डेवलेपमेंट और इन्वेस्टमेंट की हर बाधाएं दूर करेंगे: अनिल स्वरूप

Last Updated: Friday, June 13, 2014 - 17:45
डेवलेपमेंट और इन्वेस्टमेंट की हर बाधाएं दूर करेंगे: अनिल स्वरूप

कैबिनेट सचिवालय में अतिरिक्त सचिव और प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप के चेयरमैन अनिल स्वरूप से ज़ी मीडिया के एडिटर न्यूज़ ऑपरेशंस वासिंद्र मिश्र ने खास बातचीत की। अनिल स्वरूप ने कई मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी।

वासिन्द्र मिश्र: नमस्कार आज के इस खास कार्यक्रम में आपका स्वागत है, आज हमारे खास मेहमान हैं। अनिल स्वरूप जी इस वक्त पीएमजी के चेयरमैन हैं। यह प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप प्रधानमंत्री कार्यालय ने बनाया है, उन प्रोजेक्ट्स के क्लीयरेंस के लिए जो सालों साल से लंबित हैं और लालफीताशाही के शिकार हैं। अनिल जी आपका बहुत बहुत स्वागत है। सबसे पहले तो हमें ये बताएं कि इस तरह का प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप बनाने की जरुरत क्यों महसूस हुई।

अनिल स्वरूप: दरअसल बड़े प्रोजेक्ट्स में क्लीयरेंस की जो आवश्यकता होती है, जैसे इनवायरमेंट या फॉरेस्ट की या किसी अन्य तरह के क्लीयरेंसेस की तो पाया गया कि प्रक्रिया में काफी विलंब हो रहा था जिसके चलते पूंजी निवेश प्रभावित हो रहा था। इस दृष्टिकोण से इस प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप की स्थापना की गई जिससे हम जान सकें कि क्या  इन क्लीयरेंसेस को फास्ट ट्रैक किया जा सकता है। क्या ऐसी संस्थागत तरीके से कोई व्यवस्था बनाई जा सकती है जिससे इसकी क्लोज मॉनीटरिंग हो सके और विभागों से सामंजस्य स्थापित करके इन प्रोजेक्ट्स को क्लीयर कराया जा सके।

वासिन्द्र मिश्र : जो हम लोगों को जानकारी मिलती रही है। आपके अलग अलग इन्टरव्यूज के जरिए कि, ये पीएमजी पिछले साल जून में बना था तो जिस समय इस पीएमजी का गठन हुआ था तब कितने प्रोजेक्ट लंबित थे और आज की तारीख में उनकी क्या स्टेटस है।

अनिल स्वरूप : आरंभ में प्रथम माह में हमारे पास लगभग 62 प्रोजेक्टस प्राप्त हुए। ये धीरे धीरे बढ़कर आज की तारीख में 438 प्रोजेक्ट हो गए हैं जिसकी पूरी लागत लगभग 21 लाख करोड़ रुपए की है। ये इस बात का भी द्योतक है कि शायद धीरे धीरे इंडस्ट्रियलिस्ट को भी ये आभास हुआ कि जो व्यवस्था बनाई गई है। उसके माध्यम से वे अपनी बात विभिन्न विभागों तक पहुंचा सकते हैं और तभी धीरे धीरे इसकी संख्या बढ़ती गई और हम लोगों का लगातार ये प्रयास है कि इनकी जो समस्याएं हैं , मुद्दे हैं, उनका समाधान किया जा सके।

वासिन्द्र मिश्र:  लगभग एक साल से आप इस प्रोजेक्ट को हैंडल कर रहे हैं, तो अभी तक जो आपका अनुभव रहा है उसमें सबसे ज्यादा लंबित मामले किन मंत्रालयों के रहे हैं और उसके क्या कारण थे।

अनिल स्वरूप:  सबसे अधिक 42 प्रतिशत प्रकरण जो थे वो वन एवं पर्यावरण विभाग के थे और चूंकि सबसे ज्यादा  क्लीयरेंसेस की आवश्यकता यहीं से होती है। इसी वजह से सबसे अधिक प्रकरण यहीं के थे पर मैं ये बताना चाहूंगा कि धीरे धीरे करके इनका निदान भी हुआ इनका समाधान भी हुआ लेकिन आज की तारीख में भी सबसे अधिक अगर लंबित प्रकरण हैं तो वो इसी विभाग से संबंधित हैं।

