घने जंगलों के बीच भारत की तीसरी सबसे प्रदूषित दुनिया

इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि क्या अब सिंगरौली पर और नए उद्योग लगाए जाने चाहिए, क्या यहां का पर्यावरण उसे बर्दाश्त कर सकता है.

घने जंगलों के बीच भारत की तीसरी सबसे प्रदूषित दुनिया

उत्तर प्रदेश का सोनभद्र जिला जिससे भारत के चार राज्यों की सीमा जुड़ती है. सिंगरौली का यह क्षेत्र जहां थर्मल पॉवर प्लांट है, हिंडाल्को जैसे उद्योग हैं और कई तरह की लगातार चलती  फैक्ट्रियां  हैं जो भारत के विकास की इबारत लिखती नज़र आती है. यहां चारों तरफ फैले घने जंगलों को देखकर पहली बार आने वाले का मन बाग बाग हो जाएगा. इन्हीं जगलों के बीच लगभघ 400 से ज्यादा छोटे -बड़े गांव है. इन्ही गांवो में से एक गांव है कुसमाहा. विकासखंड म्योरपुर, सोनभद्र जिला के अंतर्गत आने वाले गांव कुसमाह में अपने कच्चे-पक्के घर में खाट पर रामभजन बैठे हैं और उनके सामने उनकी 15 साल की बेटी अभी खाने की थाली रख कर गई है. थाली में हरी साग वाली दाल के साथ चार रोटियां रखी और दो हरी मिर्च भी है. रामभजन थाली रख कर जाती हुई अपनी बेटी को देख रहे है जो बहुत ही धीरे-धीरे उनकी आंखो से ओझल हो रही है. वो उसे देखते हैं फिर रोटी के एक निवाले को तोड़ कर उसे दाल में फिराने लगते हैं. उनकी गर्दन झुकी हुई है और वो दाल में डूबी हुई अपनी उंगलियों को घुमाते हुए किसी सोच में डूबे हुए हैं. दरअसल वो उस भविष्य को पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं जिसके हर्फ काले पन्ने पर काली स्याही से लिखे हुए हैं.

रामभजन के तीन बच्चे हैं, दो बेटे और एक बेटी. तीनों बडे तो हुए हैं लेकिन उनका कोई भविष्य नहीं है. पानी में मौजूद फ्लोराईड ने सभी के भविष्य को उनकी हड्डियों की तरह कमज़ोर कर दिया है . उनकी हंसी,  वक्त से पहले काले  पड़ चुके और गिरने को आतुर दांतो ने छीन ली है. इन बच्चों के पैर धनुष की तरह मुड़ चुके हैं . वो चलते तो हैं लेकिन कहीं जा नहीं पाते हैं. यहां पानी में मौजूद फ्लोराइड ने रामभजन के बच्चों को वक्त से पहले बूढ़ा बना दिया है. रामभजन की बेटी पंद्रह साल की है लेकिन वो दो लीटर पानी का डब्बा भी नहीं उठा पाती. घऱ से थोड़ी दूर पर सड़क तक ही उसकी दुनिया सिमट कर रह गई है. आठवीं के बाद स्कूल जाना छूट गया क्योंकि गांव का स्कूल आठवीं तक ही था, आगे पढाई के लिए दूर जाना होगा जो उसके बस की बात नहीं है. घर में कोई इतना सक्षम नहीं कि उसे ले जा सके.

अंदर कमरे में रामभजन का बड़ा बेटा सो रहा है, वो दसवीं में पढता है, वो धीरे धीरे स्कूल चला जाता है. सबसे बड़ा बेटा बेरोज़गार है. रामभजन यहीं पर बने बनवासी सेवा आश्रम में काम करते हैं जिससे होने वाली आय से ही पूरा परिवार पल रहा है. रामभजन बताते हैं वो अपने बच्चों को आस पास के सभी बड़े शहरों में दिखा चुके हैं लेकिन डॉक्टर का एक ही जवाब होता है - इसका कोई इलाज नहीं है. ऐसी बीमारी जो शरीर बढ़ने नहीं दे रही है, बस लाचार करके छोड़ दिया है. अपनी आवाज को संभालते हुए रामभजन कहते हैं - 'अब हमें किसी से कोई उम्मीद नहीं रही.  हम तो बस हिम्मत बांध कर बैठ गए हैं कि हमें झेलना है तो झेलेंगे. क्या कर सकते हैं जिन्हें कल हमारा सहारा बनना था वो खुद ही लाचार है तो करना ही पड़ेगा.' 

