भोपाल गैस त्रासदी: उस रात की सुबह नहीं

दो और तीन दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में सब सुकून से सो रहे थे. लेकिन जैसे ही उजाला हुआ तब एहसास हुआ कि सो रहे लोग लाशों में तब्दील हो गए हैं.

Dec 03, 2017, 09:09 AM IST

दो और तीन दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में सब सुकून से सो रहे थे. लेकिन जैसे ही उजाला हुआ तब एहसास हुआ कि सो रहे लोग लाशों में तब्दील हो गए हैं.

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bhopal gas tragedy anniversary photos of that tragic night

दो और तीन दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में सब सुकून से सो रहे थे. लेकिन जैसे ही उजाला हुआ तब एहसास हुआ कि सो रहे लोग लाशों में तब्दील हो गए हैं. 1984 की उस रात को यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी के प्लांट नंबर 'सी' के टैंक नंबर 610 में भरी जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस में पानी भर गया. कैमिकल रिएक्शन से बने दबाव को टैंक सह नहीं पाया और वो खुल गया. इससे जहरीली गैस का रिसाव होने लगा. हवा के साथ ये गैस पूरे इलाके में फैल गई और आंखें खुलने से पहले ही हजारों लोग मौत की नींद सो गए. (सभी फोटो सोशल मीडिया से लिए गए)

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ऐसे किसी हादसे के लिए कोई तैयार नहीं था. यहां तक कि कारखाने का अलार्म सिस्टम भी घंटों तक बेअसर रहा, जिससे लोगों तक समय रहते चेतावनी नहीं पहुंच सकी.

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कारखाने के पास बसी झुग्गियों में रह रहे मजदूर इस जहरीली गैस के पहले शिकार बने थे. फैक्टरी के पास होने के कारण उन लोगों को मौत की नींद सोते देर नहीं लगी. हादसे के बाद हुई जांच में ये बात सामने आई थी कि लोगों को मौत की नींद सुलाने में यूनियन कार्बाइड फैक्टरी से निकली विषैली गैस को औसत तीन मिनट लगे.

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सुबह होने पर बड़ी संख्या में लोग आंखों में और सीने में जलन की परेशानी को लेकर अस्पताल पहुंचने लगे. देखते ही देखते संख्या इतनी हो गई कि अस्पताल में जगह नहीं बची. इसकी वजह की पड़ताल करने पर यूनियन कार्बाइड फैक्टरी में हुए रिसाव के बारे में पता चला.

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एक अनुमान के अनुसार पहले दो दिनों में करीब 50 हजार लोगों का इलाज किया गया. लेकिन इस अवस्था में सही इलाज क्या है इसके बारे में भी डॉक्टरों को सटीक जानकारी नहीं थी. ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें मिथाइल आइसोसाइनेट गैस से पीड़ित लोगों के इलाज का कोई अनुभव नहीं था.

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मरने वालों की संख्या कितनी थी इसे लेकर आज तक सही आंकड़े सामने नहीं आ सके हैं. हालांकि, सरकार आंकड़ों के मुताबिक जहरीली गैस ने करीब 3000 लोगों की जान ली थी. वहीं कुछ का अनुमान बताते हैं कि 8000 लोगों की मौत तो दो सप्ताहों के अंदर हो गई थी, इसके बाद भी मौत का सिलसिला जारी रहा था.

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2006 में प्रदेश सरकार के एक शपथ पत्र में माना गया कि भोपाल के लगभग 5 लाख 20 हजार लोग इस जहरीली गैस से सीधी रूप से प्रभावित हुई थी. जिसमें 2,00,000 लोग 15 साल की उम्र से कम और 3,000 गर्भवती महिलाएं थीं. आंशिक रूप से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या लगभग 38,478 थी. 3900 तो बुरी तरह प्रभावित और पूरी तरह अपंगता के शिकार हो गए थे.

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माना जाता है कि रिसाव की घटना के बाद गैस का असर करीब आठ घंटे बाद खत्म हो गया था. लेकिन ये घंटे हजारों लोगों की जान लेने के लिए काफी थे. इस गैस का प्रभाव से अब तक शहर उबर नहीं पाया है.

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गैस से प्रभावित लोगों की आगे की पीढ़ियां भी इसका दंश झेल रही हैं. कुछ महिलाएं ऐसी हैं जो कभी मां नहीं बन सकी, तो कुछ ऐसी हैं जिन्होंने बच्चों को जन्म तो दे दिया लेकिन वे बच्चे किसी ने किसी रूप में शारीरिक रूप से विकलांग हुए.

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हालांकि, इस सब के बीच ऐसा भी परिवार था जो पूरी तरह इस गैस से सुरक्षित बच निकला. माना जाता है कि इस गैस कांड में भोपाल का कुशवाहा परिवार बिना किसी हानि के बच गया था क्योंकि उस परिवार में हर दिन यज्ञ किया जाता था. जिस दिन गैस रिसाव हुआ उस दिन भी इस परिवार में यज्ञ चल रहा था, जिससे जहरीली गैस का उनके घर में में असर नहीं हुआ. यज्ञ को वातारण में प्रदूषण के समाधान के लिए वैज्ञानिक उपकरण माना जाता है.

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गैस कांड में लोगों की मौत का जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड फैक्टरी के मालिक वारेन एंडरसन को माना गया. लेकिन उस पर कोई कार्रवाई हो सके इससे पहले ही वो भारत से भाग निकलने में कामयाब हो गया. माना जाता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने वारेन एंडरसन को विशेष विमान से भोपाल से निकलने की सुविधा उपलब्ध करवाई थी. हालांकि, एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि उस समय की केंद्र सरकार से आदेश मिलने के बाद वारेन को भोपाल से बाहर जाने दिया गया. माना जाता है कि इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खुद अर्जुन सिंह को फोन किया था.

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