बाल दिवस विशेष : क्या हुआ जो नोबिता को ‘पिंक’ कलर पसंद है...

हमने कपड़ों से लेकर खाने तक, बातों से लेकर सीरियल्स तक सबकुछ स्त्री-पुरुष में बांट दिया है. यहां तक कि रंग भी स्त्रीलिंग और पुल्लिंग होते हैं. अगर कहीं किसी लड़के को गुलाबी रंग पसंद आ गया तो उसे तुरंत बता दिया जाता है कि वह इस रंग को पसंद करके बहुत बड़ी गलती कर रहा है.

पंकज रामेंदु | Updated: Nov 14, 2017, 12:58 PM IST
बाल दिवस विशेष : क्या हुआ जो नोबिता को ‘पिंक’ कलर पसंद है...

नोबिता एक ऐसा लड़का है जो एक लूज़र है. जो पढ़ाई में फिसड्डी है. जो हमेशा हारता रहता है. जिसे मदद करने के लिए एक रोबोट मिला है जिसका नाम है डोरेमोन. ये वो किरदार हैं जिसका नाम सभी जानते हैं. अगर आप नहीं जानते हैं तो एक बार अपने बच्चों से पूछ लीजिएगा. सारा विवरण मिल जाएगा.

जिनके घर में भी छोटे बच्चे हैं उनके घरों में टीवी पर दिनभर एक ही आवाज़ गूंजती रहती है-डोरेमोन और नोबिता की. हर वक्त मदद मांगने वाला नोबिता भले ही हर काम में फिसड्डी हो लेकिन उसमें एक खूबी है वह दिल से बहुत ही भला है. वह चाहकर भी बुरा नहीं बन पाता है. वह दिल से बहुत ही साफ है. लेकिन उसमें एक ख़ामी ऐसी भी है जिसकी वजह से वह अक्सर मज़ाक का कारण बनता है. उसे बेसबॉल खेलना पसंद नहीं है. उसे वह खेल पसंद है जो उसकी दोस्त शुज़ूका यानि लड़कियां खेलती हैं. उसे वह टीवी सीरियल पसंद हैं जो लड़कियां देखती हैं. इसी वजह से अक्सर उसके दोस्त जियान और सुनियो उसका मज़ाक भी उड़ाते हैं. उसे अक्सर ये ताना दिया जाता है कि वह लड़का है उसे ताकत वाले खेल खेलना चाहिए न कि लड़कियों वाले खेल.

वहीं बच्चों की एक और पसंद है शिनचैन. पांच साल के शिनचैन का एक दोस्त है कज़ामा. कज़ामा हर चीज़ में होशियार है. वह एक अनुशासन प्रिय लड़का है. इसलिए उसकी शिनचैन से कभी नहीं बनती है क्योंकि शिनचैन बहुत शैतान है. लेकिन फिर भी दोनो दोस्त हैं. कज़ामा का एक राज है जो वह हमेशा अपने दोस्तों से छिपाकर रखता है. टीवी पर आने वाली एक लड़की है ‘मोएपी मेजिक गर्ल’ जिसे कज़ामा बेहद पसंद करता है. अकेले में उसके जैसा बनकर उसके जैसा ही गाना भी गाता है. लेकिन वह ये बात कभी किसी को बताता नहीं है. क्योंकि कज़ामा जानता है कि मोएपी लड़कियां देखती है. अगर उसके दोस्तों को पता चल गया कि वह भी मोएपी देखता है तो सब उसकी हंसी उड़ाएंगे.

दरअसल यही वह वजह है जो हमारे लड़के समझ ही नहीं पाते हैं कि लड़कियों का सम्मान कैसे करना है. अगर कभी कोई लड़का उन कामों को करता है (जो मान लिया गया है कि लड़कियों का काम है) तो उसके दोस्त यहां तक उसके घर में भी उसे टोक दिया जाता है या उसका मज़ाक बनाया जाता है. हम बचपन से लड़के के दिमाग में ये ठूंसना शुरू कर देते हैं कि ये काम तुम्हारा नहीं है. तुम लड़के हो.