ऐसा कहते हुए वो फिर से रोटियों के निवाले को दाल में घुमाते हुए चुप होकर कहीं खो जाते हैं. सोनभद्र के इस इलाके में पानी में केवल फ्लोराइड ही नहीं, दूसरे हेवी मेटल्स भी इतनी भारी मात्रा में मौजूद है कि वो लोगों की जिंदगी में मौत को धीरे-धीरे घोल रहे है. 

स्वास्थ्य सर्वे

  1. सोनभद्र में करवाए गए एक स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक यहां  की हवा और पानी में लगभग सभी धातू पाए गए हैं. सोनभद्र के 52 गांव में हर चौथे परिवार का स्वास्थ्य सर्वेक्षण होने पर पता चला कि यहां सभी लोग समस्याओं से पीड़ित हैं. 
  2. 100 में से 60 औरतों के फेफड़ों की क्षमता 40 फीसद घटी है, वहीं पुरुषों मे ये आंकड़ा 100 में 55 पुरूष है जिनकी क्षमता भी 40 फीसद घटी है.
  3. हाथों का कांपना जो पारा के संपर्क का एक लक्षण होता है. 100 में से 18 महिलाओं और 100 में से 14 पुरुषों में ये कंपन पाया गया. 
  4. दांतो में पीला और कालापन और गांठों में दर्द -- 100 में से 40 महिलाएं और 100 में से 40 पुरुषों में ये लक्षण पाए गए . कुछ गांवो में तो हालात बहुत बुरे है और लगभग हर घर के सदस्यों में किसी न किसी तरह से फ्लोराइड के लक्षण देखने को मिलते हैं. 

सेहत पर असर
विकास ने हमें इस मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां हम कुछ लोगों के बेहतर भविष्य के लिए इंसानियत को गर्त में पहुंचाने पर तुले हुए हैं. सोनभद्र के इलाकों में पाए जाने वाले इन हवीमेटल्स से पड़ने वाले असर पर नज़र डालें तो रूह कांप जाती है.  
फ्लोराइड--  यह हमारी हड्डियों और दांतो को कमजोर करता है और इससे फ्लोरोसिस होता है. गर्भस्थ शिशु की माँ अगर फ्लोराइड युक्त जल का सेवन करती है तो गर्भ में बढ़ रहे शिशु के लिये बहुत ही हानिकारक है. आमतौर पर बच्चे 2-3 वर्ष की उम्र पार करते-करते अपंग और रोगग्रस्त हो जाते हैं. 
शुरू में पैर की हड्डी चौकोर एवं चपटी हो जाती है और बाद में बच्चा लाचार होकर ही रह जाता है. जवान पुरूष और महिलाएं भी 35 से 40 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बुढ़ापे का अनुभव करने लगते हैं. उनकी कमर झुकने लगती है और शारीरिक शक्ति में ह्रास होने लगता है.
हाथ-पैर विकृत हो जाते हैं, दाँत पीले पड़ने लगते हैं और मसूड़े गलने लगते हैं. दूसरे किसी गांव से ब्याह कर लाई गई बहुएँ भी इस रोग के कुप्रभाव से अछूती नहीं रह पाती हैं. अपंगता का कुप्रभाव महिलाओं पर माँ बनने के बाद ज्यादा दिखने लगता है.
फ्लोरोसिस से प्रभावित व्यक्ति सामाजिक कार्य-कलापों में बढ़-चढ़कर हिस्सा नहीं ले पाता है क्योंकि उसमें कुंठा जागृत हो जाती है और वह हीन भावना से ग्रसित हो जाता है.
पारा - यह हमारे नर्वस सिस्टम, पाचन और रोग निवारण प्रणालियों को नुकसान पहुंचाता है. इसके लगातार शरीर में जाने से गुर्दे और फेफड़े खराब हो जाते हैं. ये जानलेवा भी हो सकता है. इसके अलावा ये महिलाओं और पुरुषों की प्रजनन प्रणाली पर भी असर डालता है .
आर्सेनिक - लंबे समय तक आर्सेनिक के संपर्क में रहने पर वो हमारी चमड़ी पर असर करता है और इससे चमड़ी, फेफड़े, गुर्दे, और मूत्राशय का कैंसर भी हो सकता है. लंबे समय तक आर्सेनिक की बहुत कम मात्रा से संपर्क चमड़ी और नर्वस सिस्टम पर असर करता है .
सीसा- यह बच्चों और बड़ों के नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है. 
क्रोमियम- यह हमारे जिगर, पाचक तंत्र, और चमड़ी पर असर करता है . लंबे समय तक इसके संपर्क से कैंसर भी हो सकता है. 
फ्लोराइड और दूसरे जहरीले मेटल्स ने जिस तरह यहां के इलाके में घर बनाया है, उसने इस स्वर्ग जैसी जगह को नर्क बना कर रख दिया है. एक विकलांग व्यक्ति का जीवन कितना दुखदायी होता है यह कमोबेश सभी को पता है. शारीरिक विकलांगता वह अभिशाप है जिससे केवल वह व्यक्ति ही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार भी प्रभावित होता है. ऐसे में जब गांव में बसने वाले किसी परिवार के सारे लोग सामूहिक विकलांगता के शिकार हो जाएँ तो उस गांव की क्या दुर्दशा होगी यह कल्पना से भी परे है. 


