भारत के लिए जीते पदक

Jun 30, 2012, 04:22 PM IST
<h3>हॉकी: गोल्डन गेम</h3><br/>हॉकी भारत का पहला खेल है जो ओलंपिक में भारत उपस्थिति दर्ज की। भारतीय हॉकी टीम 28 वर्षों तक खेलों की दुनिया पर राज किया और समर ओलंपिक में अपराजय रहा था। भारत ने हॉकी में कुल 11 ओलंपिक पदक जीते। इनमें आठ स्वर्ण पदक, एक रजत पदक और दो कांस्य पदक हैं। इनमें अंतिम स्वर्ण पदक 1980 में मास्को ओलंपिक हासिल हुआ। पूरी दुनिया हॉकी के जादूगर ध्यानचंद और उनकी टीम के खेल के सामने नतमस्तक थी। भारतीय हॉकी टीम के प्रशंसक दुनिया भर में थे।
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हॉकी: गोल्डन गेम
हॉकी भारत का पहला खेल है जो ओलंपिक में भारत उपस्थिति दर्ज की। भारतीय हॉकी टीम 28 वर्षों तक खेलों की दुनिया पर राज किया और समर ओलंपिक में अपराजय रहा था। भारत ने हॉकी में कुल 11 ओलंपिक पदक जीते। इनमें आठ स्वर्ण पदक, एक रजत पदक और दो कांस्य पदक हैं। इनमें अंतिम स्वर्ण पदक 1980 में मास्को ओलंपिक हासिल हुआ। पूरी दुनिया हॉकी के जादूगर ध्यानचंद और उनकी टीम के खेल के सामने नतमस्तक थी। भारतीय हॉकी टीम के प्रशंसक दुनिया भर में थे।

<h3>विजेंदर सिंह</h3><br/>लंबा और हैंडसम विजेंदर सिंह ने जब भारत के लिए बॉक्सिंग में पहला ओलंपिक पदत जीता तब भारतीय मीडिया ने विजेंदर क्रिकेट सितारों की तरह सर आंखों पर बिठाया। बीजिंग ओलंपिक 2008 में विजेंदर ने इक्वेडोर के कार्लोस गोंगोरा मेर्काडो को हराकर कांस्य पदक जीता। ग्लैमर की दुनिया में छाने के बावजूद उन्होंने मिलान विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप 2009 में कांस्य पदक जीतकर अपने विरोधियों को गलत साबित किया।
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विजेंदर सिंह
लंबा और हैंडसम विजेंदर सिंह ने जब भारत के लिए बॉक्सिंग में पहला ओलंपिक पदत जीता तब भारतीय मीडिया ने विजेंदर क्रिकेट सितारों की तरह सर आंखों पर बिठाया। बीजिंग ओलंपिक 2008 में विजेंदर ने इक्वेडोर के कार्लोस गोंगोरा मेर्काडो को हराकर कांस्य पदक जीता। ग्लैमर की दुनिया में छाने के बावजूद उन्होंने मिलान विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप 2009 में कांस्य पदक जीतकर अपने विरोधियों को गलत साबित किया।

<h3>अभिनव बिंद्रा</h3><br/>अभिनव बिंद्रा का नाम भारतीय खेल के इतिहास में सदा के लिए अंकित हो गया, जब उन्होंने भारत के लिए पहला ओलंपिक गोल्ड मेडल जीता। उन्होंने बीजिंग ओलंपिक 2008 के10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीता। साथ ही वे वर्तमान में विश्व चैंपियन भी हैं। बिंद्रा को इस उपलब्धि के लिए कई पुरस्कार और सम्मान से नवाजा गया है।
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अभिनव बिंद्रा
अभिनव बिंद्रा का नाम भारतीय खेल के इतिहास में सदा के लिए अंकित हो गया, जब उन्होंने भारत के लिए पहला ओलंपिक गोल्ड मेडल जीता। उन्होंने बीजिंग ओलंपिक 2008 के10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीता। साथ ही वे वर्तमान में विश्व चैंपियन भी हैं। बिंद्रा को इस उपलब्धि के लिए कई पुरस्कार और सम्मान से नवाजा गया है।

