे हैं, इसका मतलब ये है कि महाराष्ट्र के बाकी हिस्सों का विकास हो रहा है उसकी कीमत विदर्भ को चुकानी पड़ रही है। विदर्भ की जनता को चुकानी पड़ रही है और जो इंडिस्‍ट्रयल क्लियरेंसेंस, इनवायरमेंटल क्लियरेंसेंस लिए जा रहे हैं उसके लिए विदर्भ रीजन का फॉरेस्‍ट कवर दिखाया जा रहा है और इंडस्‍ट्रीज वहां ना लगाकर दूसरी जगह लगाई जा रही है।
रमेश कुमार : जी हां, इसी कारण हमारे यहां पर इंडिस्‍ट्रयल डेवलपमेंट का बैकलॉग बना है। हमारे यहां पर इंडस्ट्रीज इसलिए नहीं विकसित हो पाईं क्योंकि इस तरफ किसी ने ख्याल भी नहीं दिया क्योंकि 1956 में हमारी जो ट्रीटी बनी थी। उसके मुताबिक 23 फीसदी इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट भी हमारे हिस्से में था कभी उसका पालन नहीं हुआ। उद्योगों का विकास नहीं होने की वजह से हमारे यहां से काफी लोगों का पलायन भी हुआ । हमारे यहां पर literacy rate थोड़ा बढ़ा है अभी, सर्विस के लिए या जॉब के लिए वहां से काफी लोग विदर्भ से बाहर हो गया। इस पलायन की वजह से जनसंख्या के आधार पर जब परिसीमन हुआ तो विदर्भ से चार विधानसभा और एक लोकसभा की सीट ही कम हो गई।

वासिन्द्र मिश्र : तो ये जो पलायन हो रहा है, literacy बढ़ने की वजह से हो रहा है, या गरीबी की वजह से हो रहा है?
रमेश कुमार : गरीबी की वजह से हो रहा है क्य़ोंकि जब तक हम per capita income बढ़ा नहीं पाएंगे तब तक ये पलायन चलता रहेगा। क्योंकि महाराष्ट्र के बाकी इलाकों से अगर तुलना की जाए तो विदर्भ का per capita income काफी कम है। गढ़चिरौली जैसे पिछड़े हुए जिले में per capita income 4 हजार से ज्यादा  नहीं है। वहीं बाकी महाराष्ट्र में ये 40-50 हजार है। बॉम्बे और पुणे कॉरिडोर में तो ये एक लाख से भी ज्यादा है। ये बहुत बड़ा फर्क है जो साफ नज़र आता है।

वासिन्द्र मिश्र : तो इसका मतलब ये है कि एक तरफ natural resource के मामले में, महाराष्ट्र की तुलना में विदर्भ सबसे ज्यादा संपन्न क्षेत्र है। दूसरी तरफ अगर हम per capita income की बात करते हैं तो उसमें महाराष्ट्र के बाकी रीजन बेहतर स्थिति में हैं। विदर्भ सबसे खराब स्थिति में है तो ये असंतुलन क्यों है?
रमेश कुमार : ये समस्या राजनैतिक इच्छाशक्ति की है। हमारे यहां पर अगर employment generation नहीं होगा economic generation नहीं होगा तो कहां से आएगा।
 
वासिन्द्र मिश्र : तो political will आएगा कब?
रमेश कुमार : उसी के लिए तो हम अलग विदर्भ राज्य की मांग कर रहे हैं। अलग विदर्भ राज्य का जो आंदोलन हम लोग चला रहे हैं इसका मकसद ही यही है कि विदर्भ क्षेत्र में जो प्राकृतिक संपदा है उसका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करवाकर हम नौकरियां पैदा कर सकें। जो बेरोजगारी की समस्या है वो बड़ी है, उसे खत्म कर सकें। हमें लगता है कि विदर्भ की समस्याओं का एक ही समाधान है कि उसे एक अलग राज्य बना दिया जाए।

वासिन्द्र मिश्र : अगर आप लोगों से एक लाइन में जवाब चाहें कि ये मांग चल रही है बहुत दिनों से, शांतिपूर्ण तरीके से चल रही है, सारे data सारी reports public domain में है, केन्द्र सरकार के पास भी है राज्य सरकार के पास भी है। बावजूद इसके इसके बारे में अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया तो अब आप लोगों का जो अगला एक्शन प्लान है वो क्या है? अगर आगे भी सरकार ऐसे ही टालती रहती है?
प्रबीर चक्रवर्ती : तो फिर हमें भी सड़कों पर उतरना पड़ेगा और सड़क पर उतरने का मतलब ये है कि सड़क पर भीड़ इकट्ठा होती है और भीड़ को कोई काबू में नहीं रख सकता। फिर इसकी जिम्मेदारी उन लोगों की होगी जो इस मामले में निर्णय नहीं ले पा रहे हैं।  
रमेश कुमार : जिस तरह कांग्रेस ने अभी तक हमारा ख्याल नहीं रखा, विदर्भ का ख्याल नहीं रखा तो जैसे हमने पहले नो कांग्रेस का फॉर्म्यूला अपनाया था वैसे ही आगे भी अपनाएंगे। हमारे यहां से कांग्रेस का एक भी एमपी चुनकर नहीं आया था। अगर कांग्रेस आगे भी स्टेट इलेक्शन में यही रवैया अपनाती है तो एक बार फिर महाराष्ट्र में नो कांग्रेस का रवैया अपनाएंगे और आगे भी हमारा आंदोलन चलता रहेगा।

वासिन्द्र मिश्र : आप सब का बहुत-बहुत धन्यवाद।



First Published: Thursday, July 31, 2014 - 20:58


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