रामभजन के घर से निकलकर कुछ दूर चलने पर झुकी हुई कमर के साथ रमपतिया नज़र आती है .
साठ साल की रमपतिया ने झुककर चलने को अपनी नियति मान लिया है. वो सीधी खड़ी नहीं हो सकती. उन्हें गांठों में हमेशा दर्द बना रहता है. कभी किसी अस्पताल से दवा मिल गई तो वो खा ली, वरन वो दर्द के आगे झुक गई हैं. 
रमपतिया से अगर उनकी बीमारी के बारे में बात करो तो वो गुस्से में आ जाती है और उनकी सांस फूलने लग जाती है. अपनी सांसों को संभालते हुए वो यही बोलती है - "यहां कई लोग आते हैं, उन्हें देखते हैं और चले जाते हैं. सभी से कहते हैं कि यहां का पानी खराब है लेकिन कोई नहीं सुनता . हमारी तो जो थी कट गई लेकिन ये जो हमारे बच्चे हैं इनको तो कम से कम बचा सकते हैं, नहीं तो अगर यही हाल रहा तो ये बच्चे जवान होने से पहले ही बूढे हो जाएंगे." आरओ लगाने की बात पर वो बताती है कि उनकी हरिजन बस्ती में आरओ नहीं लगाया गया है. जो लगा है वो उनके घर से बहुत दूर है और जो दो कदम चलने से लाचार हैं , वो इतनी दूर से पानी कैसे ला सकती है. इसलिए ये जानते हुए भी कि घर के पास के हैंडपंप का पानी जहर है, वो पीती है और उनके बच्चे पीने को मजबूर हैं.  


रमपतिया के घर के पास सावित्री देवी रहती है. सावित्री देवी एक कमरे में खाट पर चादर ओढ़ कर लेटी हुई है. चारों तरफ भिनभिनाती हुई मक्खियों की आवाज़ कमरे में फैले सन्नाटे में शोर की तरह सुनाई दे रही है.  लेकिन सावित्री देवी के लिए शायद यही शोर है जो संगीत भी है और जीने का सहारा भी. सावित्री देवी की दुनिया पिछले 18 सालों से एक कमरे में बिछी हुई खाट तक सिमट कर रह गई है. सावित्री देवी अपनी बहु ममता और एक पोती के साथ गांव में रहती है. बेटा बाहर नौकरी करता है तो आता जाता रहता है. सावित्री देवी सिर्फ इतनी देर ही बैठ पाती है जितनी देर खाना खा लें. बाकि वक्त वो खाट पर लेटी रहती है.  सावित्री की बहु ममता बताती है कि जबसे वो इस घर में ब्याह कर आई हैं, तभी से वो अपनी सास सावित्री देवी को इसी हाल में बिस्तर पर पड़े हुए देख रही है. दो साल पहले उनके ससुर का देहांत हो गया, वो भी इसी तरह दर्द में रहे. सावित्री खुद उठकर नहाना धोना और अपनी प्राकृतिक ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकती, उन्हें किसी न किसी के सहारे की ज़रूरत होती है.