हमने कपड़ों से लेकर खाने तक, बातों से लेकर सीरियल्स तक सबकुछ बांट दिया है. यहां तक कि रंग भी स्त्रीलिंग और पुल्लिंग होते हैं. अगर कहीं किसी लड़के को गुलाबी रंग पसंद आ गया तो उसे तुरंत बता दिया जाता है कि वह इस रंग को पसंद करके बहुत बड़ी गलती कर रहा है. ये रंग उसका नहीं है. उसके रंग में थोड़ा मर्दाना तैश होना चाहिए. उस रंग में जोश और ताकत नज़र आनी चाहिए.

हमारे यहां अक्सर कहा जाता है कि हम लड़कियों को सिखाते हैं कि वह ये करें, ऐसा पहनें, यूं चलें. लेकिन ऐसा ही नहीं है. हम लड़कों को भी सिखाते हैं वह ये न करें, इसको न पहनें, ऐसे न चलें क्योंकि ऐसा तो ‘लड़कियां’ करती हैं.

बचपन में दीवाली के अगले दिन अपने घर बने हुए पकवानों को थाल में सजाकर मोहल्ले पड़ोस में बांटने का काम होता था तो मैं हरदम सोचता था कि मैं कहीं छिप जाऊं क्योंकि छोटा होने और कोई बहन नहीं होने की वजह से ये काम मेरे ज़िम्मे आता था. जब मोहल्ले की लड़कियां थालियां ले लेकर घर से निकलती थीं और उनके साथ ही मैं भी जाता था तो मेरी नज़र ऊपर नहीं उठती थी. मैं बार बार कनखियों से उन्हें देखता रहता था. मुझे लगता था जैसे किसी कोने में खड़े हुए मेरे दोस्त मुझ पर हंस रहे हैं. मुझे हर हंसी में मेरा मज़ाक बनता हुआ नजर आता था. इसी वजह से मुझे दीवाली की अगली सुबह बिल्कुल रास नहीं आती थी. इसी तरह हमारे मोहल्ले में जो लड़कियां रहती थी दीवाली आते ही उनके बीच में एक अनकही रंगोली प्रतियोगिता चालू हो जाती थी. हर एक घर के सामने इतनी अद्भुत रंगोली होती थी कि हमारी पूरी कॉलोनी देखते ही बनती थी. उस बीच हमारे घर में या तो साधारण सी रंगोली पड़ी होती थी या कभी-कभी कोई बड़ी दीदी की कृपा हो जाती थी तो कुछ अच्छी सी रंगोली पड़ जाती थी. मम्मी अकेली थी तो उनके पास और भी कई कामों की व्यस्तता रहती थी इसलिए उनके लिए रंगोली प्राथमिकता कभी नहीं रही.

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एक दिन मैंने हमारी पड़ोस वाली दीदी से रंगोली की किताब मांगी और उसमें बनी हुई बिंदियों को मिलाकर रंगोली बनाने की ठानी. खास बात ये थी कि मैंने सबसे कठिन वाली रंगोली का चुनाव किया. शायद उसके पीछे मेरे घर के आंगन का हमेशा से फीका रहना रहा होगा. खैर, जब मैंने चुटकी में भरकर वो बिंदियां गिराना शुरू किया तो मैं पूरे मोहल्ले का आकर्षण का केंद्र बन गया था. सारी लड़कियां भी मुझे देख रहीं थी. गोया मैं कोई अजूबा हूं. हालांकि उस कठिन रंगोली को पूरा करने में भी लड़कियों ने ही मेरी मदद भी की. लेकिन वह पहली बार था जब मुझे किसी स्त्रैण कहे गए काम को करने में मज़ा आया था. उसके पीछे की वजह सिर्फ यही थी कि स्त्री-पुरुषआकर्षण के तहत उस वक्त मोहल्ले का पूरा आकर्षण मेरे इर्द गिर्द था. उस वक्त मुझे लड़के का काम, लड़की का काम जैसी कोई समझ नहीं थी. घर में चूंकि मम्मी के अलावा कोई महिला नहीं थी तो इन कामों को करना हमारी मजबूरी भी थी. ऐसा ही एक काम था बुधवार के हाट से सब्जी लाना. रात होते ही जब मैं अपना झोला टांगे सब्जी लेने जाता था. तो मुझे गृहणी बुलाया जाता था. मेरा सब्जी लेने जाने का अपना मकसद हुआ करता था. हाट में बहुत बढ़िया चाट मिला करती थी. उसके स्वाद के आगे तानों की कड़वाहट अक्सर दम तोड़ देती थी. दरअसल मुझे समझ में भी नहीं आता था कि इसमें बुराई क्या है.

