मॉनसून सत्रः दो मुद्दों पर पानी में आपके 250 करोड़

By Pritesh Gupta | Last Updated: Sunday, August 23, 2015 - 18:57
मॉनसून सत्रः दो मुद्दों पर पानी में आपके 250 करोड़

प्रीतेश गुप्ता/नई दिल्ली

भारत की संसद में आजकल सिर्फ तीन चीजें चल रही हैं...हंगामा, हंगामा और हंगामा। 'मिनिमम गवर्नमेंट-मैक्सिमम गवर्नेंस' के मंत्रोच्चार के साथ कार्यकाल की शुरुआत करने वाली मोदी सरकार की गाड़ी भी लगता है धीरे-धीरे सियासी खराबी का शिकार हो ही गई... या शायद योजनाओं और संस्थाओं के बदलते नाम, मंत्रियों की बेतुके बयान, संसद में हंगामा और स्थगन को ही अच्छे दिन कहते हैं! इस्तीफा मांगना तो जैसे भारत में विपक्ष का संवैधानिक कर्त्तव्य बन गया है। हर मुद्दे पर 'इस्तीफा दो, इस्तीफा दो' के नारे लगने लगते हैं, कोई इस्तीफा देता नहीं ये अलग बात है। करोड़ों रुपये प्रति घंटे के खर्च पर चलने वाली संसद को सदन के सदस्य सिर्फ हंगामे में बर्बाद कर देते हैं। 

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संसद के कामकाज का ब्योरा रखने वाली पीआरएस लेजिस्लेटिव के मुताबिक बीते मॉनसून सत्र में लोकसभा में निर्धारित समय का 52 फीसदी और राज्यसभा में महज नौ फीसदी ही काम हो पाया है। इसमें भी काम कम और हंगामा ज्यादा था। राज्यसभा में कुल निर्धारित समय का महज एक फीसदी ही प्रश्नकाल चला। राज्यसभा में 82 घंटे और लोकसभा में 34 घंटे की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ गई। पूरे सत्र में 250 करोड़ से भी ज्यादा रुपये खर्च हुए हैं।

इसी तरह पिछले छह सत्रों में करीब 2162 घंटे बेकार चले गये। 15वीं लोकसभा द्वारा भी 328 बिल पास किये जाने थे, लेकिन केवल 179 ही पास हो पाए। ये अब तक पांच साल के किसी भी कार्यकाल में पास हुए बिलों की सबसे कम संख्या थी। उल्लेखनीय है कि सालभर में करीब 80 दिनों तक संसद की कार्यवाही चलती है, सदन में दिन में करीब छह घंटे कार्य होता है। इस तरह सदन की प्रत्येक मिनट की कार्यवाही पर औसत ढाई लाख रुपये का खर्च आता है।

मॉनसून सत्र के दौरान सदन में हर वो काम हुआ जो संसदीय मर्यादा के अनुरूप नहीं है। जिस सदन में बैठकर कानून बनाये जाते हैं, वहीं कानूनों का जमकर उल्लंघन हुआ। सदन में विरोध के नाम पर तख्तियां, प्ले कार्ड्स और काली पट्टियां ले जाना उनमें से चंद उदाहरण हैं। वेल में जाकर उपसभापति पर कागज के टुकड़े फेंकना। जनता के करोड़ों रुपये नये विधेयकों पर बहस के बजाय निरर्थक गतिविधियों में बहस पर न्योछावर कर दिये गये। इस दौरान एक सुपर सीनियर नेता को इस बात की भी चिंता हो गई कि उनका ये 'शर्मनाक ड्रामा' कैमरे पर नहीं दिखाया जा रहा था। सवाल राम कौन और रावण कौन का नहीं है। सवाल उस सीता का है जो जनता के रूप में हर तरफ से 'वनवास' झेल रही है।

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ललितगेट, व्यापम (जिसकी पहले से सीबीआई जांच चल रही है), बोफोर्स, भोपाल गैस कांड, रॉबर्ट वाड्रा जैसे तमाम विषयों पर जमकर हंगामा हुआ लेकिन लैंड बिल, जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण बिल अटके रह गये। पूरे मॉनसून सत्र में केवल एक ही विधेयक- दिल्ली उच्च न्यायालय (संशोधन) विधेयक सफलतापूर्वक पारित हो पाया है। 

इधर, सालभर पहले ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार रहे राहुल गांधी जैसे नेता संसद के अंदर कम और संसद के बाहर चर्चा में ज्यादा रूचि ले रहे थे। शायद कांग्रेस के लिये ये विधेयक ललितगेट पर हंगामे से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थे। कांग्रेस इसलिये क्योंकि बाकी विपक्ष सदन में चर्चा के लिये तैयार था। भारतीय संविधान में कई देशों से नियमों का आयात हुआ है, अब वक्त है अमेरिका से कुछ और आयात कर लेने का... जहां संसदीय कार्यवाही को बाधित करना अपराध की श्रेणी में आता है।

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