एक वक्त सिंगरौली का यह क्षेत्र अपनी जैवविविधता के लिए जाना जाता था. घने जंगल, बेहतरीन कृषि उत्पादन, खासकर लाख की फसल के लिये ये पूरे भारत में मशहूर था . इसके अलावा चिरौजी, महुआ, आवंला, कई तरह की औषधीय वनस्पति से ये पूरा क्षेत्र भरा पूरा था. यहां रहने वाले ज्यादातर लोग वनोपज पर ही निर्भर थे. आज यहां 10 थर्मल प्लांट काम कर रहे हैं जिनसे 20,500 मेगावॉट बिजली का उत्पादन होता है. इनमें से 6 प्लांट उत्तरप्रदेश वाले हिस्से में है जिससे 11540 मेगावॉट बिजली पैदा हो रही है, वहीं मध्यप्रदेश के हिस्से में 4 प्लांट लगे हुए हैं जो 9280 मेगावॉट बिजली पैदा कर रहे हैं. सिंगरौली पूरे भारत की 10-15 फीसद बिजली की ज़रूरत को पूरा कर रहा है लेकिन इसके एवज में इस जगह के बाशिंदों का भविष्य बीमारियों के अंधेरे में घिरता जा रहा है.

यहां के  एक गांव खैराही के रहने वाले रामसुभग बताते हैं - "पहले जब यहां पर फेक्ट्री चालू नहीं हुई थी तो इतना ढेर खीरा होता था कि मजा आ जाता था, फिर जब ये फैक्ट्री चालू हुई तो धीरे धीरे धुआं बढ़ना शुरू हुआ, और फिर वो पानी में भी आने लगा और फिर खीरे में फूल तो आते थे लेकिन थोडा सा बढ़कर वो सूख जाते थे. लाख की पैदावार भी अब पूरी तरह खत्म हो गई है ,इसका धुआं धीरे धीरे मारता चला गया.पहले इसका असर  लगभग 20 किलोमीटर के एरिया में ही था. फिर बढ़ते बढ़ते इसने 70-80 किलोमीटर तक फैलते हुए कनवरिया से ममुनी ब्लॉक तक,यहां तक की बीजापुर तक सब साफ कर दिया. पहले तो हमारे यहां पर खेतों में खाद डालने तक की ज़रूरत नहीं होती थी लेकिन फैक्ट्री लगने के बाद तो यहां बगैर यूरिया डाले कुछ उगता ही नहीं है ."

"हमको तो पहले पता ही नहीं था कि पानी में जहर है, फिर बनवासी सेवा आश्रम के लोगों ने जांच करके बताया कि पानी में जहरीला पदार्थ है. हमें तो लगता था कि कोई भूत वूत है, हम ओझा के पास जाते थे, अब ओझा के पास जाने  से क्या होता है, साथ में दवा भी खा लेते थे, दवा असर करती तो हमें लगता कि ओझा भी  काम कर रहा है."

यहां के लोगों ने पिछले 50 सालों से इस क्षेत्र के लिए काम कर रहे बनवासी सेवाश्रम के साथ मिलकर सिंगरौली प्रदूषण मुक्ति वाहिनी नाम की संस्था बनाई है. ये संस्था गांव-गांव लोगों को जागरुक करने में लगी हुई है. दरअसल बनवासी सेवाश्रम की शुरूआत उस समय हुई जब 1965 में देश में भीषण अकाल पड़ा था. उस दौरान यहां के लोगों की मदद के लिए सामाजिक कार्यकर्ता प्रेमभाई ने बनवासी सेवाश्रम का निर्माण किया था . इस संस्थान का काम यहां के लोगों को पढ़ाना लिखाना और रोज़गार उपलब्ध करवाना और यहां पैदा हुई फसल का दाम दिलाना था. बाद में इस संस्था से स्वर्गीय प्रोफेसर जी डी अग्रवाल यानि ज्ञानस्वरूप सानंद भी जुड गए.  
संस्था के साथ पिछले 35 सालों से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता विमल भाई का कहना है कि - 1995 में जब हमने पर्यावरण पर काम करना शुरू किया और प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल के साथ प्रेम भाई ने यहां पर लैब खोली और पानी की जांच हुई तब पहली बार पता चला कि यहां के पानी में फ्लोराईड का असर है. इसके बाद उन्होनें लोगों को जागरुक करने का प्रयास शुरू किया.

