नेहरू की छवि मलिन कर हम अपना भविष्य धूमिल कर रहे हैं...

नेहरू ने तो पराक्रमी और महान जीवन जिया. आज का भारत उनके आधुनिक मन का ही विस्तार अपने सार्वजनिक जीवन की समस्त सकारात्मकताओं में समेटे हुए है.

नेहरू की छवि मलिन कर हम अपना भविष्य धूमिल कर रहे हैं...

नेहरू 1916 में इंग्लैंड से पढ़कर भारत लौट आए थे. भारत को आजादी मिल जाएगी यह बात दूसरे विश्वयुद्ध के खत्म होने के बाद तब स्पष्ट हुई, जब अप्रत्याशित रूप से दूसरे विश्वयुद्ध में इंग्लैंड की जीत के महानायक चर्चिल को वहां के मतदाताओं ने हरा दिया और लेबर पार्टी सत्ता में आ गई. एटली प्रधानमंत्री बन गए. दूसरे विश्वयुद्ध ने इंग्लैंड को यह भी बता दिया था कि साम्राज्य को बनाए रखना अब उसके सामर्थ्य के बाहर हो चुका है. परंतु चर्चिल वह शख्सियत थे, जो ब्रिटिश साम्राज्य पर गर्व के तत्वों से ही निर्मित हुए थे. उन्होंने हर कदम पर भारत की आजादी का भीषण विरोध किया था. एटली के निर्णय के खिलाफ वे जिस हद तक जितना कुछ कर सकते थे, उन्होंने किया. वे साम्राज्य को बनाए रखने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ थे. 

एटली भी भारत को आजाद करने को लेकर सैद्धांतिक रूप से सहमत थे. इस सहमति में यह निहित नहीं था कि भारत को जल्द से जल्द छोड़ देना है. परंतु आजादी की संभावना को जैसे ही सैद्धांतिक सहमति मिली, भारत में मुस्लिम लीग की राजनीति तेज हो गई और गुणात्मक रूप से बदल गई. इसके अलावा जितने भी अलगाववादी तत्व थे, वे सब सक्रिय हो गए. 
रियासतों के रजवाड़ों में तमाम तरह के गणित रचे जाने लगे. कुल मिलाकर स्थिति यह बनी कि ब्रिटेन की मजबूत केंद्रीय सत्ता के तहत जो भारत था, अब अंग्रेजों के जाने की परिस्थिति पैदा होने पर वह किसी और ही रूप में दिखाई देने लगा. यह भारत खतरनाक था. ब्रिटिश सरकार के सामने अब मुख्य प्रश्न यह नहीं था कि भारत को स्वतंत्रता देनी है या नहीं. मुख्य प्रश्न यह बन गया कि कैसे वह गोरी नौकरशाही, फौज और सारे ब्रिटिशों को भारत से सुरक्षित निकाले, कैसे भारत में गृहयुद्ध की परिस्थितियों को रोके, कैसे साम्राज्य को समेटे. कैसे अंतराष्ट्रीय रूप से अपनी छवि को दागदार न होने दे. 

ये वे कारण थे, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि भारत को जितनी जल्दी हो उतनी जल्दी आजाद कर देना है. इसलिए भारत की स्वतंत्रता के लिए जून 1948 की मियाद तय की गई. हालांकि अधिकांश संबंधित ब्रिटिश सिर्फ इस एक व्यावहारिक कारण से इतनी जल्दी आजादी के पक्ष में नहीं थे, कि इतने बड़े साम्राज्य को इतनी कम अवधि में समेटा जाना एक असंभव काम है. ढेर समझौते, व्यावसायिक हित, संपत्तियां इस परिवर्तन में उलझे हुए थे. अंग्रेज यहां तीन सदी से थे. इतनी सारी जड़ों को एकदम से उखाड़ लेना, बहुत मुश्किल काम था. और आज की तरह की संचार व अन्य सुविधाएं नहीं थीं, कि इस प्रक्रिया के लाखों-लाख काम, दस्तावेज, हस्तांतरण तेजी से निपट पाते. 

परंतु हालात इतनी तेजी से बिगड़े कि जून 1948 तो दूर, माउंटबेटन ने तय किया कि नहीं, और पहले, जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी. इस कारण भारत 15 अगस्त 1947 को ही आजाद हुआ. किसी दैवीय मुहुर्त के कारण नहीं. 

इस बात की अधिकतम संभावना थी कि एटली के निर्णय के बावजूद सामान्य परिस्थितियों में भारत की आजादी की पूरी प्रक्रिया 6-7 साल लेती. और यह याद रखा जाना चाहिए कि 1951 के चुनाव में चर्चिल फिर जीत कर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन चुके थे अगले पांच सालों के लिए. वे भारत की आजादी को असंभव करने के लिए अकेले काफी थे.

तो बात यह है कि 1916 में एक युवक जिसके पास, अपने पिता से ज्यादा समृद्ध और सुरक्षित जीवन जीने की सारी संभावना और सारे संसाधन थे, वह क्यों भारत की आजादी की लड़ाई में कूद पड़ा. वह क्यों गांव-गांव देशवासियों को भारतमाता के मानी समझाता भटकता रहा. जवानी के पूरे नौ साल जेलों में होम कर दिया. कभी भी ब्रिटिश सत्ता की नीति बदल सकती थी और कोई भी लाठी और जेल उसका जीवन खत्म कर सकती थी या पंगु बना सकती थी.

