मन्ना डे के बिना...

Last Updated: Thursday, October 24, 2013 - 13:56

सुधीर चौधरी
ये कैसा खालीपन आ गया आज अचानक। एक विराट शून्य। भारतीय संगीत के चुनिंदा दिग्गजों में शामिल मन्ना डे काफी वक्त से बीमार थे और इस बात का अहसास काफी दिन से था कि एक दिन अचानक ही दुखद ख़बर आएगी। वह ख़बर आज आ गई, जब मैं मुंबई में हूं। मन्ना डे का देहांत बेंगलुरु में हुआ है, और अगर उनका पार्थिव शरीर मुंबई में होता तो मैं शायद उनके आखिरी दर्शन कर वापस दिल्ली लौटता।
मन्ना डे के जाने का मतलब सिर्फ एक गायक का चले जाना नहीं है। मन्ना डे भारतीय संगीत का एक युग थे। उनकी आवाज़ सीधे रूह को छूती थी। रफी, मुकेश और किशोर की विराट लोकप्रियता के बीच में भी मन्ना डे की उपस्थिति न केवल महसूस की गई बल्कि उनकी अनिवार्यता को भी दिग्गज संगीतकारों ने समझा था।
लेकिन, क्या आज की पीढ़ी समझ सकती है कि आज हमारे बीच से कौन सा शख्स चला गया? नयी पीढ़ी मन्नादा होने का मतलब और मन्नादा के हमारे बीच होने का मतलब नहीं समझ सकती। नयी पीढ़ी के कई बच्चों ने मन्ना डे का नाम शायद आज पहली बार सुना होगा, जब उनके निधन की ख़बर टेलीविजन चैनलों पर रेंग रही है। हो सकता है कि कइयों के लिए मन्ना डे का मतलब ‘यारी है ईमान मेरा यार मेरा जिंदगी‘ गाने वाले एक गायक की हो क्योंकि ‘ज़ंजीर’ फिल्म का यह गाना अकसर चैनलों पर बजता रहता है।
लेकिन, मेरे लिए मन्ना डे का मतलब एक गायक भर नहीं था। वो एक ऐसी आवाज़ थी, जिसकी आवाज़ शांत अकेले कमरे में अलग अलग भावनाओं को सीधे दिल में उतार देती है। जो आपको हंसाती है, रुलाती है और कई बार जिंदगी के टेड़े सवालों के बारे में सोचने को मजबूर करती है। वैसे, मैं क्या... मेरी पीढ़ी और मुझसे पहली की पीढ़ी को बखूबी मालूम है कि आवाज़ के इस जादूगर का करिश्मा क्या था।

मन्नादा का गाया मेरा पसंदीदा गीत है-`जिंदगी कैसी है पहेली हाय..,कभी ये रुलाए कभी ये हंसाए।` आनंद फिल्म का यह गाना कितने आसान शब्दों में ज़िंदगी के फलसफे की परतें खोलता है। ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘आनंद’ जब देखी थी, तब बहुत पसंद आई थी। यह गाना जुबां पर चढ़ गया था उस वक्त। इस गाने का वीडियो यानी राजेश खन्ना और आवाज़ यानी मन्ना डे दोनों दिमाग पर हावी थे। आज दोनों ही नहीं है।
वैसे, मन्ना डे के किस किस गाने को याद करुं। सैकड़ों अमर गाने हैं। लागा चुनरी में दाग, छिपाऊ कैसे, तू प्यार का सागर है, ऐ मेरी जोहर-ए-जबीं, ये रात भीगी-भीगी, आजा सनम मधुर चांदनी में हम और कस्मे वादे प्यार वफा सब...। सारे गाने एक से बढ़कर एक। फिर, हरिवंशराय बच्चन की मधुशाला को उन्होंने आवाज़ दी, जिसका भी कोई जवाब नहीं है।
मन्ना डे को ईश्वर ने 94 वर्ष की लंबी उम्र दी थी। उन्होंने पूरी सादगी और सहजता से इसे जीया। पूरी तरह संगीत को समर्पित इस शख्स ने ‘चालू म्यूजिक’ के लिए कभी नहीं गाया। उम्र के आखिरी पढ़ाव तक वह स्टेज शो करते रहे ताकि अपने प्रशंसकों से मिलते रहें और उन्हें अपनी आवाज़ के रुप में प्यार बांटते रहे।
ईश्वर से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन मन्ना डे को भुलना संभव नहीं है। मन्ना डे आप लौट आओ...किसी बच्चे की आवाज़ में समा जाओ...क्योंकि आपके भीतर एक बच्चा बैठा था, जो कभी पतंग उड़ाते हुए, कभी छोटी छोटी शरारते करते हुए अकसर सामने आता था। आप ही कहते थे- `मैं बचपन में जल्द से जल्द बड़ा होना चाहता था, क्योंकि बड़ा होना मुझे आज़ादी का पर्याय लगता था। लेकिन बड़े होकर मैंने जाना कि मैंने क्या खो दिया।`
मन्नादा...आंखें नम हैं और जुबां पर आपका गाना-`जिंदगी कैसी है पहेली हाय...।`
(लेखक ज़ी न्यूज के एडिटर हैं और आप उन्हें ट्विटर पर फॉलो कर सकते हैं-



First Published: Thursday, October 24, 2013 - 13:33


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