वासिन्द्र मिश्र: अभी जो नई सरकार आई है, उसका सबसे ज्यादा थर्स्ट है इन्वेस्टमेंट पर डेवलेपमेंट पर कल प्रधानमंत्री ने दोनों सदनों मे जब अपना वक्तव्य दिया तो उसमें भी उन्होंने इसी पर जोर दिया और एक टर्म यूज किया कि हम कलेक्टिव डेवलेपमेंट करेंगे सबको साथ लेकर चलेंगे। उनकी बातों पर अगर हम पूरा भरोसा करें तो उसी के कंटीनुएशन में उनके पर्यावरण और संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश जावडे़कर ने भी इस बात की ओर इशारा किया है कि वो जल्दी ही सिम्पलीफाई करेंगे। उन सारी चीजों को सरल बनाएंगे जो डेवलेपमेंट या इन्वेस्टमेंट में बाधक है। उस लिहाज से अभी तक की जो लर्निंग रही है उसमें किस तरहे के सुझाव आप लोगों ने दिए हैं और कौन से ऐसे सिम्पलीफिकेशन आप चाहते हैं जिससे इंडस्ट्रिएलिस्ट को या इन्वेस्टर को एक फ्रेंडली वातावरण मिल सके।
 
अनिल स्वरूप: सबसे पहले तो मैं ये बताना चाहूंगा कि वर्तमान सरकार ने ये स्पष्ट किया है कि केवल क्लीयरेंस देने से काम नहीं चलेगा। इस बात का भी परीक्षण किया जाए कि क्लीयरेंस के बाद वास्तविकता में धरातल पर क्या कुछ कार्यवाही हो रही है। यानी कोई मैन्यूफैक्चरिंग ईकाई जैसे स्टील है तो उसमें कुछ मैनिफेक्चर हो रहा है या नहीं। इसी तरह जैसे पॉवर प्रोजेक्ट है तो उसमें पॉवर जनरेट हो रहा है या नहीं । इसी तरह अगर कोई सर्विस का प्रोजक्ट है तो उसमें सर्विसेज मुहैया कराई जा रही है या नहीं कराई जा रही तो इस सरकार ने एक कदम आगे बढ़ाकर ये बात कही है कि क्लीयरेंसेस तो देनी ही देनी है लेकिन खाली क्लीयरेंसेस से काम नहीं चलेगा और अब ये पूरा दायित्व प्रोजक्ट मॉनीटरिंग ग्रुप को सौंपा गया है। पहले ये कार्य डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विस को दिया गया था लेकिन अब ये निर्णय लिया गया है कि ये कार्य प्रोजेक्ट मॉनीटरिंग ग्रुप करेगा और हम ये प्रयास कर रहे हैं कि जितने भी प्रोजेक्ट अभी तक क्लीयर हुए हैं। उनमें धरातल पर क्या स्थिति है, उसकी जानकारी करें और अगर वो प्रोजेक्ट अभी तक एक्जीक्यूट नहीं हुए हैं तो उनके कारणों पर भी जानकारी लें जिससे उन समस्याओं का भी हम समाधान कर सकें। साथ ही हम ये प्रयास भी कर सकें कि जो क्लीयरेंस दी गई हैं उनके फलस्वरूप जो प्रोजेक्ट क्लीयर हुए हैं उनमें प्रोडक्शन हो सके या एनर्जी जनरेशन हो सके या सर्विसेज प्रदान कर सकें और दूसरा पहलू ये है कि जैसे मैंने बताया आपको कि सबसे ज्यादा समस्याएं वन और पर्यावरण की थीं तो हमने विचार किया कि क्या हम उन प्रक्रियाओं को भी देखें जिनके माध्यम से क्लीयरेंस दी जा सकती थीं। पर्यावरण मंत्रालय के साथ बैठकर हम लोगों ने एक व्यवस्था बनाई  है जिसमें हम पूरी प्रोसेस