क्या उस अनिश्चित और असंभव आजादी के बाद प्रधानमंत्री बनने की योजना के लिए जिसके लिए संघर्ष तो संभव था, पर उसे अपने जीवनकाल में ही देख पाने की 1945 के पहले तक कोई संभावना ही न थी?

नेहरू उस लक्ष्य के लिए समर्पित हुए थे जो उनके उसूलों और व्यक्त्वि की महत्तर प्रेरणाओं से निकला था. हम आज अपने स्वतंत्रता-सेनानियों के जीवन और संघर्ष को लांछित करने वाले लोग बन रहे हैं. नेहरू के खिलाफ समूचे युवा वर्ग में भयानक किस्म का तिरस्कार और घृणा भर दी गई है. 

इसका जायजा मुझे पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में युवाओं की बातचीत के दौरान मिला. यह एक नई परिघटना है. यह नेहरू के साथ कुछ भी गलत नहीं करेगी, यह हमारी सोच, समझ और लक्ष्यों को गलत दिशाओं में मोड़ेगी. नेहरू ने तो पराक्रमी और महान जीवन जिया. आज का भारत उनके आधुनिक मन का ही विस्तार अपने सार्वजनिक जीवन की समस्त सकारात्मकताओं में समेटे हुए है. शायद हम अपने देश के इस आधुनिक, तार्किक और जीवंत सोच को बोझ समझ कर उतार देने की यात्रा की ओर बढ़ना चाह रहे हैं. 

हमें एक गरीब, संसाधनहीन और सैकड़ों टुकड़ों में बंट जाने की आशंकाओं वाला भारत 1947 में आजाद होकर मिला था. हम इस बात के महत्व को नहीं समझते. यह भी नहीं जानते कि यह सब सुनिश्चित और स्वाभाविक नहीं था. इसे सुनिश्चित और स्वाभाविक किया गया, जैसा यह आज हमें लगता है. 

भारत के इस निर्माण में 1916 में लंदन से लौटे उस युवक का लगभग 50 साल का वैचारिक संघर्ष और सांसें लगी हैं. यह आधुनिक भारत के इतिहास की सबसे बड़ी घटना है, कानाफूसियों में घूमती, नए संचार माध्यमों के पंखों पर उड़ती अपमान और झूठ की प्रमाणहीन बदनियत दुष्प्रचार भरी कथाएं नहीं.

नेहरू के होने का मतलब सिर्फ उनका होना नहीं था. एक राष्ट्राध्यक्ष का मापन और मूल्यांकन इस बात से नहीं होता कि वह स्वयं क्या है और क्या कर रहा है, क्या बोल रहा है. बल्कि एक राष्ट्राध्यक्ष के मूल्यांकन का सही, वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ तरीका यह है कि उसके होने से समाज में कौन से व्यक्ति, संस्थाएं, लोग, विचार, कार्य, शक्तियां सक्रिय होते हैं, अपने आपको समर्थ और ताकतवर महसूस करते हैं. 

नेहरू के होने का अर्थ यह था कि भारत में आधुनिक, वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ, नवोन्मेषी विचार, व्यक्ति और संस्थाएं सक्रिय और सशक्त हुए. नेहरू के होने का मतलब यह था कि ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य, संस्कृति, तकनीक, अनुसंधान.... यानी राष्ट्रीय जीवन के समस्त क्षेत्रों में अपने समय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली लोग अग्रिम मोर्चे पर थे. यह भारत उन्हीं की निर्मिति है. 

एक प्रधानमंत्री कभी इतना शक्तिशाली नहीं होता कि वह सबकुछ कर सके, और न ही कभी उसमें सबकुछ करने की कोई ईश्वरीय शक्ति होती है. पर वह उन लोगों की सृजनात्मकता के प्रवाह को मार्ग देता है, जो राष्ट्र का नवनिर्माण करते हैं. नेहरू संपूर्ण भारतीय इतिहास में इस मामले में सबसे सफल राष्ट्र प्रमुख रहे. आज का भारत नेहरू के इसी उदार, सुसंस्कृत आधुनिक मन का परिणाम है.

वह भारत जिसे आजादी के बाद स्वाभाविक रूप से बीस पाकिस्तानों और चालीस बंगलादेशों में बंट जाना था, ब्रिटिश साम्राज्यवाद जिसकी पूरी उम्मीद रखे हुए था और चर्चिल ने जिसकी भविष्यवाणी की थी, वह नेहरू के इसी बोध की निर्मिति है. उसका एक मजबूत देश में रूपांतरण नेहरू के विजन और उनके अनथक कार्यों का परिणाम है, यह बात अलग है कि देश उन्हें भूल जाए और अपमानित भी करने लगे. परंतु इससे अधिक से अधिक उनकी छवि धूमिल होगी, पर भविष्य देश का धूमिल होगा- देश जो कोई अमूर्त संरचना नहीं, हम स्वयं हैं.

(आलोक श्रीवास्तव सुपरिचित कवि और लेखक हैं)

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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