एक राजनीतिक व्यंग्य है 'नौटंकी राजा'

Last Updated: Sunday, August 30, 2015 - 09:10
एक राजनीतिक व्यंग्य है 'नौटंकी राजा'

ललित फुलारा

इस गुरुवार को दिल्ली के गोल मार्कट स्थित मुक्तधारा ऑडिटोरियम में व्यंग्य नाटक 'नौटंकी राजा' का मंचन हुआ। भारतेंदु नाट्य अकादमी से स्नातकोत्तर रंगकर्मी भूपेश जोशी ने नाटक का निर्देशन किया। नाटक राजनीतिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक मूल्यों में हो रहे पतन पर करारी चोट करता है। नाटक को युवा लेखक अनुज खरे ने लिखा है। नौटंकीपुर राज्य के राजा का देहांत हो गया है। राज्य की सलेक्शन समिति विदूषक को राज्य के लिए नया राजा खोजने का जिम्मा सौंपती है। विदूषक पूरे देशभर में भ्रमण कर कुछ चुने हुए लोगों को सलेक्शन कमेटी के पास लेकर पहुंचता है और उनकी खासियत से समिति को रू-ब-रू कराता है। अंत में सलेक्शन कमेटी विदूषक को ही नौटंकीपुर राज्य का राजा घोषित कर देती है।

 

 

सलेक्शन कमेटी सभी कैंडिडेट को देखने के बाद फैसला करती है कि ये तो अपने-अपने धंधों में ही नौटंकी कर सकते हैं, लेकिन हमारा विदूषक तो ऑलराउंडर है। सभी क्षेत्रों में पक्का नौटंकीबाज है इसलिए नौटंकीपुर राज्य के लिए ये ही उपयुक्त राजा होगा। इस तरह एक बार फिर नौटंकीपुर राज्य अस्तित्व में आ जाता है। नाटक में विदूषक का किरदार मयंक ने निभाया है।  विदूषक राजा की खोज के लिए सबसे पहले एक बाबा के पास पहुंचता है। बाबा के किरदार में भूपेश जोशी ने अपने दमदार अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया और उसमें राधे मां, निर्मल बाबा सरीखे स्वयंभू बाबाओं के शेड्स को बखूबी उकेरा। वहीं, थानेदार की भूमिका में रोहित ने स्टेज पर दमदार उपस्थिति बनाए रखी। जबकि शराबी की भूमिका में निलेंद्र की स्लाइलेंस उपस्थिति काफी एट्रेक्टिव थी। 

 

 

 

नाटक में कहीं-कहीं तकनीकी खामियां ज़रूर उभरकर सामने आती हैं। हालांकि, कलाकारों की स्टेज पर दमदार उपस्थिति इन खामियों की तरफ दर्शकों का इतना ध्यान आकर्षित नहीं करती हैं। वैसे भी मुक्तधारा ऑडिटोरियम को बड़े नाटकों के लिहाज से उपयुक्त नहीं माना जाता है। यहां मैंने पहले भी कई नाटकों को देखा है सबके साथ एक जैसी समस्या आती है। एक ही विंग होने से कलाकारों को वहीं से एक्जिट और एंट्री करनी पड़ती है। नाटक के कुछ सीन्स अगर और छोटे कर दिए जाते तो हास्य का वातावरण और प्रभावपूर्ण रूप से दर्शकों तक पहुंचता। नाटक के हर पंच को दर्शकों ने हाथों हाथ स्वीकारा और जमकर तालियां बजाई।

 

नाटक में सुविधाभोगी अभिजात्य वामपंथियों पर भी करारा कटाक्ष किया गया है। क्लबों में बैठकर मदिरा के नशे में क्रांति का दिवाप्सन देखने और सर्वहारा से कोसों दूर छिटक कर रहने वाले ऐसे कथित वामपंथियों को शाम ढलते ही क्रांति और सर्वहारा की याद आती है। और फिर नशा उतरने के साथ ही क्रांति का भूत भी उतर जाता है। नाटक में विदूषक कहता है- स्वर्ग में गांधी जी से चित्रगुप्त जी मिले। तब गांधी जी ने अपने तीनों बंदरों का हाल पूछा। चित्रगुप्त बोले- वो तीनों बहुत मजे में हैं। जो अंधा था वो तो कानून बन गया है, जो बहरा था वो सरकार बन गया है औरजो गूंगा था वो सबसे मस्त है, वो बड़ा नेता बन गया है..। ये लाइनें लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन को बखूबी दर्शाती हैं। नाटक में साउंड ऑपरेशन पंकज दुबे और लाइटिंग रविंद्र ने की है। परिधान सभी कलाकारों ने खुद ही डिजाइन किए जबकि मेकअप निर्देशक भूपेश जोशी ने ही किया। नाटक का म्यूजिक सेतू और अनुराग ने कम्पॉज किया है। नाटक में अन्य भूमिकाओं में रिचा, रोहित, विपुल, अक्षय, शांतनु, द्विपिन और आशीष, अरुण, बसंत, हरदीप, यशी शामिल थे।

 

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