बजट 2018 Analysis : किसानों ने क्या पाया इस बजट में...

कल बजट का पहला हिस्सा कृषि और उससे सम्बन्धी क्षेत्रों को ही समर्पित था. वित्त मंत्री के किसानों के लिए ऐलान शुरू करते ही एक विवाद उठ गया.

बजट 2018 Analysis : किसानों ने क्या पाया इस बजट में...

बजट आने से पहले देश के हर वर्ग को अपने लिए कुछ मिल जाने की उम्मीद थी. सबकी अपनी समस्याएं थीं और सबने उन समस्याओं के समाधान की आस इस बजट से लगाई हुई थी. बजट के क्या-क्या मकसद हैं, इस पर बजट आने से पहले लिखा जा चुका है. उसमें सबसे जरूरी मकसद था सामाजिक समानता को बढ़ावा देना. यह लक्ष्य सिर्फ वंचित तबकों को लाभ देकर पूरा किया जा सकता था. अच्छी तरह से समझा जा चुका था कि इस समय देश के वंचित तबके में सबसे ऊपर गांव का व्यक्ति है, खास तौर पर किसान. आबादी में अपने आकार के कारण दूसरा वंचित तबका महिला वर्ग को माना जा रहा था. इस साल के बजट भाषण पर गौर करें. बजट में सबसे ज्यादा शब्द और वाक्य इन्हीं दो तबकों को लेकर थे. इन्हीं दोनों वर्गों के लिए बजट को लाभकारी बताकर प्रचारित किया जा रहा है. अब सवाल यही बना है कि क्या इस बजट के जरिए वाकई हमने किसान के हित को साध लिया है? और दूसरा सवाल यह कि क्या सही में महिलाओं के लिए यह एक संवेदनशील बजट है? पहले किसान की बात करते हैं कि वह क्या चाह रहा था? उसे मिला क्या? और कितना? किसानों ने क्या पाया इस बजट में...

कल बजट का पहला हिस्सा कृषि और उससे सम्बन्धी क्षेत्रों को ही समर्पित था. वित्त मंत्री के किसानों के लिए ऐलान शुरू करते ही एक विवाद उठ गया. वित्त मंत्री ने दावा किया की रबी की फसल पर वायदे के अनुसार लागत से डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिया जा रहा है और इसी तर्ज पर अब खरीफ की फसल पर दिया जाएगा, लेकिन बजट भाषण के दौरान ही मीडिया में इसे लेकर बहस होने लगी और आरोप लगने लगे कि अभी ऐसा नहीं हो रहा है. बहस इस बात पर थी कि किसान की उपज पर लागत का आकलन सही नहीं है. किसान पहले से ही यह कहता आ रहा है. किसान का विलाप यह है कि वह इस समय अपनी उपज लागत से कम दाम में बेचने को मजबूर है. बहरहाल, बजट के विश्लेषण के बहाने उपज की लागत के आकलन का मुद्दा इतना बड़ा दिखने लगा है कि इसे जल्दी ही निपटाना जरूरी होगा. वरना सरकार किसानों को राहत देने का जो भी प्रचार करना चाहेगी वह सब बेकार चला जाएगा. इस तरह बजट में खरीफ के लिए पुराना समर्थन मूल्य दिए जाने का ऐलान किसान के लिए आकर्षक और विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता.

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किसानों के लिए कर्ज़ की सुविधा का ऐलान
किसान के लिए दूसरा बड़ा ऐलान 11 लाख करोड़ के कर्ज का था. बजट पेश होते समय ही मीडिया में इस पर बहस ये छिड़ी कि क्या किसान वाकई कर्ज चाहता था? वैसे भी पिछले कुछ वर्षों में यह कर्ज ही सबसे बड़ी समस्या बन गई है. न सिर्फ किसान के लिए बल्कि खुद सरकार के लिए भी, क्योंकि ये कर्ज बैंकों के जरिए ही दिए जाने का विकल्प उपलब्ध है. बैंकों की हालत उजागर हो चुकी है. खासतौर पर किसानों के मामले में सस्ते ब्याज़ वाले कर्ज़ को भी न चुका पाने की स्थिति है. विशेषज्ञों का भी यह मत है कि किसान की पहली और अकेली जरूरत सिर्फ उसके उत्पाद के सही दाम मिल जाना है. और यही अकेला उपाय है, जिससे किसानों को राहत पहुंचाने की सूरत बन सकती है. आगे यह देखा जाना है कि इस मामले में कुछ करने के लिए बजट के अलावा और क्या तरीके सोचे जा सकते हैं.

