एक पिता का पत्र जो हर स्कूल के लिए एक सबक है

क्या इस नंबर गेम से मुक्ति संभव है और क्या इसमें कुसूर केवल एक स्कूल भर का है. शायद नहीं. सवाल इतने भारी भी नहीं हैं और इतने आसान भी नहीं हैं.

एक पिता का पत्र जो हर स्कूल के लिए एक सबक है

प्रवेश प्रक्रिया के दौरान मैंने यह महसूस किया कि स्कूल प्रबंधन की मानसिकता सिर्फ अंको की दौड़ तक ही सीमित है और अंकीय आधार का यह क्रूर पैमाना कक्षा 1 के स्तर पर कितना उचित है. यह कैसा पैमाना है जो प्रतिभा की भ्रूण हत्या कर दे, जो प्रतिभा को निखारने के पहले उसे संभावना शून्य घोषित कर दे. यह कैसा परीक्षण है तो बिना बीजारोपण के पौधे को विकसित और पल्लिवित होने की संभावना को किसी भी सिरे पर अस्वीकार कर दे. यहां मेरा शिक्षा से आशय महज अंकों से नहीं है, बल्कि उस सर्वांगीण विकास से है, जिसका दावा अक्सर शैक्षणिक संस्थान करते हैं.

यह हिस्‍सा हाल ही में स्‍कूल प्रबंधन को लिखे गए उस पत्र का है जो एक पिता ने अपनी बेटी का एडमिशन निरस्‍त करने के लिए लिखा है. स्कूल भी ऐसा—वैसा नहीं, शहर के सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों में एक जिसमें प्रवेश के लिए साम-दाम-दंड-भेद लगाने पड़ते हों ! आखिर क्यों एक पिता को अपनी बेटी के पक्ष में ऐसा निर्णय लेने को मजबूर होना पड़ा ?

क्या वाकई हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का क्रूर चेहरा सबके सामने उजागर हो चुका है. जवाब खोजने के लिए आपको कहीं दूर नहीं जाना है. हमारे ही घरों में, हमारे ही आस—पड़ोस में ऐसा खुलेआम हो रहा है.

यह एक महत्‍वपूर्ण पत्र इसलिए है क्‍योंकि अभिभावक की तरफ से एक साहसिक कदम उठा कर लिखा गया है. पर क्‍या हमारे समाज में सभी इस तरह का फैसला ले पाते हैं या भव्‍य स्‍क्‍ूलों में मनमानी को स्वीकार्य भाव से देखा जाने लगा है. दरअसल इसके लिए बच्चों के प्रति एक संवेदनशील नजरिया चाहिए होता है, लेकिन अपेक्षाओं के बोझ में कोई ऐसा नजरिया लाए भी तो कैसे, कोई प्रतिकार करे भी तो कैसे ?

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा यह पत्र कई कारणों से खास बन गया है. इससे पहले हम कोटा के कलेक्‍टर रवि कुमार के उस पत्र को भी पढ चुके हैं जो उन्‍होंने कोटा शहर में बच्‍चों की आत्‍महत्‍याओं से आहत होकर लिखा था. इससे पहले हम सिगापुर के एक स्‍कूल के प्रिंसिपल के पत्र को भी पढ चुके हैं, लेकिन उन पत्रों में जरूरी सलाहें ही थीं, इस वक्‍त में जरूरत ऐसे साहसिक कदमों की है जो तथाकथित बेस्‍ट स्‍कूलों को उनका चेहरा दिखा सकें.

वास्‍तव में उन्‍हें प्रोफेसर यशपाल की वह बात याद रखनी होगी जिसमें वह कहते हैं कि ‘अगर आप वास्तव में देखें तो जिन्होंने पिछले 50 साल में देश पर असर डाला होगा, वो आईआईटीमें पहले दर्जे पर आए लोग नहीं होंगे या बहुत कम होंगे. ज़्यादातर उनमें औसत नंबर पाने वाले होंगे.‘

क्या यह सही नहीं है कि नंबर गेम केवल स्कूल में ही नहीं होता. वह बच्चों का भयानक तरीके से पीछा कर रहा होता है. क्लासरूम से निकलकर वह बस में सवार हो जाता है, घर में घुस आता है, आस—पड़ोस में बच्चों के साथ टहलता है, मेहमानों की पीठ पर सवार होता है और मेजबानों की तश्तरी में भी परोस दिया जाता है. क्या इस नंबर गेम से मुक्ति संभव है और क्या इसमें कुसूर केवल एक स्कूल भर का है. शायद नहीं. सवाल इतने भारी भी नहीं हैं और इतने आसान भी नहीं हैं.

यह सवाल केवल शिक्षा व्यवस्था के भी नहीं हैं, यह सवाल एक व्यक्ति के जीवन के अधिकारों की सुनिश्चितता के भी हैं, आजीविका के हैं, अपनी गरिमा और सम्मान के भी हैं. एक भरोसा खड़े करने के भी हैं जो यह कहे कि तुम्हारे नंबर नहीं आए तो भी कोई बात नहीं, मैं तुम्हें सम्माजनक जीवन जीने का भरोसा दिलाता हूं. चलो तुम यह न बनो, तुम जो चाहो बनो, खूब रचनात्‍मक बनो, अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार तुम्हें भी है और उसमें हम सभी सहभागी हैं. .

दरअसल तो हमारे समाज में ऐसे मॉडल ही खडे नहीं हो पाए हैं. हैं तो इक्‍के ‘-दुक्‍के प्रयोग हैं, जिन्‍हें फल्‍मों में देखकर हम वाह-वाह तो कर सकते हैं, पर वास्‍तव में अपने बच्‍चे को वहां नहीं भेज सकते, यह हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था की असफलता की भी एक कहानी है जो हमारे पास बिना अंकों की प्रतियोगिता वाले मॉडल ही नहीं हैं. ऐसे में यदि पालक किसी एक स्‍कूल से निकाल भी ले तो सवाल यह है कि वह जाएंगे कहां. महती जरूरत इस बात की भी है कि हम बच्‍चों के लिए एक ऐसे संसार की रचना कर सकें जहां वास्‍तव में उनका बचपन भी फलफूल सके और भविष्‍य की बुनियाद भी मजबूत हो सके.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

 

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