जीवविज्ञान का छात्र होने की वजह से मुझे ये तो मालूम चल गया था कि मासिकधर्म क्या होता है. मैं ये भी जानता था कि इसके पीछे क्या वजह होती है. लेकिन उस उम्र में, मैं इससे जुड़ी सामाजिक सोच को समझ नहीं पाता था कि क्यों मेरी दोस्त को किसी मंदिर में जाने से मना कर दिया जाता है. मोहल्ले में पड़े हुए सैनेटरी पैड्स या उससे भी पहले खून से सने हुए कपड़ों को जब घूरे से उठाकर कुत्ते उसके साथ जूझ रहे होते थे. और मुझसे सीनियर मोहल्ले के लड़के उसे देखकर हंसते हुए इस बात का आंकलन लगा रहे होते थे कि ये मोहल्ले के किस घर से आया है तब मैं भी उनके मज़ाक में बस यूं ही शामिल हो जाया करता था. छोटा था इसलिए ये समझ नहीं आता था कि इस कपड़े में ऐसा कौन सा चुटकुला लिखा है जो इन लोगों को हंसा रहा है.

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दरअसल इसके पीछे हमारी वह शिक्षा है जिसे देने मे हम हमेशा से झिझकते रहे हैं. मेरे कई दोस्त ऐसे हैं जो महिलाओं को बहुत सम्मान करते हैं. उनकी बराबरी की बात दिल से करते हैं बल्कि कहीं हद तक वह उसे अपने ऊपर लागू भी करते हैं. मेरे कुछ मित्रों को काफी उम्र तक ये पता नहीं था कि मासिक धर्म क्या होता है. वो उसे एक विकार समझते थे. वहीं एक मित्र की पत्नी ने जब प्रसव पीड़ा सहन करके एक सुंदर औऱ स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया तो उसके बाद उस महिला को होने वाली तकलीफ, उसके स्राव की परवाह, या सरकारी अस्पताल में उसके पड़े रहने का दर्द शायद वह समझ ही नहीं पाया. ऐसा नहीं था कि वह अपनी पत्नी को प्यार नहीं करता है. ऐसा भी नहीं है कि उसे उसकी परवाह नहीं है. लेकिन “बस दो ही दिन की बात है” उसके इस जुमले में वह उस ‘जरूरी’ जागरुकता का अभाव था जो हमारे यहां के लड़कों के पास नहीं होती.

हमारे देश में जहां लड़कों के अंत:वस्त्र किसी भी छत की शोभा बढ़ा रहे होते हैं वहीं महिलाओं के लिए एक अनकहा नियम बना दिया गया है और वो अपने अंत:वस्त्रों को कभी साड़ी के नीचे, कभी टॉवेल में छिपाकर सुखाती हैं. क्योंकि ये बता दिया गया है कि उनकी सूखते कपड़ों को देखकर भी कोई उनके शरीर का आंकलन लगा सकता है. इस सबके पीछे एक ही वजह है लड़कों को न दिया जाने वाला ज्ञान जिसे वह इधर-उधर से बटोरता है. फिर उसका उपयोग गलत तरीके से करता है.

हमने लड़कों को बताया है कि जो खेल, कपड़े, रंग, लड़कियां पसंद करती हैं वह कमज़ोरी की निशानी होती है. हमें हमारे घर के नोबिता और कज़ामा को लेकर चिंता रहती है कि कहीं वो पिंक रंग पसंद न करने लगे. हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘मेरी अंदर की स्त्री मुझ पर हमेशा हावी रही है’. वह आगे एक जगह किसी शायर की लाइन लिखते हैं - ‘नारी ने पूरी नारी होकर, पुरुष ने पूरा पुरुष होकर सारा मज़ा खराब कर दिया. लाज़मी तो ये है की नारी में थोड़ा पुरुषत्व और पुरुष में थोड़ा सा नारीत्व आ जाए.'

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

 

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)