को समझे कि कहां एप्लीकेशन दी जाती है और उसके बाद उसका किस किस स्तर पर परीक्षण किया जाता है,, फिर वो कहां जाती है और कैसे उसका क्लीयरेंस होता है। इन सबमें काफी समय लगता था और कोई ऐसा क्लीयर तरीका भी नहीं था कि जाना जा सके कि कहां पर समस्या है। यानि व्यक्तिगत रुप से एक केस में मालूम हो सकता है लेकिन सामान्य रुप से नहीं मालूम होता थातो इस प्रक्रिया को पूर्ण करने के उपरांत पर्यावरण मंत्रालय इस बात पर सहमत हुआ कि क्लीयरेंस की पूरी व्यवस्था को डिजिटाइज़ कर दें। यानि कि अब जो व्यवस्था बनेगी उसके तहत फारेस्ट क्लीयरेंस के लिए पहली जुलाई से कोई भी एप्लीकेशन जो आएगी वो हार्डकॉपी में नहीं दी जाएगी, वो वेबपोर्टल पर दी जाएगी और इंडस्ट्री को ये अधिकार होगा कि वो ट्रैक कर सके कि एप्लीकेशन कहां है। इसके अलावा ये भी प्रयास  किया गया है कि हर स्तर पर कितना समय लगाया जाएगा उसका भी निर्धारण किया जा सके। इससे ये जानकारी मिल सकेगी कि किस स्तर पर विलंब हो रहा है और अगले 6 महीने में हम ये डाटा इकट्ठा कर सकेंगे। इस ट्रांसपैरेंट व्यवस्था के माध्यम से हम ये जान सकेंगे कि किस स्तर पर विलंब हो रहा है और अगर आवश्यकता पड़ेगी तो इस प्रोसेस को और ठीक  करेंगे तो ये एक अच्छा प्रयास किया गया है और हम ये आशा करते हैं कि पहली जुलाई से तो फॉरेस्ट क्लीयरेंस की एप्लीकेशन वेब पर आना शुरु हो जाएंगी और शीघ्र ही उसके बाद पर्यावरण की भी एप्लीकेशन आनी शुरु हो जाएगी, मैं ये बताना चाहूंगा कि ये जो कार्यवाही अभी शुरु की है ये सिर्फ पर्यावरण मंत्रालय तक सीमित नहीं रहेगी। चूंकि पर्यावरण मंत्रालय की सबसे ज्यादा समस्याएं हैं इसलिए पहल हमने वहीं से की है। इसको हम आगे ले जाएंगे जैसे खनन, माइंस का जो विभाग है। वहां भी वो सैद्धातिक रुप से सहमत हो गए हैं कि जो प्रक्रिया है जिसमें लाइसेंस दिया जाता है उसे भी हम ट्रांसपैरेंट बनाएं..उसकी प्रक्रिया को भी हम इंटरनेट बेस्ड बनाएं  जिससे इंडस्ट्री को ये जानकारी मिल सके कि उनकी एप्लीकेशन कहां हैं। इसी तरह कोल मिनिस्ट्री में भी जितनी क्लीयरेंस होती हैं उसमें भी वो सैद्धांतिक रुप से सहमत हुए हैं  कि इन प्रक्रियाओं को भी हम वेब  के माध्यम से लोगों को बताएं। मेरा ये मानना है कि अगर हम ये कर सकें कि इंडस्ट्री की सभी एप्लीकेशन वेब के माध्यम से मूव हो और वो एप्लीकेशन को ट्रैक कर सके तो वास्तव में ये सिंगल विंडो बन सकेगा। सिंगल विंडों की बात हम लोग 20 वर्षों से कर रहे हैं लेकिन इसकी स्थापना नहीं हो पाई है लेकिन अब हमारे पास ऐसी तकनीक है कि सिंगल विंडो के माध्यम से उन एप्लीकेशनों को हम लागू करा सकें और इंडस्ट्री को अपने एप्लीकेशन को ट्रैक करने की सहूलियत दे सकें।