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ऑर्गेनिक खेती के नाम पर ग्रामीण महिलाओं का जिक्र
वित्त मंत्री ने इसे ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भर होने के मौके के रूप में पेश किया. बेशक इस समय ऑर्गेनिक उत्पादों का प्रचार जोरों पर है. बाजार में इस नाम से बिकने वाले उत्पाद महंगे हैं. रसायनिक खाद और रसायनिक कीटनाशकों के नुकसान को लेकर जागरूकता बढ़ चुकी है. अभी यह नहीं देखा जा रहा है कि रसायनिक खाद का यह चलन बढ़ा क्यों था. जाहिर है कि उत्पादन की मात्रा के लिए बढ़ा था. इस तरह से ऑर्गेनिक खेती की बात करने के पहले इसे लाभकारी बनाने की बात पहले सोची जानी चाहिए. बहरहाल इस मद में ₹200 करोड़ दिए गए हैं. छह लाख से ज्यादा गांव वाले अपने देश में 200 करोड़ की रकम से ऑर्गेनिक खेती को कितना टॉनिक मिल जाएगा, इसका अंदाजा लगाया जाना चाहिए. वैसे दो सौ करोड़ की ये रकम गांव में सभी की आजीविका बढ़ाने की योजना के तहत है. बेशक इससे गांव की महिलाएं भी लाभ ले सकती हैं, लेकिन यह खासतौर पर उनके कल्याण के लिए नहीं है. इस तरह इसे महिलाओं के साथ जोड़ने का तुक बैठता नहीं है.

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कृषि बाजार के आधारभूत ढांचे की फिक्र
पूरे बजट में सही मायने में अगर किसान के काम की कोई बात रही तो वह थी कृषि बाजार और आधारभूत ढांचा बनाने या बढ़ाने का ज़िक्र. करीब 22,000 ऐसी इकाइयों के निर्माण की योजना है. और भी कई काम इससे जुड़े हैं, लेकिन पूरे देश के किसानों तक पहुंच के लिए इस मद में सिर्फ दो हजार करोड़ का प्रावधान है. इस तरह इसे भी एक प्रायोगिक योजना ही समझा जाना चाहिए. इतना ही नहीं यह कृषि बाजार के लिए आधारभूत ढांचा विकसित करने की बात है सो इसका असर दिखने में कितना वक्त लगेगा यह भी गौर करने की बात होगी.

खाद्य प्रसंस्करण बनाम किसान
बजट में खाद्य प्रसंस्करण के बारे में जो कहा गया उसे भी कृषि और किसान से जोड़कर दिखाने की कोशिश हुई. अब तक यही तो समस्या रही कि कृषि उत्पाद से जुड़े उद्योगों से किसान को क्या मिल रहा है. बेशक किसान की उपज इन उद्योगों के लिए कच्चा माल है. इस कच्चे माल का दाम तय होना ही किसान के काम का है. बाकी खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को हर मायने में उद्योग व्यापार का ही क्षेत्र माना जाना चाहिए. हां, अगर किसानों को ही इस तरह के उद्योग में लाने की शुरुआत होती तो बेशक बहुत बड़ी पहल होती, लेकिन मुश्किल यह है कि किसान जब अपने लिए सबसे माफिक उद्यम में ही घाटा उठा रहा है तो उद्यम बदलने का जोखिम उठाने की तो वह कल्पना ही नहीं कर सकता.

(लेखिका, प्रबंधन प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रेनोर हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं)

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