थर्ड जेंडर की बड़ी समस्या- कौन-से शौचालय में जाएं

By Pritesh Gupta | Last Updated: Wednesday, April 15, 2015 - 17:47

नई दिल्ली: ‘तीसरे लिंग’ के रूप में पहचान देने वाले सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के एक साल बाद ट्रांसजेंडर समुदाय ने कहा कि ‘सामाजिक मान्यता’ के लिए अब भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।

ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने कहा कि एक साल बीत चुका है लेकिन हमारे समुदाय की दुर्दशा अब भी वही है। ऐसी कुछ जगह हैं जहां हमारे लिंग को मान्यता मिली है लेकिन अब भी बहुत काम करने की जरूरत है। त्रिपाठी ने अपने समुदाय के सदस्यों के साथ आज यहां जंतर-मंतर पर शीर्ष अदालत के फैसले का एक साल पूरा होने पर जश्न मनाया।

इस मौके पर सदस्यों ने ‘आई बैंक एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ को अपनी आंखें दान करने का संकल्प लिया। कोलकाता की ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता अमिताव सरकार ने कहा कि तीसरे लिंग श्रेणी को कुछ राज्यों में कुछ खास कानूनी दस्तावेजों में मान्यता मिली है लेकिन अस्पतालों तथा शिक्षण संस्थानों में हमारी मान्यता कहां है? उन्होंने कहा कि अस्पतालों में उन्हें नहीं पता कि हमें कहां रखें। हमारे लिए अलग शौचालय नहीं हैं। इन विषयों पर गौर करने की जरूरत है। हालांकि सरकार ने कहा कि उन्हें लगता है कि अगर बच्चों को स्कूलों में तीनों लिंगों के बीच अंतर पढ़ाया जाए तो ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ भेदभाव को रोका जा सकता है।

सरकार ने कहा कि समस्या जमीनी स्तर पर है। अगर बच्चों को तीनों लिंगों की अलग अलग यौन तरजीह के बारे में पढ़ाया जा सके तो स्कूलों या कॉलेजों से इस तरह के बच्चे या लोग पढ़ाई बीच में नहीं छोड़ेंगे। हम उच्च शिक्षा का अपना सपना पूरा कर सकते हैं।

भाषा

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