वासिन्द्र मिश्र:  इसमें अभी 2 तरह के अनुभव सामने आए हैं। खास तौर से 10 वर्षों में नेचुरल रिसोर्सेस को लेकर तमाम स्कैम की खबरें आईं और ये कहा गया कि कुछ कॉरपोरेट घरानों ने कानूनों के क्लॉज का लाभ उठाते हुए नेचुरल रिसोर्सेस का भरपूर दोहन किया और उसका लाभ ना तो एक्सचेकर को मिला, ना वहां के लोकल पापुलेशन को और ना ही देश को मिला, तो ये बात तो अच्छी है कि इनवेस्टमेंट सिस्टम को सरकार और पारदर्शी बनाने जा रही है, ट्रैकिंग सिस्टम लागू करने जा रही है। सब कुछ वेब के जरिए हो जाएगा लेकिन क्या उन कार्पोरेट घरानों की भी जवाबदेही तय होगी जो प्रोजेक्ट के नाम पर मान लीजिए कहीं जमीन ले ली या लाइसेंस ले लिया और 10 साल में उन्होंने वहां प्रोजेक्ट नहीं लगाया और उस लैंड का या नैचुरल रिसोर्स का इस्तेमाल वो अपने निजी फायदे के लिए करते रहे तो ऐसे कार्पोरेट घरानों या एजेंसियों के खिलाफ कोई चेक या बैलेंस का भी प्रावधान करने की योजना है सरकार की।

अनिल स्वरूप:  देखिए ये इस प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता लिहाजा मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा। प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप का एरिया ऑफ एक्शन बड़ा स्पष्ट है और वो ये कि किसी भी क्लीयरेंस के लिए इंडस्ट्री हाउस अप्लाई करता है। उस क्लीयरेंस में अगर कोई समस्याएं आ रही हैं तो हम उनका समाधान करें। हमारा बड़ा सीमित क्षेत्र है और उसी के तहत हम इसमें कार्य कर रहे हैं और हमारा प्रयास ये है कि जो  इंडस्ट्री को सहूलियत दें जिससे अनावश्यक रुप से जो बाधाएं उपज रही हैं पूंजी निवेश में,, वो पहले दूर हों, जो पहले गड़बड़िया हुई हैं या कथित गड़बड़ियां हुई हैं। उसपर मेरे विचार से जांच जारी है ,,कोर्ट भी उसमें शामिल है तो जो भी निर्णय होगा उसपर आवश्यक कार्रवाई होगी लेकिन प्रोजक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप के कार्यक्षेत्र में ये नहीं आता।

वासिन्द्र मिश्र:  एक और चीज जो देखने को मिली है कि भारत सरकार में तो वर्क कल्चर बेहतर है , राज्यों की तुलना में। तमाम राज्य सरकारें ऐसी हैं जहां पर कि गवर्नेंस की स्थिति बहुत खराब है, कोई वर्क कल्चर नहीं है। जो भी योजनाएं जाती हैं ज्यादातर  फाइलों में पड़ी रहती हैं। उनको अमल में लाने का रिकॉर्ड बहुत खराब  है और उससे जुड़ा हुआ इन्वेस्टमेंट का जो भी प्रोसेस है, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया चाहे जितने तेज तरीके से उस काम को आगे बढ़ाना चाहे। लेकिन जब तक राज्यों का सपोर्ट नहीं मिलेगा उसको धरातल पर ठीक समय से लागू नहीं किया जा सकता।