जागरुकता के तहत लोगों को बताया जाता  हैं कि कहां का पानी पीने लायक है, और जिस हैंडपंप का पानी पीने लायक नहीं होता है उसे चिन्हित कर दिया जाता  हैं, इसके अलावा गांव वालों के खान-पान में कुछ पदार्थ पहले शामिल थे लेकिन फिर हटने लगी. उन पीछे छूटे पदार्थों को उनके खान-पान में फिर से जोड़ने का प्रयास किया जाता हैं जैसे आंवला, तिल, महुआ. वैसे आवंला और महुआ यहां भारी मात्रा में होता है. 

वहीं हरिजन बस्ती के रमाशंकर ने बताया कि 'यहां एक जज ( यहां के लोग जी.डी.अग्रवाल को नाम से नहीं जानते,गांववाले उन्हें जज कहते हैं) आए थे, उन्होंनें रिहंद डैम का भी सर्वे किया, उन्होंने ही यहां आश्रम के प्रेम भाई के साथ मिलकर हमें बताया कि यहां के पानी में फ्लोराइड है, पारा है, वो जज तो यहां आते रहते थे और हमें बताते रहते थे, बाद मे सुना है कि पब्लिक के लिए कुछ करते हुए उन्होंने 100 दिन का उपवास रखा था फिर उनकी मौत हो गई, उन्हीं से हमें जानकारी मिली थी कि पानी में जहर है.' 

जब यहां कि जनता एनजीटी कोर्ट गई तो यहां तत्काल पीने के पानी के टैंकर की व्यवस्था की गई, बाद में यहां चार आरओ प्लांट लगे हैं


