याद करो कुर्बानी: देश के लिए सर्वोच्‍च बलिदान देने वाले 5 'परमवीरों' के अदम्‍य साहस की कहानी

Aug 16, 2018, 18:41 PM IST
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मेजर सोमनाथ शर्मा

Major Somnath Sharma

मेजर सोमनाथ शर्मा भारतीय सेना के पहले ऐसे अधिकारी थे, जिन्‍हें बहादुरी के लिए मिलने वाले सर्वोच्‍च सम्‍मान परमवीर चक्र से मरणोपरांत सम्‍मानित किया गया था. मेजर सोमनाथ शर्मा की नियुक्ति 1942 में कुमाऊं रेजीमेंट में हुई थी.  सेना में शामिल होने के कुछ दिनों बाद ही उनको द्वितीय विश्‍व युद्ध में भेजा गया था. जहां उन्‍होंने अराकन अभियान को सफलता पूर्वक पूरा किया था. द्धितीय विश्‍व युद्ध में मेजर सोमनाथ शर्मा के अदम्‍य साहस और अद्भुत युद्ध कौशल के चलते उन्‍हें मेन्शंड इन डिस्पैचैस में स्थान मिला था. द्धितीय विश्‍व युद्ध के बाद मेजर सोमनाथ शर्मा को भारत-पाकिस्‍तान के बीच 1947 में हुए युद्ध में अपनी वीरता का परिचय देने का मौका मिला था. इस युद्ध में उन्‍होंने बगदल की लड़ाई में अपने अद्भुत युद्ध कौशल का प्रदर्शन कर करीब 200 कबीलाई लड़ाकों का खात्‍मा किया था. इसी युद्ध के दौरान , 3 नवंबर 1947 को वीरगति को प्राप्‍त हो गए थे. बगदल की लड़ाई में मेजर सोमनाथ शर्मा के  अदम्‍य साहस और अद्भुत युद्ध कौशल को देखते हुए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था. 

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नायक यदुनाथ सिंह

Naik Jadunath Singh

नायक यदुनाथ सिंह : 1947 में भारत पाकिस्‍तान के बीच हुए युद्ध में अद्वितीय साहस दिखाने वाले नायक यदुनाथ सिंह को वीरता के सर्वोच्‍च सम्‍मान परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था. नायक यदुनाथ सिंह को 1941 में ब्रिटिश भारतीय सेना से अपने सैन्‍य जीवन की शुरूआत की थी. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, इन्होने बर्मा में जापान के खिलाफ लड़ाई में अद्भुत युद्ध कौशल प्र‍दर्शित किया था. 21 नवंबर 1941 में उन्‍हें 7वीं राजपूताना रेजिमेंट में भर्ती कर लिया गया था. उल्‍लेखनीय है कि 1947 में भारत-पाक युद्ध के दौरान पाकिस्तानी कबीलाई लड़ाकों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए राजपूताना रेजीमेंट की 50वीं पैरा ब्रिगेड को नौशेरा (जम्‍मू-कश्‍मीर) भेजा गया था. राजपूताना रेजीमेंट की 50वीं पैरा ब्रिगेड में नायक यदुनाथ सिंह भी शामिल थे. टेंढर इलाके में पाकिस्‍तानी सेना से युद्ध के दौरान नायक यदुनाथ सिंह अपनी आखिरी सांस तक दुश्‍मनों से मोर्चा लेते रहे. 6 फरवरी 1948 की सुबह वह दुश्‍मनों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्‍त हो गए. नायक यदुनाथ शर्मा को भारत सरकार द्वारा वर्ष 1950 में मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