अनिल स्वरूप:  आप बिल्कुल सही कह  रहे हैं, वास्तव में जो गतिविधियां होती है, वो धरातल पर ही होते हैं। अगर स्टेट में होता है तो जब तक स्टेट्स इस कार्य से आगे नहीं जुड़ेगी तब तक ये कार्य आगे नहीं बढ़ेंगे। इसी को देखते हुए प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप में हमने ये व्यवस्था की है कि जो स्टेट से जुड़ी समस्याएं हैं उनके समाधान के लिए हम स्टेट को दिल्ली में नहीं बुलाते। प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप के अधिकारी  खुद स्टेट में जाते है। हर सोमवार और शुक्रवार को पीएमजी की टीम किसी ना किसी स्टेट में जाती हैऔर वहां के मुख्य सचिव , समस्त वरिष्ठ अधिकारियों और कलेक्टर के साथ बैठक करती है। हर प्रोजेक्ट पर चर्चा होती है और जो समस्या होती है उसपर समय निर्धारण किया जाता है कि कब तक इसका निदाना होगा। इसके फलस्वरूप स्टेट को भी ये आभास हुआ है कि इस कार्य में उनको भी जुड़ना है और ये हमारा स्पष्ट मानना था कि जब तक हम स्टेट को पूरी कार्यक्षमता के साथ जोड़ेंगे नहीं तब तक समस्याओं का समाधान नही होगा। आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि ये जो व्यवस्था पीएमजी की थी वो थी एक हजार करोड़ से ऊपर के प्रोजेक्ट की लेकिन स्टेट की तरफ से हमारे पास मांग आई कि स्टेट में कई  ऐसे प्रोजेक्ट हैं जो कि इससे कम पूंजी निवेश के हैं तो फिर हम लोगों ने एक सॉफ्टवेयर बनाया है जिसे स्टेट adopt कर रही हैं और 5 स्टेट में स्टेट प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप की स्थापना हो चुकी है और मेरा ये मानना है कि इस माह के अंत तक 5 और प्रदेश में स्थापना हो आएगी। इससे जो प्रोजेक्ट 100 करोड़ से एक हजार करोड़ के बीच में हैं उनके संबंध में भी राज्य स्तर पर चर्चा होगी और केंद्र से जुड़े जितने सारे प्रकरण होंगे वो आएंगे हमारे पास तो राज्य सरकारों ने इस बात को पूर्णतया स्वीकार किया है कि उनको भी इस पूरी कार्यप्रणाली में सम्मिलित होना पड़ेगा। इस कार्य में उनको हाथ बंटाना होगा और मैं ये बताना चाहूंगा कि अधिकतर राज्यों में हमे बड़ा पॉजिटिव रिस्पांस मिला है। कई ऐसे राज्य हैं जहां पिछले एक साल में हम पांच बार जा चुके है और जो इनवाल्वमेंट मैं देख रहा हूं देश का वो बड़ा सकारात्मक है। मैं समझता हूं इससे स्टेट भी जुड़ेंगे और समस्याओं का समाधान भी हो सकेगा।

वासिन्द्र मिश्र : अनिल जी हम लोग बात कर रहे थे कि राज्यों की तरफ से रिस्पांस अच्छा आ रहा है..पिछले एक साल के दौरान अगर हम बात करें कि किस राज्य ने बेहतर परफार्म किया है आप लोगों के इनीशिएटिव को बहुत आगे बढ़कर वेलकम किया है और ग्राउंड लेवल तक ले गए हैं। आप उन राज्यों के नाम बताएंगे।

अनिल स्वरूप: मैं ये उचित नहीं समझता कि राज्यों  की तुलना  करूं। मेरा ये मानना है कि प्रत्येक राज्य में ये प्रयास हो रहे हैं विशेषकर छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड मे अधिकतर प्रोजेक्ट्स है और यहां आशा से अधिक हमें सहयोग प्राप्त हो रहा है और मैं ये बताना चाहूंगा कि यहां पर जितने राज्य के अधिकारी हैं वो पूरी तरह से समझ गए हैं कि इन समस्याओं के समाधान से वहां पर पूंजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा जिससे ना केवल देश को, राज्य को भी उतना ही लाभ मिलेगा। उतना ही एंप्लॉयमेंट जनरेट होगा तो अधिकतर राज्य हमारे साथ जुड़ चुके हैं और जो एक दो बचे हैं वो भी जल्द ही जुड़ जाएंगे।

वासिन्द्र मिश्र:  आपने एक बीमा योजना को भी देश के पायलेट प्रोजेक्ट के तौर पर हैंडिल किया था और उसके बाद यूआईडी भी चर्चा में रही । कई लाख का बजट रिलीज हुआ सब हुआ लेकिन वह उतना कामयाब  नहीं रहा जितनी कि आपकी योजना थी जिसको आपने तमाम नार्थ-ईस्ट से लेकर छोटे-छोटे राज्यों में भी सौ प्रतिशत इम्पलीमेंट किया। उसकी आज क्या स्थिति है।

