आदिवासी बच्चों को तीरअंदाजी सीखा रहा है आईटीबीपी का यह जवान, कई ने नेशनल लेवल पर बनाई पहचान

आईटीबीपी के जवान त्रिलोचन महंत आदिवासी बच्चों को तीरंदाजी सिखाने के लिए सकारात्मक कदम उठा रहे हैं.

ज़ी न्यूज़ डेस्क | Jan 10, 2019, 15:14 PM IST

आदिवासी बच्चों को तीरंदाजी सीखाने के लिए त्रिलोचन ने अपनी आंखों से सपनों को देखना बंद कर दिया. बच्चों को तीरंदाजी सीखने में कोई परेशान न हो इसके लिए उन्होंने अपना जीपीएफ तोड़ दिया और 5 लाख रुपये की कीमत से तीर-धनुष खरीदें. त्रिलोचन अब तक कई नक्सल प्रभावित इलाकों के आदिवासी बच्चों को तीरंदाजी में माहिर कर चुके हैं.

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नेशनल लेवल पर खेल चुके हैं बच्चे

जानकारी के मुताबिक, तीरंदाजी सिखाए गए बच्चों में से 30 बच्चे ऐसे भी हैं जो नेशनल लेवल पर तीरंदाजी का हिस्सा बन चुके हैं. महंत ने कहा बच्चा सफल हो जाता है तो उन्हें उनकी गुरू दक्षिणा मिल जाएगी.

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कौन हैं त्रिलोचन महंत

आईटीबीपी के त्रिलोचन महंत प्रधान आरक्षक है जो आर्चरी के खिलाडी भी रह चुके है और आज सर्वीस के साथ साथ बच्चों को अर्चरी का प्रशिक्षण भी दे रहे है. तीन साल के इस समय में ही उन्होंने 30 बच्चों को नेशनल में पहुचा दिया है. अब इनके प्रशिक्षण व जुनून का देखकर ग्रामीण आदिवासी छात्रावासी बच्चों के साथ नगर के बच्चे भी इनसे प्रशिक्षण ले रहे है.

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जीपीएफ को भी किया बच्चों के नाम

बच्चों को प्रशिक्षण कोई शासकीय संस्था या इनका कोई अपना भी नहीं दे रहा, बल्कि सैकड़ों किमी की दूरी से यहां तैनात आईटीबीपी 41वीं बटालियन का एक जवान दे रहा है. इस जवान में बच्चों को सिखाने की इस तरह ललक है, उन्होंने अपने सर्विस से जमा किए गए जीपीएफ की 5 लाख रुपए की राशि इनके नाम करते हुए तीर धनुष खेल के सारे संसाधन खरीद डाले.

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इन बच्चों को दिया बड़ा प्लेटफॉर्म

प्रशिक्षण ले रहे बच्चों में एक आदिवासी छात्रा का खेलो इंडिया में, एक बालिका का नेशलन सीबीएसई गेम में रजत, मयूर गेम नागपुर में दो बच्चों को आठवां-आठवां रैंक की उपलब्धि मिल चुकी है. इसके अलावा तीरंदाजी में कई स्टेट लेबल पर भी उपलब्धियां मिल चुकी हैं

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खुद भी रह चुके हैं तीर अंदाज

एक मध्यम परिवार से संबंध रखने वाले आईटीबीपी 41वीं वाहिनी के हवलदार जेडी त्रिलोचन महंत ओड़िसा के सुंदरगढ़ जिला अंतर्गत समरदरी पोस्ट-लोहैनीपारा के रहने वाले है. त्रिलोचन महंत ने जी मीडिया के अपने बारे में बताया, 1993 में वे कक्षा 6वीं में रहकर पहली बार दादा के हाथ से बनाए हुए तीर से स्थानीय स्कूल स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लिया. इसी प्रतियोगिता में दादा के हाथ से बने धनुस से उन्होने ऐसा प्रदर्शन दिखाया कि उन्होने डिविजन लेबल गेम में प्रथम स्थान पर कब्जा कर लिया.

इसके बाद उन्होने मुड़ कर नहीं देखा और अपने प्रदर्शन के आधार पर 1995 में केउझर स्पोट्स हॉस्टल, 1996 में कोरापुट स्पोट्स हॉस्टल, 1997 में वारीपदा मयुरभुज स्पोट्स हॉस्टल और 1997 में साई हास्टल दिल्ली के लिए चयनित हुए. यहीं 5 साल तक रहकर उन्होने देश के बड़े-बड़े धनुरधारी जैसे ओलंपिक प्लेयर लिम्बाराम, स्कलचंदर, श्यामलाल, धुलचंद आदि के साथ प्रशिक्षण लिया, यहां उन्हे कोच सोमन दास व सोना चांद ने प्रशिक्षण दिया.