हैंडपंप पर फ्लोराइड फिल्टर भी लगाए गए लेकिन कोई फ्लोराइड फिल्टर काम नहीं करता और आरओ प्लांट इतने दूर हैं कि सभी गांव वालो को पानी मिलना मुश्किल है, झुकी कमर और जोड़ों में दर्द के साथ वो पानी नहीं ला सकते. टैंकर भी तभी आते है जब भीषण गर्मी पड़ने लगती है और हैंडपंप का पानी सूख जाता है, इससे यहां पर फसलों पर भी असर देखने को मिल रहा है, अरहर, सरसों जैसे फसलों के फूल आते है लेकिन वो सूख जाते हैं, गांव के किसान बताते हैं कि इससे फूलों वाली फसलों पर ज्यादा असर पड़ा है. यहां तक कि आम और अमरूद के फल आते हैं तो थोड़े बडे होते ही काले पड़ जाते हैं.
रेणुकूट शहर में रहने वाले इसी गांव के ए.के.गौतम अपने अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि "प्रेम भाई ने यहां पर आने के बाद कई छोटे बड़े तालाब बनवाए थे. वही गांव वालों के पानी का ज़रिया हुआ करता था, उससे हमारी खेती की ज़रूरत पूरी हो जाती थी और कुँए से पीने का पानी मिल जाता था. पहले यहां पर 60-70 फीट पर पानी मिल जाता था और पानी अच्छा भी होता था, बाद मे जब रिंहद डैम का पानी भी रिसकर ग्राउंड वॉटर में मिलने लगा, तो लोगों की धीरे धीरे शिकायत बढ़ने लगी, अब तो यहां सरफेस वॉटर में भी फ्लोराइड और पारा मौजूद है.' 
पानी के स्तर की लगातार जांच करने वाले और इस क्षेत्र के चप्पे चप्पे की जानकारी रखने वाले विमल भाई मानते हैं कि कुंए और तालाब की जगह हैंडपंप और बोरिंग के लेने से भी नुकसान हुआ है. लेकिन साथ ही वो हाल ही में आई एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताते हैं कि अब तो सतही जल पर भी फ्लोराइड का असर आ गया है. 
केद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ मिलकर इस क्षेत्र में बनवासी सेवाश्रम के अंदर ही एक लैब भी लगाई गई है जो लगातार इस क्षेत्र के पानी और हवा की जांच करती रहती है. इस लैब के ज़रिये ऑनलाइन ही प्रदूषण के स्तर का पता चलता रहता है. इसी के जरिये मालूम चलता है कि यह क्षेत्र जिसका भारत में प्रदूषित इलाकों में 9वां स्थान था, अब यह तीसरे नंबर पर आ गया है . दरअसल जानकारों का मानना है कि यहां मौजूद रिंहद डैम का पानी भी ग्राउंड वॉटर पर खासा असर डाल रहा है. इसका पानी ज़मीन के नीचे तो जा ही रहा है, साथ ही यहां जो हवा में प्रदूषक तत्व है, वो भी राख के ज़रिये ज़मीन पर ही आते हैं. यही नहीं फ्लोराइड के साथ मर्करी जैसे तमाम हैवी मेटल्स ज़मीन पर आ रहे हैं और इनका असर आहार श्रृंखला तक में भी देखने को मिल रहा है .
सिगरौली क्षेत्र के लगभग सभी गांव फ्लोराइड से प्रभावित है, कुल चार सौ गांव है जिसमें उत्तरप्रदेश के ज्यादा गांव है. 25-30 गांव के हाल बुरे हैं. वहीं डाला से जो रास्ता झारखंड की ओर गया है, वहां कुछ गांव है जैसे चिरगा, बैन, डंडी, जहां संकट गहराता जा रहा है.  यहां प्रदूषण के स्तर का आलम यह है कि यहां मौजूद घने जंगल भी उसे संभालने में हांफने लग गए हैं.  
25 अगस्त 2014 को सोनभद्र जिले के स्थानीय ग्रामीणों ने ऱाष्ट्रीय हरित ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में यहां के बढ़ते प्रदूषण को लेकर एक याचिका दायर की थी.  इसकी सुनवाई करते हुए एनजीटी ने निर्देश देते हुए क्षेत्र में बढ़ रहे प्रदूषण की भयावहता के विस्तृत अध्ययन के लिए एक कोर कमेटी का गठन करने को कहा. इस कोर कमेटी में देश के जाने-माने वैज्ञानिक डॉ तपन चक्रवर्ती चैयरमेन के रूप में चुने गए. इस कोर कमेटी ने सिंगरौली क्षेत्र के हवा, पानी, मानव, स्वास्थ्य, भूमि और दूसरे औद्योगिक संस्थानों से हो रहे अध्ययन के लिए अलग-अलग पांच उप कमेटी गठित की. अध्ययन के बाद कोर कमेटी ने माना कि सिंगरौली गंभीर प्रदूषण के प्रभावों से जूझ रहा है और प्रदूषण बढ़ाने वाली सभी प्रकार की औद्योगिक इकाइयों पर अंकुश लगाना जरूरी है. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि किसी भी प्रकार के प्रदूषण बढ़ाने वाले उद्योगों के विस्तार पर तुंरत रोक लगाना चाहिए -

कमेटी के आंकलन के मुताबिक 2015 में सिंगरौली क्षेत्र में विभिन्न औद्योगिक इकाइयों का उत्सर्जन
1- थर्मल पॉवर प्लांट-
कुल संख्या - 10 
- विद्युत उत्पादन- 20,500 मेगावॉट
- जलने वाला कोयला - 3,15.000 टन प्रतिदिन
-- राख उत्पादन -- 1,05.369 टन प्रतिदिन

सभी थर्मल पॉवर प्लांट द्वारा फैलाए जा रहे मुख्य प्रदूषक
पारा  (Hg) - 40 किलोग्राम प्रतिदिन
सीसा ()-- 1496 किलोग्राम प्रतिदिन
फ्लोराइड ()-- 9369 किलोग्राम प्रतिदिन
क्रोमियम () -- 8000 किलोग्राम प्रतिदिन
सल्फर डाइ ऑक्साइड ()-- 2190 टन प्रतिदिन
नाइट्रोजन ऑक्साइड -- 2465 टन प्रतिदिन
कुल धूल के कण () -- 164.38 टन प्रतिदिन
धूल के कम () --- 93.15 टन प्रतिदिन
2- कोयला खदान
कुल संख्या - 16
कोयला खनन -- 2.05 टन प्रतिदिन
ओवर बर्डन -- 209 मिलियन क्यूबिक मीटर प्रतिवर्ष