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राम राघोबा राणे

Rama raghoba

सेकेंड लेफ्टीनेंट राम राघोबा राणे भारतीय सेना के तीसरे ऐसे सैन्‍य अधिकारी हैं, जिन्‍हें वीरता के सर्वोच्‍च सम्‍मान परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया है. सेकेंड लेफ्टीनेंट राम राघोबा राणे ने अपने सैन्‍य कैरियर की शुरूआत ब्रिटिश भारतीय सेना से की थी. द्वितीय विश्‍व युद्ध में उत्‍कृष्‍ट प्रदर्शन के बाद उन्‍हें भारतीय सेना में शामिल करने का फैसला किया गया था. उन्‍हें 15 दिसंबर 1947 को भारतीय सेना के कोर ऑफ इंजीनियर्स के बॉम्बे सैपर्स रेजिमेंट में नियुक्त किया गया. 1947 में शुरू हुए भारत-पाक युद्ध के दौरान सेकेंड लेफ्टीनेंट राम राघोबा राणे ने खनन क्षेत्रों को साफ कर भारतीय टैंकों को आगे बढ़ने के लिए रास्‍ता बनाया था. उनके इस प्रयासों का नतीजा था कि भारतीय सेना राजौरी में पाकिस्‍तानी लड़ाकों को धूल चलाने में कामयाब रही थी. उनकी इस वीरता के लिए 8 अप्रैल 1948 को उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था. वे 1968 में भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हुए. 28 साल के सैन्‍य सेवा काल में उन्‍हें पांच बार मेन्शंड इन डिस्पैचैस में स्थान मिला था. 1994 में 76 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया था. 

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पीरु सिंह

Piru Singh

कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह परमवीर चक्र से सम्‍मानित होने वाले चौथे भारतीय सैनिक थे. 20 मई 1936 को पीरू सिंह का सैन्‍य जीवन शुरू हुआ था. पीरू सिंह को 1 पंजाब रेजिमेंट की 10वीं बटालियन में नियुक्‍त किया गया था. अपना प्रशिक्षण पूरा होने के बाद 1 मई 1937 को सिंह को उसी रेजिमेंट की 5वीं बटालियन में तैनात कर दिया गया. पीरू सिंह के अदम्‍य साहस और अद्भुत युद्ध कौशल के चलते उन्‍हें अगस्त 1940 में उन्हें लांस नायक, मार्च 1941 में नायक, फरवरी 1942 में हवलदार और मई 1945 में कंपनी हवलदार मेजर के पद पदोन्‍नत किया गया था. हॉकी, बास्केटबॉल और क्रॉस कंट्री दौड़ में अपनी रेजिमेंट का प्रतिनिधित्व करने वाले पीरू सिंह, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश कॉमनवेल्थ ऑक्यूपेशन फ़ोर्स का हिस्‍सा रहे. 1947 के भारत-पाक युद्ध के दौरान पाकिस्‍तानी सेना से लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्‍त हो गए. 1952 में उन्‍हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

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कैप्‍टन विक्रम बत्रा

CAPT VIKRAM BTRA

कैप्‍टन विक्रम बत्रा भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध में अभूतपूर्व वीरता का परिचय देते हुए वीरगति प्राप्त की थी. उनकी इस अपूतपूर्व बहादुरी के लिए उन्‍हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था. कैप्‍टन विक्रम बत्रा ने देहरादून स्थित भारतीय सैन्‍य अकादमी में पहला कदम रखकर अपने सैन्‍य जीवन की शुरूआत की थी. अकादमी में प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्हें 6 दिसम्बर 1997 को जम्मू के सोपोर में तैनात किया गया था. सोपोर में उनकी तैनाती 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में बतौर लेफ्टिनेंट की गई थी. 1999 में कमांडो ट्रेनिंग पूरी होने के साथ कैप्‍टन विक्रम बत्रा को जून 1999 में कारगिल युद्ध के लिए भेज दिया गया. कारगिल युद्ध में अपनी सूझबूझ के चलते कैप्‍टन बत्रा हम्प व राकी नाब जैसी दुर्गम पहाडि़यों पर भारतीय ध्‍वज फहराने में कामयाब रहे थे. इसी जीत के बाद उनकी लेफ्टीनेंट से कैप्‍टन के पद पर पदोन्‍नत कर दिया गया. इसके बाद कैप्‍टन एक के बाद एक जीत हासिल करते गए. कैप्‍टन बत्रा को आखिरी ऑपरेशन 4875 चोटी पर पाकिस्‍तानियों को नश्‍तेनाबूत करने का था. इस ऑपरेशन में बुरी तरह से जख्‍मी होने के बाजूवद कैप्‍टन विक्रम बत्रा ने कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा था. इसी लड़ाई के दौरान अपने साथी की जान बचाने की कोशिश के दौरान वे वीरगति को प्राप्‍त हो गए. कैप्‍टन विक्रम बत्रा के सर्वोच्‍च बलिदान के लिए उन्‍हें 15 अगस्त 1999 को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

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