अनिल स्वरूप: राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना एक अच्छी योजना थी मेरे विचार से। इस योजना के माध्यम से गरीबों तक पहुंचा जा सका और मेरा विश्वास है कि ये ऐसी योजना है जो देश में आगे भी सफल होगी और जैसा कि छत्तीसगढ़ में एक प्रयोग किया गया कि ना केवल स्वास्थ्य बल्कि पीडीएस में भी स्मार्ट कार्ड का प्रयोग किया गया, मुझे आशा है कि जो एक्सपेरिमेंट छत्तीसगढ़ में हुआ है वो बहुत अच्छा है, वो देश के दूसरे कोनों मे भी जा सकेगा। जहां तक राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का प्रश्न है मैने ट्रैक ज्यादा नहीं रखा है कि उसके बाद क्या हुआ..लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि वो अच्छा काम कर रही होगी पूरे देश में।

वासिन्द्र मिश्र : तो अभी तक कितने प्रतिशत लागू हो गया है।

अनिल स्वरूप: जब मैंने  एक वर्ष पूर्व उस योजना को छोड़ा था तो लगभग 3.5 करोड़ परिवार उससे जुड़ गए थे, इसको प्रति व्यक्ति के आधार पर देखें तो लगभग 15 करोड़ लोगों को इसमें आच्छादित कर दिया गया था। इस योजना की सराहना ना केवल देश और विदेश में हुई बल्कि अन्य अंतराष्ट्रीय संगठनों ने भी इसकी सराहना की थी और अन्य देश भी चाह रहे थे इस प्रकार की योजना को लागू करना। उसमें बहुत पोटेन्शियल है स्मार्ट कार्ड बेस्ड योजना का। उसमें ना केवल स्वास्थ्य बीमा दिया जा सकता है बल्कि अन्य लाभ भी मुहैया कराए जा सकते हैं गरीबों को । मुझे याद आ रहा है कि एक वर्ष पूर्व ही निर्णय लिया गया था कि इस योजना को पहले तो गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों के लिए लागू की गई थी। बाद में इस योजना को अन्य श्रेणी के मजदूरों के लिए लागू किया गया था क्योंकि अभी वर्तमान सरकार ने भी अभी एक यूनिवर्सल हेल्थ इंश्योरेंस की जो घोषणा की है तो मुझे आशा है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का जो प्लेटफार्म बना है। उसका उपयोग भी शायद उसके लिये लिया जा सकेगा।

वासिन्द्र मिश्र: उसमें एक कार्ड बनाने मे कितनी लागत आती थी।

अनिल स्वरूप: प्रीमियम जो आता था वो तीस हजार रुपए का कवर देता था। उसके प्रीमियम के लिए ऑन ऐवरेज समझ लीजिए करीब 400 से 450 रुपए एक परिवार के लिए सरकार को खर्च करना पड़ता था जिसमें 75 प्रतिशत केंद्र सरकार देती थी जबकि 25 प्रतिशत राज्य सरकार देती थी और लाभार्थी परिवार को केवल 30 रुपए रजिस्ट्री शुल्क देना पड़ता था तो 400-450 तक के भुगतान से उस परिवार को 30 हजार का कवर मिल जाता था।

वासिन्द्र मिश्र:  हम लोग फिर एक बार पीएमजी की बात करें। हम चाहते है कि आप इसको और थोड़ा विस्तार  से बताएं कि और क्या क्या विचाराधीन  मुद्दे हैं जो सरकार तक आप लोग ले जाना चाहते हैं । इसको और विस्तार से बताएं।