अपने विस्तृत अध्ययन के बाद दिसंबर 4 और 5, 2014 को कोर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए सिगरौली क्षेत्र में फैले हुए प्रदूषण की हालत को बेहद गंभीरता से लेते हुए पाया कि  
- रिहंद जलाशय के करीब 3000 एकड़ से ज्यादा के क्षेत्र को राख के निस्तारण के लिए रखा गया है . इस ऐश पॉन्ड में सिंगरौली क्षेत्र के एनटीपीसी लिमिटेड, यूपीआरवीयूएनएल, लैको पॉवर और हिंडालको इंडस्ट्रीज अपनी राख डालती है. ये ऐशपॉन्ड पूरी तरह से भर चुके हैं और अब इसमें ज्यादा राख डालने की संभावना नहीं है. अगले पांच सालों में हालत और बदतर हो जाएंगे . ऐशपॉन्ड भर जाने से इसका रिसाव रिंहन्द जलाशय में मिलेगा.
- अनपरा में मौजूद ताप विद्युत गृह अपने फ्लाय एश और बॉटम एश को बेलवादह गांव में मौजूद ऐश डाइक में डालता है और ऐशपॉन्ड का ओवरफ्लो रिंहन्द जलाशय में जरूर जाता है इसलिए इसे तुरंत बंद किया जाना चाहिए. 
कमेटी ने माना कि पारा की मात्रा भूमिगत जल में बहुत अधिक है. इसकी सानद्रता अपने मानक 1 माइकोग्राम प्रति लीटर से ज्यादा है. कुस्महा तालाब में pH, फ्लोराइड, एल्यूमीनियम, क्रोमियम, आइरन, पारा, कैडमियम और निकिल तय मानक से बहुत अधिक है.
डिबुलगंज और बजरंग नगर के आरओ शोधित पानी में भी एलुमीनियम, आइरन, पारा, कैडमियम और निकल अपने मानक से बहुत अधिक निकले . परसवार राजा के एक आरओ प्लांट से शोधित पानी में एलुमीनियम, आइरन और मरकरी अपने मानक से बढ़ा हुआ मिला. इसका मतलब यह है कि लगाये गए आरओ प्लांट ठीक से काम नहीं कर रहे हैं.
अहम बात ये है कि सरकार ने गांव वालों को चुप कराने के उद्देश्य से यहां आरओ वॉटर प्लांट तो लगा दिए हैं लेकिन या तो वो इस बात से अंजान है या इसे समझना नहीं चाहते हैं कि आरओ वॉटर प्लांट से निकला हुआ वेस्ट वॉटर भी ग्राउंड वॉटर के साथ मिल रहा है और उसमें जहर की मात्रा को और बढ़ा रहा है. यानि जिसे समाधान समझ कर किया जा रहा है वो समस्या में और इज़ाफा कर रहा है.
जहां तक फ्लोराइड के प्राकृतिक रूप से मौजूद होने की बात है तो बनवासी सेवा आश्रम और देश के कई शोध और सरकारी आंकड़ों के आधार पर देश के जो भी जिले या क्षेत्र में फ्लोराइड की समस्या है, उसका एक निश्चित ट्रेंड होता है. वो ज्यादातर गहराई में मौजूद भू-जल में पाया जाता है लेकिन सोनभद्र में तो तालाबों, कुओं में भी फ्लोराइड पाया गया है. इससे ये ज़ाहिर होता है कि उद्योगों का उत्सर्जन इसमें अहमतौर पर ज़िम्मेदार है. 

