सुनिए जी... किताबें कुछ कहना चाहती हैं

आज दुःख इस बात का है कि समाज संशय और भागमभाग के जिस संक्रमण काल से गुजर रहा है, वहां जिंदगी के लिए व्यवस्था बनाने में व्यस्त मनुष्य के पास इतनी फुर्सत नहीं है कि वह पुस्तकों का अध्ययन कर ज्ञान अर्जित कर सके.

सुनिए जी... किताबें कुछ कहना चाहती हैं

किताबें करती हैं बातें
बीते ज़मानों की
दुनिया की इंसानों की
आज की कल की
एक एक पल की
ख़ुशियों की ग़मों की
फूलों की बमों की
जीत की हार की
प्यार की मार की
क्या तुम नहीं सुनोगे
इन किताबों की बातें
किताबें कुछ कहना चाहती हैं।
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं॥
किताबों में चिड़िया चहचहाती हैं
किताबों में खेतियां लहलहाती हैं
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं
परियों के किस्से सुनाते हैं
किताबों में राकेट का राज़ है
किताबों में साइंस की आवाज़ है
किताबों में कितना बड़ा संसार है
किताबों में ज्ञान की भरमार है
क्या तुम इस संसार में
नहीं जाना चाहोगे
किताबें कुछ कहना चाहती हैं।
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं॥

सफदर हाशमी जी की कविता को पढ़ते हुए अनायास किताबें याद आ गईं. वे किताबें जिन्होंने जीवन संवार दिया था. शुरुआत अपने ही अनुभव से करता हूं. कुछ ही दिन पूर्व अपने पिता के संग्रह की कुछ किताबें टटोल रहा था कि मेरी नज़र विवेकानंद की जीवनी की पुस्तक पर पड़ी, जिसे मैंने बहुत पहले पढ़ा था. पन्ने उलटाए तो एक पृष्ठ पर पिता के लिखे शब्दों ने स्मृतियों को ताजा कर दिया. पिता ने मुझे बारह वर्ष की उम्र में कक्षा में प्रथम आने पर यह किताब दी थी. इसके बाद तो पिता ने विभिन्न मौकों पर कई किताबें भेंट दी थीं. सच कहूं तो आज जो श्रेष्ठ पुस्तकें पढ़ने की ललक है, उसके पीछे वही बचपन की विरासत है. मुझे तो यहां तक लगता है कि जो कुछ हमारे अंदर अच्छा है, संस्कार है उनमें पुस्तकों की भी भूमिका महत्वपूर्ण रही है. ये पुस्तकें ही थीं, जिन्होंने मुझ जैसे युवा को कभी संघर्ष में भी बढ़ते रहने की सीख दी तो कभी जीवन को गहराई से समझने के सूत्र हाथ में एक दीपक की भांति सौंप दिए.

किताबों का महत्व
पं. नेहरू ने कहा था, "पुस्तकों के बगैर मैं दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकता हूं." पुस्तक संस्कार मनुष्य में कभी समाप्त नहीं हो सकते, जब तक उसमें जानने की जिज्ञासा है तब तक वह पुस्तकों से दूर नहीं जा सकता है. पुस्तकें तो तब उसके साथ होती हैं जब उसके साथ कोई नहीं होता. ज्यादा दूर का नहीं पास का ही उदाहरण लेते हैं, अंग्रेजी शासन से देश की स्वतंत्रता की प्रेरणा के लिए रची गई पुस्तकें आज भी हमें याद दिलाती हैं कि किस प्रकार मैथिलिशरण गुप्त का 'भारत-भारती' युवाओं को मातृभूमि के प्रति सर्वस्व समर्पण की भावना जागृत करने में सक्षम हुआ. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने तो समाज में व्याप्त विषमता एवं विदू्रपता का मुकाबला लिखे हुए शब्दों को ही हथियार बना कर किया था. प्राचीन संदर्भ में लें तो गीता में भी कहा गया है, 'न हि ज्ञानेन सदृषं पवित्रमही विद्यते', ज्ञान के समान पवित्र और कुछ नहीं है. सूर, तुलसी, मीरा, कबीर, जायसी, प्रसाद, निराला, दिनकर, महादेवी, प्रेमचंद आदि सर्जकों का अर्थवान साहित्य आज भी हमें आकर्षित करता है क्योंकि वह हमारी जड़ता को तोड़कर स्पंदन पैदा करने में समर्थ है. सफदर हाशमी की कविता 'किताबें कुछ कहना चाहती हैं' में उन्होंने किताब की महत्ता को बखूबी चित्रित कर सिद्ध किया है कि पुस्तकों का अध्ययन ही मनुष्य को, समाज को, देश को स्थायी प्रतिष्ठा प्रदान करता है.

किताबों के कद्रदान कम हुए हैं
आज दुःख इस बात का है कि समाज संशय और भागमभाग के जिस संक्रमण काल से गुजर रहा है, वहां जिंदगी के लिए व्यवस्था बनाने में व्यस्त मनुष्य के पास इतनी फुर्सत नहीं है कि वह पुस्तकों का अध्ययन कर ज्ञान अर्जित कर सके. नई-नई पत्र-पत्रिकाएं उसे इतना सतही ज्ञान उपलब्ध करा देती हैं कि वह ड्राइंग रूम में अपने परिचितों के बीच बहस में सशक्त भागीदारी बखूबी निभा लेता है, जाहिर है ऐसे माहौल में पुस्तकों की पूछ-परख तेजी से घटी है.