अनिल स्वरूप: पहले इसकी प्रक्रिया आपको बता दूं।  मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि हमारा दफ्तर पेपरलेस तो नहीं है हां फाइल लेस जरुर है। हमारे यहां कोई फाइल नहीं है। हमारे यहां सब कार्य जो है वेब पर होते है। इसका कारण ये था कि हम इतने बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हैंडल कर रहे थे तो हम चाहते थे कि जो भी कार्य हो पारदर्शिता के साथ हो जिससे कोई ये ना कह सके कि इसका काम कर दिया इसका नहीं किया और किया तो क्या किया तो व्यवस्था इस प्रकार से है कि कोई भी इंडस्ट्री को जिसका निवेश 1, 000 करोड़ से अधिक है, वो हमारे पोर्टल पर जाकर अपनी बात कह सकता है। अपनी इंडस्ट्री के बारे मे ब्रीफली बता सकता है और उसके बाद फिर जिस जिस विभाग से उनको समस्या है। उसको संक्षिप्त में विभागवार लिख सकते हैं। उसका कारण ये है कि जैसे ही वो प्रोजेक्ट हमारे यहां एक्सेप्ट  होता है तो अपने आप समस्याएं संयुक्त सचिव संबंधित विभाग के पास पहुंच जाती हैं । जैसे पर्यावरण विभाग की समस्या है तो मेरे बटन दबाते ही वो समस्या उनके पास चली जाएगी। हमें अलग से भेजने की कोई जरुरत नहीं है। सी तरह वहां के संयुक्त सचिव अपने विभाग की तरफ से टिप्पणी पोर्टल पर ही लिखेंगे और इसकी जानकारी इंडस्ट्री के पास भी होगी कि समस्या कब उनके पास गई और विभाग ने क्या लिखा। तो ऐसे इनफॉर्मेशन का फ्लो हमने बनाया है जिसमें हमें कागज भेजने की जरुरत नहीं पड़ती है और ना किसी से प्राप्त करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त हमने वय्वस्था बनाई है जिसमें 12 सब ग्रुप है। 12 सबग्रुप उन विभागों के हैं जहां पर समस्याएं विद्यमान हैं जैसे पर्यावरण विभाग का एक सबग्रुप है। जो कि हर मंगलवार को दोपहर को तीन बजे मिलता है तो डेट और टाइम सबके फिक्स हैं उस दिन वो मिलता है। उनको भी ये पता है और इंडस्ट्री को भी। हमें भी पता है जिस दिन बैठक होती है उस दिन उसको चेयर करता हूं उन सब ग्रुप का और उस विभाग का प्रतिनिधि होता है। जहां पर समस्या है, वो इंडस्ट्रिएलिस्ट होता है जिसकी समस्या है और चौथा जो महत्वपूर्ण शख्स होता है उसे हम कहते हैं मिनीस्ट्री। चाहे वो निजी क्षेत्र की ईकाई हो तो उसकी निगरानी सरकार का कोई विभाग करेगा। जैसे अगर पॉवर विभाग होगा तो ऊर्जा विभाग का प्रतिनिधि करेगा और हम चारों लोग बैठक कर चर्चा करते है और चर्चा से जो भी निष्कर्ष आते हैं। उसे सीधे पोर्टल पर अपडेट कर दिया जाता है। ऐसा नहीं कि मिनट बनते हैं और मैं अप्रूव करुं। बाद में कुछ चेंज हो। इसलिए सबके सामने बनते हैं, .बिल्कुल ट्रांसपैरेंसी के साथ और पोर्टल पर चले जाते हैं तो हमारे यहां हर बात की डिटेल्स अपडेट रहते हैं । इस समय की वयवस्था आप देखाना चाहें तो पोर्टल पर जाईये, आपको लेटेस्ट पिक्चर मिल जाएगी और हम लोग उसकी एनालिसिस भी पोर्टल पर करते हैं तो हमारे यहां जो एजेंडा जारी होता है तो उसमें भी सिर्फ एक बटन दबता है और एक एजेंडा क्रिएट हो जाता है। एक क्लिक करते ही जिन जिन मिनिस्ट्री को भेजना है, मेल चला जाता है तो ना तो हम कोई कागज भेजते हैं इसके लिए और ना ही कोई कागज हमारे पास  आता है। मैं पुन: स्पष्ट करना चाहूंगा कि पेपर तो इम इस्तेमाल करते है लेकिन फाइल हमारे यहां कोई नहीं है। सिर्फ एक फाइल है जो मेरे बॉस के पास अप्रूव होने के लिए जाती है।

वासिन्द्र मिश्र: तो यानि हम बता सकते हैं अपने दर्शकों को कि काजल की कोठरी में रहते हुए आप चाहते हैं कि देश को , शासन को पारदर्शिता दी जा सके और इनवेस्टमेंट को बढ़ावा दिया जा सके।
बहुत धन्यवाद आपका हमारे चैनल से बात करने के लिए।

एक्सक्लूसिव

First Published: Friday, June 13, 2014 - 17:45


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