रिपोर्ट में प्रदूषण तमाम उद्योंगों सहित प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, और पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार को एनजीटी ने कुछ सुझाव भी दिए

1. वर्तमान में सिंगरौली क्षेत्र में जितनी औद्योगिक इकाईयां है, उनमें तब तक विस्तार न किया जाए जब तक इस क्षेत्र के सभी उद्योगों का सामूहिक रूप से प्रदूषण का प्रभाव तय मानकों के अंतर्गत सिद्ध ना हो जाए . 
2. उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश प्रदूषण बोर्ड ये सुनिश्चित करे कि प्रस्तुत एक्शन प्लान का उनके क्षेत्र में कम्यूलेटिव एनवायर्नमेंट पॉल्यूशन इंडेक्स  के तय मानकों के हिसाब से पालन हो रहा है या नही. प्रदूषण बोर्ड की प्रोग्रेस रिपोर्ट समय समय पर केंद्रीय प्रदूषण निंयत्रण बोर्ड के सामने प्रस्तुत की जाए.
3. सभी इंडस्ट्री गैसों के उत्सर्जन और अपशिष्ट उत्सर्जन के लिए ऑनलाइन मॉनिटरिंग प्रणाली लगाए और प्राप्त आंकड़ों को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण को भेजे . 
4. उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में चल रहे वर्तमान मॉनिटरिंग तंत्र को और भी बेहतर करने की जरूरत है. इंडस्ट्री को 6 महीने के अंदर कम से कम तीन लगातार हवा की गुणवत्ता मापने वाले मॉनिटरिंग तंत्र को स्थापित करना होगा. और इसकी जगह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तय करेगा.
5. इस क्षेत्र में हवा और पानी (सतही और भूमिगत) स्रोतों में पारे की मौजूदगी बेहद गंभीर है. इसलिए ज़रूरी है कि पारे की हवा और पानी में मौजूदगी  को मापने के लिए तीन सतत मॉनिटरिंग तंत्र लगाए जाएं. 

कमेटी की रिपोर्ट के बाद आनन फानन में कुछ काम किये गए जिसके चलते ही आश्रम में एक मॉनिटरिंग तंत्र भी लगाया गया जिसके अनुसार हालत बद से बदतर हो चुके है. लेकिन अगर देखा जाए तो ऐशपॉन्ड अभी भी लबालब भर कर ओवर फ्लो हो रहे हैं. इंडस्ट्री ने कुछ दिन तक तो बातों का पालन किया लेकिन फिर ढाक के तीन पात. गांव वाले आज भी वहीं प्रदूषित पानी पीने को मजबूर है. 
आश्रम के संचालक विमल भाई कहते हैं कि जरूरत इस बात की है कि जो उद्योगो से प्रदूषण फैल रहा है उस पर नियंत्रण हो, जो उद्योग गंदगी फैला रहे हैं इसे ठीक करने की जिम्मेदारी भी उनकी होनी चाहिए, अगर हम चाहते हैं कि यहां का पर्यावरण ठीक हो तो उसके लिए ज़रूरी है कि नीतियों का सही और ईमानदारी से पालन हो, उन पर निगरानी हो.
इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि क्या अब यहां पर और नए उद्योग लगाए जाने चाहिए, क्या यहां का पर्यावरण उसे बर्दाश्त कर सकता है. सरकार की नीतियां तो अच्छी हैं लेकिन अगर एक ही जगह पर बोझ लाद देंगे तो उसका असर तो होगा ही.

यहां के लोग जागरुक भी हो रहे हैं. बनवासी सेवा आश्रम जैसी संस्थाए पचास सालों से इनके उत्थान के काम में लगी भी हुई हैं. कुछ जगह आरओ प्लांट भी लग गए हैं. टैंकर से पानी भी आ रहा है. प्रदूषण की ऑनलाइन मॉनिटरिंग भी हो रही है. वो सब कुछ हो रहा है जो ये बता सकता है कि यहां पर हालात गंभीर है. और सरकार तमाम आंकड़ो को मानते हुए गंभीरता जाहिर भी कर रही है. उद्योग उनकी हां में हां भी मिला रहे हैं. वो सब कुछ हो रहा है जो नीतियों के तहत होना चाहिए. 

इस गंभीरता के बीच रमपतिया झुक कर अपनी जिंदगी भी जी रही है, रामभजन अपने तीन बच्चों की जिम्मेदारियों का बोझ उठाते हुए खुद भी झुक गया है और हरदम उसकी गर्दन नीचे ही रहती है. 18 साल से बिस्तर पर पड़ी सावित्री अपनी मौत का इंतजार कर रही है.  रामभजन अपनी फसलों को हर साल मरते हुए देख रहा है. और गांव के तमाम बच्चों की मुस्कान काली पड़ चुकी है. 

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और WaterAid India 'WASH Matters 2018' के फैलो हैं.

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)