<h3>सुशील कुमार</h3><br/>एक ड्राइवर का बेटा सुशील कुमार ने बीजिंग ओलंपिक 2008 में कांस्य पदक जीतकर न केवल अपने पिता के सपनों के सकार किया बल्कि कुश्ती में विश्व के नक्शे पर अमिट छाप छोड़ने में कामयाब हुआ। सुशील ने काजाखस्तान के लियोनिड स्पिरिडोनोव को 3-1 से हराया। ओलंपिक के 56 वर्षों में किसी भारतीय ने पहली बार कुश्ती में पदक हासिल किया। इसके साथ ही उन्होंने मास्को में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप 2010 में स्वर्ण पदक जीतकर अपने दबदबे को जारी रखा।
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सुशील कुमार
एक ड्राइवर का बेटा सुशील कुमार ने बीजिंग ओलंपिक 2008 में कांस्य पदक जीतकर न केवल अपने पिता के सपनों के सकार किया बल्कि कुश्ती में विश्व के नक्शे पर अमिट छाप छोड़ने में कामयाब हुआ। सुशील ने काजाखस्तान के लियोनिड स्पिरिडोनोव को 3-1 से हराया। ओलंपिक के 56 वर्षों में किसी भारतीय ने पहली बार कुश्ती में पदक हासिल किया। इसके साथ ही उन्होंने मास्को में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप 2010 में स्वर्ण पदक जीतकर अपने दबदबे को जारी रखा।

<h3>राज्यवर्धन सिंह राठौर</h3><br/>निशानेबाज़ राज्यवर्धन सिंह राठौर ने वर्ष 2004 के एथेंस ओलंपिक में भारत की ओर से एकमात्र पदक जीतने में सफलता पाई। 1998 में ही राठौर ने निशानेबाज़ी मुक़ाबले में भाग लेना शुरू किया था। जल्द ही उन्होंने इन मुक़ाबलों में अपना दमख़म दिखाना शुरू कर दिया। साइप्रस के विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने के बाद ही उन्हें एथेंस ओलंपिक में खेलने का अवसर मिला। उन्हें वरीयता क्रम में तीसरा स्थान भी मिला। सिडनी विश्व कप में भी राठौर ने स्वर्ण पदक जीता था। वर्ष 2004 में ही राज्यवर्धन सिंह राठौर को राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
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राज्यवर्धन सिंह राठौर
निशानेबाज़ राज्यवर्धन सिंह राठौर ने वर्ष 2004 के एथेंस ओलंपिक में भारत की ओर से एकमात्र पदक जीतने में सफलता पाई। 1998 में ही राठौर ने निशानेबाज़ी मुक़ाबले में भाग लेना शुरू किया था। जल्द ही उन्होंने इन मुक़ाबलों में अपना दमख़म दिखाना शुरू कर दिया। साइप्रस के विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने के बाद ही उन्हें एथेंस ओलंपिक में खेलने का अवसर मिला। उन्हें वरीयता क्रम में तीसरा स्थान भी मिला। सिडनी विश्व कप में भी राठौर ने स्वर्ण पदक जीता था। वर्ष 2004 में ही राज्यवर्धन सिंह राठौर को राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

<h3>कर्णम मल्लेश्वरी</h3><br/>वर्ष 2000 के सिडनी ओलंपिक में भारत की कर्णम मल्लेश्वरी ने भारोत्तोलन में कांस्य पदक जीतकर पदक तालिका में भारत का नाम जुड़वाया। कर्णम मल्लेश्वरी भारत की पहली और अभी तक एकमात्र महिला खिलाड़ी हैं, जिन्हें ओलंपिक में कोई पदक मिला है। मल्लेश्वरी ने सिडनी ओलंपिक के 69 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीता था। उन्होंने स्नैच वर्ग में 110 किलो और क्लीन और जर्क वर्ग में 130 किलो का भार उठाकर, कुल 240 किलो का भार उठाया था। भारतीय खेल प्राधिकरण की एक योजना के तहत मल्लेश्वरी को प्रशिक्षण मिला। मल्लेश्वरी को अर्जुन पुरस्कार, खेल रत्न पुरस्कार और पद्म श्री सम्मान भी मिल चुका है।
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कर्णम मल्लेश्वरी
वर्ष 2000 के सिडनी ओलंपिक में भारत की कर्णम मल्लेश्वरी ने भारोत्तोलन में कांस्य पदक जीतकर पदक तालिका में भारत का नाम जुड़वाया। कर्णम मल्लेश्वरी भारत की पहली और अभी तक एकमात्र महिला खिलाड़ी हैं, जिन्हें ओलंपिक में कोई पदक मिला है। मल्लेश्वरी ने सिडनी ओलंपिक के 69 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीता था। उन्होंने स्नैच वर्ग में 110 किलो और क्लीन और जर्क वर्ग में 130 किलो का भार उठाकर, कुल 240 किलो का भार उठाया था। भारतीय खेल प्राधिकरण की एक योजना के तहत मल्लेश्वरी को प्रशिक्षण मिला। मल्लेश्वरी को अर्जुन पुरस्कार, खेल रत्न पुरस्कार और पद्म श्री सम्मान भी मिल चुका है।

