कर्नाटक चुनाव 2018: लिंगायत का वचन ही है कानून

लिंगायत मत ने बारहवीं शताब्दी में ही जाति-भेद, चार आश्रमों और चार वर्णों की व्यवस्था, बहुदेववाद, पुरोहितवाद, पशु-बलि, आत्म-बलि, सती-प्रथा, कर्मों के बंधन, ईश्वर और आत्मा के द्वैत, मंदिर-पूजा, छूत-अछूत, स्वर्ग और नर्क की धारणाओं का खंडन किया.

कर्नाटक चुनाव 2018: लिंगायत का वचन ही है कानून

'बाहुबली' फिल्म में राजमाता शिवागामी कुछ खास मौकों पर एक संवाद दोहराती हैं, मेरा वचन है मेरा शासन. इस संवाद में शासन शब्द तेलुगु शब्द शासनम का अनुवाद है. तेलुगु में ये संवाद था, 'इदे ना माट, ना माटे शासनम' यानि ये मेरा वचन है, मेरा वचन ही कानून है. तेलुगु में शासन शब्द का अर्थ दरअसल कानून के लिए किया जाता है. एक संप्रदाय और है जो अपने गुरू के वचनों को कानून की तरह मानता है, वो है लिंगायत समुदाय. 12 शताब्दी में एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए बासवन्ना ने लिंगायत समाज की स्थापना की थी. उनका परिवार शिव को मानता था, लेकिन बासवन्ना के शिव निर्गुण और निराकार थे. उन्होंने जिन पद्यों में अपनी बात कहीं थी उन्हें वचन कहा जाता है.

उन्होंने अपनी ब्राह्मण पहचान को त्याग कर एक ऐसे समाज के लिए आंदोलन खड़ा किया, जहां कोई ऊंच-नीच नहीं होती है. वह जाति व्यवस्था को नहीं मानते थे. महिलाओं को बराबर का दर्जा देने के हक में थे. उनकी वेदों में कोई आस्था नहीं थी और वो कर्म को ही पूजा मानते थे. उस दौर में दलितों और पिछड़ों के साथ जानवरों से बदतर व्यवहार किया जाता था और उनके पास कोई अधिकार नहीं थे. वेद अंतिम सत्य था और जन्म के आधार पर कर्म की व्याख्या की जाती थी.

लिंगायत मत ने बारहवीं शताब्दी में ही जाति-भेद, चार आश्रमों और चार वर्णों की व्यवस्था, बहुदेववाद, पुरोहितवाद, पशु-बलि, आत्म-बलि, सती-प्रथा, कर्मों के बंधन, ईश्वर और आत्मा के द्वैत, मंदिर-पूजा, छूत-अछूत, स्वर्ग और नर्क की धारणाओं का खंडन किया. इस आंदोलन की ताकत और प्रेरणा आज भी 'वचन साहित्य' या 'शरण साहित्य' में सुरक्षित है, लेकिन जिस तरह से बौद्ध धर्म की गति हुई उसी तरह से लिंगायत का हश्र भी देखने को मिलता है. बुद्ध मूर्ति पूजा के विरोध में थे और आज विश्व में सबसे ज्यादा मुर्तियां और मंदिर बुद्ध के हैं. वहीं हिंसा की प्रेरणा देने वाले बुद्ध धर्म की हिंसा का आलम म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय पर देखने को मिला था. उसी तरह से लिंगायत समाज की स्थापना करने वाले बासवन्ना जिस आदर्श को स्थापित करने के लिए लड़े थे और इतना बड़ा आंदोलन खड़ा किया था. आज लिंगायत समाज उसी जाति के चक्कर में पड़ता नज़र आता है.

