एक ऐसा गांव जहां पर बुजुर्गों को मौत से पहले दी जाती है उत्सव वाली विदाई, देखिए तस्वीरें

विभिन्न विविधताओं से भरे भारत में कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक कई सारे त्योहार और अगल-अलग मौकों पर जश्न मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है.

सैयद खालिद हुसैन | Dec 05, 2018, 10:09 AM IST

विभिन्न विविधताओं से भरे भारत में कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक कई सारे त्योहार और अगल-अलग मौकों पर जश्न मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है.

कुछ ऐसी परंपराएं हैं, जिससे हम वाकिफ हैं, लेकिन कुछ ऐसी भी परंपराएं हैं, जिसके बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है.

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कारगिल के 4 गांव मनाते हैं ये परंपरा

Kargil 4 villages celebrate this tradition

कारगिल इलाके में ऐसे चार गावों है जहां इस कबीले के लोग बस्ते है जिन्हें करगिली आर्यन कहा जाता है. यह गावों है दाह, हनु, घरकों और दारचिक है. जहां भारतीय उप महादीप के आर्यन जाति के लोग रहते हैं. इतिहासकार कहते हैं यह लोग दक्षिण एशिया से आए हैं और इलेक्ज़ैंडर बादशा के सेना के परिवार है जो यहां बेस है. 

 

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नए दौर में रूक गई थी परंपरा

The tradition was stopped in the new era

नए दौर में यह उत्सव इस कबीले में रुक गया था मगर इस बार कुछ दिन पहले करीब पचास सालों के बाद इस परंपरा को फिर इस कबीले के लोगों ने ज़िंदा किया. पारंपरिक कपडे पहने पूरे गावों के लोग ईकठा हुवे और दावत देने वाले बुज़र्गो को जीवन यात्रा सकुशल सम्पन करने के लिए बधाई दी.

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यटरा उत्सव का जश्न

Celebrating Yatra Festival

बुजुर्गों के लिए मनाए जाने वाले इस जश्न को यटरा उत्सव कहा जाता है. इस उत्सव को उन लोगों के लिए मनाया जाता है, जो अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा जी चुके होते हैं. इन लोगों के पूर्वज यह मानते थे कि अब उनके जीवन कार्य पूरे हो चुके है और संसार छोड़ने का समय आ गया है तब यह लोग जीवन यात्रा के आखरी समय पर सब को दावत पर बुला कर उनसे भेंट कर उनका शुक्रियाअदा करते है कि उन्हों ने इनका पुरे जीवन साथ दिया.

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पूरे गांव में दी गई दावत

Banquet in whole village

लद्दाख के रहने वाले आर्यन लोगों का जिन को ब्रोख्पा कहा जाता है. लद्दाख क्षेत्र के कारगिल ज़िले से करीब 70 किलोमीटर दूर बटालिक सेक्टर के दारचिक गांव में यह महोत्सव हुआ. दो दिन तक पूरे गांव में नाच गाने के साथ साथ दावतों का माहोल बना रहा.

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50 साल बाद मनाया गया जश्न

Celebrated 50 years later

दरअसल, इस गांव के लोगों का कहना है कि बच्चे के जन्म लेने के बाद हर कोई जश्न मनाता है, लेकिन अपने बुजुर्गों के जाने पर कोई जश्न नहीं मनाता है. गांव में दो दिन तक चलने वाले इस महोत्सव में युवाओं से लेकर बच्चों तक ने हिस्सा लिया.

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बुजुर्गों के लिए मनाया जाता है अनोखा जश्न

Celebrated for the elderly is the unique celebration

कुछ ऐसी ही अनोखी परंपरा है, लद्दाख के एक गांव की. इस गांव में रहने वाला आर्यन कबीला घर के बुजुर्गों के लिए अंतिम क्षणों में जश्न मनाते हैं. बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाला यह जश्न कोई छोटा नहीं बल्कि एक त्योहार की तरह मनाया जाता है.

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