<h3>लिएंडर पेस</h3><br/>लगभग चार दशक के अंतराल के बाद, व्यक्तिगत स्पर्धा में लिएंडर पेस ने वर्ष 1996 के अटलांटा ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर भारतीय ख़ेमे में ख़ुशी की लहर दौड़ा दी थी। अटलांटा ओलंपिक में उन्हें वाइल्ड कार्ड से प्रवेश मिला था। अटलांटा में पेस ने अपने सिंगल्स अभियान की शुरुआत ही शानदार अंदाज़ में की और पहले दौर में अमरीका के जाने माने खिलाड़ी रिची रेनबर्ग को पटखनी दे दी। क्वार्टर फ़ाइनल जीत कर तो उन्होंने कमाल ही कर दिया। सेमीफ़ाइनल में अगासी ने पेस को कोई मौक़ा नहीं दिया और 7-6, 6-3 से मैच जीत कर पेस के साथ-साथ उनके करोड़ों समर्थकों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। लेकिन पेस ने ब्राज़ील के फ़र्नैंडो मेलीजेनी को हराकर कांस्य पदक जीत लिया।
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लिएंडर पेस
लगभग चार दशक के अंतराल के बाद, व्यक्तिगत स्पर्धा में लिएंडर पेस ने वर्ष 1996 के अटलांटा ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर भारतीय ख़ेमे में ख़ुशी की लहर दौड़ा दी थी। अटलांटा ओलंपिक में उन्हें वाइल्ड कार्ड से प्रवेश मिला था। अटलांटा में पेस ने अपने सिंगल्स अभियान की शुरुआत ही शानदार अंदाज़ में की और पहले दौर में अमरीका के जाने माने खिलाड़ी रिची रेनबर्ग को पटखनी दे दी। क्वार्टर फ़ाइनल जीत कर तो उन्होंने कमाल ही कर दिया। सेमीफ़ाइनल में अगासी ने पेस को कोई मौक़ा नहीं दिया और 7-6, 6-3 से मैच जीत कर पेस के साथ-साथ उनके करोड़ों समर्थकों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। लेकिन पेस ने ब्राज़ील के फ़र्नैंडो मेलीजेनी को हराकर कांस्य पदक जीत लिया।