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यही नहीं, दुर्भाग्य से समय के साथ, जैसा कि अधिकतर धार्मिक क्रांतिकारी आंदोलनों के साथ हुआ, ऐसा ही लिंगायत आंदोलन के साथ भी देखने को मिला, वीरशैव मत ने अपने अंदर ऐसी अनेक ऐसी बातों को शामिल किया जिसका बसवेश्वर ने निषेध किया था. मंदिर-पूजा बहाल हुई जिसके बारे में बसवेश्वर ने कहा था: 'धनवान शिवमन्दिर बनवाते हैं, मैं गरीब क्या कर सकता हूं. मेरे पैर ही मिनार, शरीर ही मंदिर, सिर ही सोने का मुकुट है, कूडल संगमदेव ! जड़ नाशमय है चेतन अविनाश है.' ( 'बसवेश्वर'- ले. काशीनाथ अम्बलगे, पृष्ठ 16) कर्मकांड वापस आ गए हैं आ गए हैं, गुरु को शिष्य से तोहफा लेने की परंपरा शुरू हो गई है. सामाजिक स्तर पर भेद पैदा हो गए हैं. जिस लिंगायत आन्दोलन के तहत बसवन्ना ने ब्राह्मण युवती और मोची युवक की शादी कराई क्योंकि दोनों ही लिंगायत थे, वह आंदोलन न रह कर बाद में खुद ही एक जाति में तब्दील हो गया. लिंगायत आन्दोलन और विचार का धर्म के रूप में संस्थाबद्ध होना तो वैसे मध्यकाल से ही चली आ रही एक परिघटना है, लेकिन वर्तमान में भारतीय लोकतंत्र ने जिस तरह राजनीति और चुनावों में जातियों को अहमियत देना और इंसानों को जातियों में और संख्या में देखना शुरू करके जातियों को वोट में तब्दील किया उसके चलते ही लिंगायत जैसी विचारों पर आधारित सामाजिक समूहों के नेताओं ने भी अपने समुदाय को वोटों के आधार पर आंकना शुरू कर दिया. लिंगायत आंदोलन का जातिकरण इसी रास्ते हुआ जो आधुनिक परिघटना ही है.

प्रो.कलबुर्गी के नाटक ‘केट्टिटू कल्याण’ यानि कल्याण का पतन, जिसका बसवराज नायकर ने ‘दि फॉल ऑफ कल्याण’ नाम से अंग्रेजी अनुवाद किया था, उसमें एक जगह अपने समय के समाज के बारे में बसवेश्वर अपनी बहन नागलम्बिका से कहते हैं. ‘बहन ऐसा लगता है कि बुरे लोगों के समाज में जो निकृष्टतम होते हैं, वे ही नेता होते हैं’. इन्हें लगता है कि धर्म के नाम पर कुछ भी कर सकते हैं, यदि उनके पास थोड़ा पैसा हो और कुछ दुष्ट अनुयायी हों. लेकिन वे दिन दूर नहीं जब ये पैसा, ये पुजारी और उनके अनुयायी इस मठ की मौत का कारण बनेंगे’.

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गौरतलब है कि कर्नाटक में आज लिंगायत समुदाय से जुड़े करीब 400 छोटे-बड़े मठ मौजूद हैं. इन मठों का कर्नाटक की राजनीति में खासा प्रभाव है. कोई भी पार्टी इन मठों के आशीर्वाद के बगैर मतों को अपने पक्ष में रखने का सोच भी नहीं सकते हैं. इस तरह धर्म के खिलाफ लड़ाई लड़ कर बना समाज आज खुद को एक अलग धर्म बनाने की मांग कर रहा है. उनके मठाधीश खुद को सिक्ख, जैन धर्म के समान अल्पसंख्यक माने जाने की मांग करते दिख रहे हैं.

वचन को ही सब कुछ मानने वाले बसवा कहते थे, ‘किसी को मारो मत और झूठ मत बोलो’. वचन बहुत सामयिक है जिसमें हर समय के हिसाब से सवालों के जवाब हैं. हर दौर के मुद्दों पर बात है. वचन आज के दौर के फासीवाद को नंगा भी करता है, उसकी आलोचना भी करता है. यही वचन बताते हैं कि किस तरह से बसवा के अनुयायिओं को होना चाहिए था लेकिन क्या हुआ. वचन कानून तो आज भी हैं. लेकिन जॉर्ज ऑरवेल के एनिमल फॉर्म की तरह वचन सहूलियतों के हिसाब से बदलते जा रहे हैं .

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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