वर्तमान दौर में कृष्ण की प्रासंगिकता

By pranav purushottam | Last Updated: Saturday, September 5, 2015 - 19:03
वर्तमान दौर में कृष्ण की प्रासंगिकता

श्रीकृष्ण हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की पहचान है। कोई भी चीज अपने एक नियत समय के बाद अपनी प्रासंगिकता खो देती है या उसके स्वरुप में बदलाव आ जाता है। खुद कृष्ण ने ही कहा है- 'परिवर्तन संसार का नियम है।' लेकिन कृष्ण की शिक्षाएं कृष्ण का जीवन और कृष्ण की गीता आज भी हमारे लिए उतना ही प्रासंगिक है। कृष्ण मर्यादाओं के बोझ से मुक्त थे। वह सुसंस्कृत ढंग से उन्मुक्त जीवन जिया और मानव जाति को परंपराओं और मर्यादाओं की बेड़ियों से मुक्त होकर जीने का उपदेश दिया। 

आज भारत में सशक्त लोकतंत्र होने के बावजूद लोग भ्रष्ट नेताओं और राजाओं (ए राजा) से त्रस्त हैं। लोगों को भ्रष्ट सत्ताधीशों, मठाधीशों और बलात्कारियों से छुटकारा चाहिए। उन्हें 56" के सीने वालों की दरकार है। 56 इंच अर्थात चौड़ी छाती वाले। अर्जुन ने कृष्ण को कुरुक्षेत्र में चौड़ी छातीवाले कहकर भी संबोधित किया है।    

कृष्ण के शुरुआती जीवनकाल से ही हम बहुत कुछ सीख सकते है। उनके मनमोहक बालरुप से शिशु-मृत्युदर और बच्चों के कुपोषण पर काम करने की प्रेरणा मिलती है। उन्हें गाय बहुत पसंद थी। भारत एक कृषि-प्रधान देश है। गाय का इसमें बहुत बड़ा योगदान है। एक गाय दूध, दही, मक्खन, पनीर और घी के अलावा भी बहुत कुछ देती है। गाय का बछड़ा जब बैल बन जाता है तो इससे खेत की जुताई करते हैं। आज भी छोटे किसान खेत जुताई और माल ढुलाई (बैलगाड़ी) के लिए बैलों पर ही निर्भर है। इसके अलावा ऑर्गेनिक खेती के लिए भी इन्हीं पशुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके गोबर से किसान कंपोस्ट खाद और ऑर्गेनिक खाद बनाते है। 
गीता का ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था। गीता को लेकर आज भी बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं। गीता हमें जीवन को भरपूर जीने की प्ररणा देती है, कर्मयोग की शिक्षा देती है। हमारे लिए जीवंत गुरु, मार्गदर्शक और पथप्रदर्शक का काम करता है। यह हमारे लिए एक संविधान की तरह है जो कर्तव्यों के साथ-साथ जिम्मेदारियों का भी ज्ञान कराती है। वह हमें अन्याय के खिलाफ लड़ने की भी प्रेरणा देते हैं।  आज हम जहां भी कुछ अपने और दूसरों के साथ गलत होते देखते हैं उसका विरोध करने के बजाय हम अपने जिम्मेदारी से भागने की कोशिश करते हैं।

गीता के माध्यम से कृष्ण ने अर्जुन को अनासक्त कर्म यानी 'फल की इच्छा किए बिना कर्म' करने की प्रेरणा दी। इसके पीछे का मूलभाव यह है कि हम यदि फल की इच्छा किए बिना काम करते रहें तो विभिन्न तरह की टेंशन-फ्रस्टेशन से बच सकते हैं।

संगीत और कलाओं का हमारे जीवन में विशिष्ट स्थान है। कृष्ण ने मोरपंख और बांसुरी धारण करके कला, संस्कृति और पर्यावरण के प्रति अपने लगाव को दर्शाया। इनके जरिए उन्होंने संदेश दिया कि जीवन को सुंदर बनाने में संगीत और कला का भी महत्वपूर्ण योगदान है।

कमजोर और निर्बल का सहारा बनने की सीख कृष्ण से ले सकते हैं। निर्धन बाल सखा सुदामा हो या षड्यंत्र के शिकार पांडव, श्रीकृष्ण ने सदा निर्बलों का साथ दिया और उन्हें मुसीबत से उबारा।  

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि

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pranavpurushottam@gmail.com

 

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