<h3>केडी जाधव: पॉकेट डायनमो</h3><br/>स्वतंत्र भारत में व्यक्तिगत तौर पर ओलंपिक में पदक जीतने वाले पहले खिलाड़ी थे खाशाबा दादा साहेब जाधव जिन्होंने सरकारी उपेक्षा और आर्थिक तंगहाली के बावजूद 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में फ़्री स्टाइल कुश्ती में कांस्य पदक हासिल किया था। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव गोलेश्वर में रहते थे केडी जाधव। वे बचपन से ही खेलों में काफ़ी रुचि रखते थे। भारत को आज़ादी मिलने के बाद पहला ओलंपिक लंदन में 1948 में हुआ था जिसमें जाधव को निराशा ही हाथ लगी। वे छठे पायदान पर रहे। उन्होंने अपनी यात्रा के लिए अपने अजीज मित्रों, हितैषियों और शिक्षकों की मदद से खुद ही पैसे का बंदोबस्त किया। हेलंसिकी में जाधव ने छठे दौर में जापान के मशहूर पहलवान सोनाची इशी को हराया था और इसके आधे घंटे के अंदर उन्हें अगली कुश्ती लड़नी पड़ी। तब इसका विरोध करने के लिए वहां कोई भारतीय अधिकारी मौजूद नहीं था। जाधव काफी थके हुए थे और रूस के मेनोद बेकोव ने इसका फायदा उठाकर उन्हें हरा दिया। भारत के इस महान पहलवान को इस तरह से कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा। इससे पहले इन्होंने ओलंपिक में कनाडा, मेक्सिको और जर्मनी के पहलवानों को हराया जाधव था। 14 अगस्त 1984 को एक सड़क दुर्घटना में उनकी मौत हो गई, वर्ष 2000 में केडी जाधव को मरणोपरांत अर्जुन पुरस्कार प्रदान किया गया था। अपनी फुर्ती और कुशलता के कारण उन्हें पाकेट डायनमो भी कहा जाता था।
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केडी जाधव: पॉकेट डायनमो
स्वतंत्र भारत में व्यक्तिगत तौर पर ओलंपिक में पदक जीतने वाले पहले खिलाड़ी थे खाशाबा दादा साहेब जाधव जिन्होंने सरकारी उपेक्षा और आर्थिक तंगहाली के बावजूद 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में फ़्री स्टाइल कुश्ती में कांस्य पदक हासिल किया था। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव गोलेश्वर में रहते थे केडी जाधव। वे बचपन से ही खेलों में काफ़ी रुचि रखते थे। भारत को आज़ादी मिलने के बाद पहला ओलंपिक लंदन में 1948 में हुआ था जिसमें जाधव को निराशा ही हाथ लगी। वे छठे पायदान पर रहे। उन्होंने अपनी यात्रा के लिए अपने अजीज मित्रों, हितैषियों और शिक्षकों की मदद से खुद ही पैसे का बंदोबस्त किया। हेलंसिकी में जाधव ने छठे दौर में जापान के मशहूर पहलवान सोनाची इशी को हराया था और इसके आधे घंटे के अंदर उन्हें अगली कुश्ती लड़नी पड़ी। तब इसका विरोध करने के लिए वहां कोई भारतीय अधिकारी मौजूद नहीं था। जाधव काफी थके हुए थे और रूस के मेनोद बेकोव ने इसका फायदा उठाकर उन्हें हरा दिया। भारत के इस महान पहलवान को इस तरह से कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा। इससे पहले इन्होंने ओलंपिक में कनाडा, मेक्सिको और जर्मनी के पहलवानों को हराया जाधव था। 14 अगस्त 1984 को एक सड़क दुर्घटना में उनकी मौत हो गई, वर्ष 2000 में केडी जाधव को मरणोपरांत अर्जुन पुरस्कार प्रदान किया गया था। अपनी फुर्ती और कुशलता के कारण उन्हें पाकेट डायनमो भी कहा जाता था।

<h3>नार्मन प्रिटचार्ड</h3><br/>रिकॉर्ड बुक की बात करें तो भारत को ओलिंपिक के पहले दो पदक वर्ष 1900 में आयोजित पेरिस ओलिंपिक में ही मिल गए थे। तब ब्रिटिश धावक नार्मन प्रिटचार्ड ने भारत की ओर से हिस्सा लेते हुए एथलेटिक्स में दो रजत पदक जीते थे। नार्मन ने 200 मीटर डैश और 200 मीटर बाधा दौड़ में  ये पदक जीते थे। हालांकि कोई भी भारतीय इन्हें भारत का पदक नहीं मानता है।<br>
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नार्मन प्रिटचार्ड
रिकॉर्ड बुक की बात करें तो भारत को ओलिंपिक के पहले दो पदक वर्ष 1900 में आयोजित पेरिस ओलिंपिक में ही मिल गए थे। तब ब्रिटिश धावक नार्मन प्रिटचार्ड ने भारत की ओर से हिस्सा लेते हुए एथलेटिक्स में दो रजत पदक जीते थे। नार्मन ने 200 मीटर डैश और 200 मीटर बाधा दौड़ में ये पदक जीते थे। हालांकि कोई भी भारतीय इन्हें भारत का पदक नहीं मानता है।