जीवन मूल्यों को पोषित करने वाली कलम की धार का भोथरापन भी एक सुधि-पाठक की पीड़ा है. प्रेरणास्पद महान चरित्रों की समसामयिक व्याख्या कर साहित्य अब भी लिखा जा सकता है. श्रीराम के चरित्र पर लिखी नरेन्द्र कोहली की 'दीक्षा' और अन्य पौराणिक पात्रों पर लिखा उनका साहित्य पठनीयता की सार्थकता सिद्ध करता है. आज की युवा पीढ़ी की साहित्यिक पठनीयता तो लगभग समाप्त होती जा रही है, परन्तु एक बच्चा तो हमारा भविष्य है- उसे भी यदि सरल, सुग्राह्य और अपने आप अर्थ प्रकट करने वाले शब्दों को लेकर संस्कारक्षम साहित्य पढ़ने को नहीं मिला, तो मात्र 'कामिक्स' में ही उलझ कर उसकी बुद्धि एवं भाव की विकास यात्रा का मार्ग अवरूद्ध हो जाएगा. लोक कथाओं एवं लोकगीतों को बालक तक पहुंचाना हम न जाने कब से भूल गए हैं.

किताबें पढ़ने का संस्कार
इंसान के संपूर्ण व्यक्त्वि को संवारने में किताबों का योगदान बहुत बड़ा है. किताबें सभ्यता की आंख हैं. किताबों में दिलचस्पी इंसान को बेहतरीन दृष्टि देती है. बाजार से खरीदे गए महंगे ग्रीटिंग कार्ड के बजाय किसी भी शुभ अवसर पर महापुरुषों की जीवनियां भेंट करना ज्यादा अच्छा होगा. बच्चों को भी भेंट में किताबें देना और शब्दों एवं चित्रों के रंग-बिरंगे बागीचे में उन्हें सैर करने का अवसर देना, किस्सों और कहानियों में उन्हें रमने देना और दुनियाभर के किरदारों से मुलाकात करवाकर उनके अनुभव संसार को बड़ा करना. बच्चा सिर्फ स्कूली किताबों से ही नहीं सीखता. कोर्स के अतिरिक्त किताब पढ़ने से वह जिंदगी को सीखता है. किताबों की सुंदर दुनिया से बच्चा एक बार परिचित हो जाए तो जीवन भर यह चस्का नहीं छूट सकता. चाहे कितने ही अन्य माध्यम आ जाएं. पुस्तक-प्रेमी समय निकालकर पुस्तकों से मुलाकात कर ही लेता है. बचपन ही वह समय है जब पुस्तक पढ़ने का संस्कार डाला जाना चाहिए.

स्थितियां विपरीत हैं
स्वस्थ, मर्मस्पर्शी एवं स्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन जहां एक समस्या है वहीं प्रकाशित पुस्तकों को पाठक तक पहुंचने की समस्या भी विकट है. हमारी शिक्षा संस्थाओं में पढ़ने की रुचि और संस्कार पैदा करने की कोई कोशिश नहीं की गई. किताबों के महंगा होने का तर्क देते वक्त यह भी देखा जाना चाहिए कि किताबों से ठसा-ठस भरी हमारी कॉलेजों या शहर-कस्बों के सरकारी-गैर सरकारी पुस्तकालयों का हमारे शिक्षक या अन्य लोग ही इस्तेमाल नहीं करते?

अक्सर हम कुछ नहीं तो हर बात के लिए पश्चिम को कोस रहे होते हैं, परन्तु पश्चिम में किताबें अभी भी अपनी जगह बनाए हुए हैं. वहां किताबों के साथ-साथ सब कुछ सुरक्षित रहा. सिनेमा के आ जाने से नाटक कला नहीं खत्म हो गई. टी.वी. ने सिनेमा को नहीं हड़प लिया, और न ही इलेक्ट्रानिक मीडिया ने किताबों सहित सारे प्रिंट मीडिया को निकाल बाहर किया. दरअसल, वहां हर चीज एक विकास क्रम में आई और संस्कार बनकर एक खास जरूरत की हैसियत से जीवन में शामिल हो गई. हर नई चीज का पुरानी चीजों के साथ समायोजन हो गया. जबकि हमारे यहां हर नई चीज भड़भड़ाते हुए पुरानी चीजों को रौंदती-कुचलती आई. नतीजतन हड़कंप मचता रहा.

सबसे दुखद पहलू
कितना दुखद है कि किसी भी रेलवे स्टेशन या बस स्टैण्ड के बुक स्टॉल पर पत्र-पत्रिकाओं सहित सजाई गई लगभग सभी पुस्तकें अश्लील साहित्य से अटी पड़ी हैं. परिजनों के साथ इन दुकानों पर आप खड़े नहीं हो सकते. सेक्स और यौनोत्तेजनक पुस्तकों का यह खुला बाजार परोक्ष रूप से देश की युवा पीढ़ी को नकारात्मक गतिविधियों में लिप्त कर अपराध की ओर धकेल देने का कुत्सित प्रयास ही तो है. इस पेशे में केवल पैसा बनाने की मनोवृत्ति ने लोगों में अच्छी पुस्तकों के प्रति अनिच्छा और घटिया साहित्य के प्रति आकर्षण पैदा कर हमारी अभिरुचियों को तहस-नहस कर डाला है. यह पुस्तक प्रेमियों का दुर्भाग्य ही है कि देश में लगभग 20 हजार से अधिक प्रकाशक होने के उपरांत भी वे अच्छे साहित्य से वंचित हैं या फिर महंगी किताबों के दर्द से छटपटाने को मजबूर.

(लेखक सामाजिक मुद्दों के टिप्पणीकार हैं)

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