पाताल में समाती नैतिकता

पुरानी मॉब लिंचिंग (पीट-पीट कर मार डालने) की घटनाओं पर कठोर कार्रवाई और तीखी सामाजिक प्रतिक्रिया न आने की वजह से, इनकी पुरावृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है.

पाताल में समाती नैतिकता

सोचा था, अब कुछ समय तक भारत के बुनकरों, छपाइगरों और तमाम शिल्पकारों की स्थितियों, उनकी आर्थिक बर्बादी को लेकर लिखूंगा! किसानों की बदहाली पर बातचीत करेंगे! पिछले दिनों सेवाग्राम, वर्धा में कुछ दिन रहने के बाद नए सिरे से कृषि और ग्रामोद्योग पर नया नजरिया बनाने और गांधी की शाश्वत प्रासंगिकता पर लिखने का मानस भी बनाया था. परंतु एकाएक जैसे सबकुछ धराशायी हो गया! दिमाग सुन्न होता चला जा रहा है और लग रहा है कि जैसे पूरा भारत निरीह लोगों की चीत्कार और आर्तनाद (गुस्से से चिल्लाना) से गूंज रहा है और इसको दबाने के लिए दुगने शोर से चुनाव व विकास जैसे आडंबरों का गुणगान हमारे सामने किया जा रहा है. 

धूमिल अपनी कविता शान्तिपाठ में कहते हैं,

‘‘अखबारों की सुर्खियां मिटाकर दुनिया के नक्शे पर/अन्धकार की एक नयी रेखा खींच रहा हूं/ मैं अपने भविष्य के पठार पर आत्महीनता का दलदल उलीच रहा हूं.’’

शुरुआत करने का डर या झिझक पीछा नहीं छोड़ रहीं है. भारतीय सभ्यता बड़ी ही रोचक है, यह एक ऐसे अमूर्त से स्वयं को परिभाषित करती है कि हतप्रभ रह जाना पड़ता है! रुद्र नामक वैदिक देवता जो कि संहार के देवता भी कहलाते हैं, को करुणानिधि भी कहा गया है. इसी के दृष्टिगत दक्षिण भारत के वीर शैव सम्प्रदाय ने अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म कहा! पर वर्तमान में जो कुछ हो रहा है वह सिर्फ हिंसा नहीं है बल्कि वीभत्सता अपनाए हुए ऐसा घटनाक्रम है, जिसमें पतन की सारी सीमाओं का अतिक्रमण हो गया है! 

कहीं से तो मूल विषय पर आना ही पड़ेगा. कब तक शब्दों की भूल भूलैया में स्वयं को छिपाया जा सकता है? यह महज खबर नहीं है! मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले के एक गांव में एक 45 वर्ष की मां के साथ उसी के 30 वर्षीय बेटे ने बलात्कार किया. इस दौरान लड़के का 7 वर्ष का बेटा (यानी उस मां का पोता) वहीं बैठा यह सबकुछ देख रहा था! 

यह एक कल्पनातीत घटना है! यह हमें सोचने पर विवश कर रही है कि हमारा समाज किस ओर रुख कर रहा है. कुछ लोग इसे अपवाद या दुर्लभतम कहकर किनारा कर सकते हैं. परंतु यह इतनी आसानी से पृथक हो जाने वाला मामला नहीं है! अब चलिए एक दूसरी घटना पर गौर करिए!

यह कश्मीर के बारामूला की है. कठुआ की उस नन्हीं सी मासूम लड़की की 'आंखें' अभी तक हमसे सवाल कर रहीं हैं. हम उसकी आंखों से अब भी आंखें नहीं मिला रहे हैं. पर इस बार शायद ऐसा नहीं होगा, क्योंकि जिस 9 वर्ष की लड़की के साथ घटी घटना का जिक्र करने जा रहा हूं, उसकी तो आंखें भी निकाल ली गईं. घटना पर गौर करिए...

एक महिला इस बात से नाराज है कि उसका शौहर दूसरी बीवी को अधिक प्यार करता है, उसे ज्यादा समय देता है और इस सबके अलावा एक और बात यह है कि वह अपने सारे बच्चों में सबसे ज्यादा प्यार अपनी इसी 9 साल की बेटी से करता था. इसलिए बीवी ने उसे (पति) को सबक सिखाने की सोची और निशाना बनाया अपनी (सौतेली ही सही) ही बेटी को! 

कोई सामान्य या प्रचलित आपराधिक तरीका होता, जैसे कि हत्या कर देना, जलाकर या किसी अन्य तरीके से, तो भी यह निंदनीय होते हुए भी इतना डरावना व वीभत्स नहीं होता, जितना कि इस वारदात में हुआ है. नीचता की सारी सीमाएं पार करते हुए इस महिला ने अपने नाबालिग बेटे और उसके दोस्तों से अपने निर्देशन में उस मासूम लड़की के साथ बलात्कार करवाया और इस पूरी घटना की वह गवाह रही! घृणा व बदला लेने की इस पराकाष्ठा को क्या कहा जाए?

पहली घटना (मां से बलात्कार) में वह छोटा बच्चा अपने पिता के कुकर्म का महज गवाह है. वहीं इस घटना में मां अपने बेटे से अपनी उपस्थिति में यह सब करवा रही है. यह विचारणीय है और शोध का विषय भी है कि किस तरह एक मां अपने बेटे को बलात्कार के लिए तैयार कर उसकी साक्षी भी बनती है. यह विकृत मानसिकता का प्रसार हमारे यहां किस वजह से बढ़ रहा है? 

बात यहीं नहीं थमी, पुलिस का कहना है कि इस घटना में कुछ 5 लोग शामिल थे. बलात्कार के बाद कुल्हाड़ी से उस लड़की का सिर काटा, फिर एक लड़के ने चाकू से उसकी आंखें निकाली और फिर उस पर तेजाब डाला! यह विस्तृत विवरण लिख पाना भी आसान नहीं है, परंतु हमें कन्नी काटकर निकल जाने की प्रवृत्ति पर लगाम लगानी होगी! हम यह लगातार सुन रहे हैं कि पिता या भाई या अन्य रिश्तेदार लड़कियों के साथ बलात्कार कर रहे हैं और ये घटनाएं लगातार बढ़ती जा रहीं है!

एक पुराना ग्रीक नाटक है, ‘‘इडिपस दि रेक्स’’ यह ईसापूर्व सन् 429 में लिखा गया था और इसके लेखक थे सोफीक्लीज. इस नाटक के विस्तार में जाए बिना सिर्फ इतना ही विवरण देना है कि अनजाने में ऐसी परिस्थितियां बन गईं कि इडियस या ओडियस का विवाह अपनी मां से हो गया. इसका पता चलते ही मां जो कि उस राज्य की रानी भी थी, ने आत्महत्या कर ली और ओडियस ने अपने ही हांथों से अपनी दोनों आंखे निकाल लीं और स्वयं को राज्य से निष्कासित कर लिया. यह नैतिकता की अभिव्यक्ति की गाथा है. 

परंतु हम आज देख रहे हैं कि भारत एक अजीब सी मनोदशा का शिकार होता जा रहा है. ऐसी विद्रूप घटनाएं कुछ ही समय में हमारे दिमाग से बाहर हो जाती हैं और हम किसी और गुंताडे़ में लग जाते हैं. बहाना अपनी रोजी-रोटी और जिम्मेदारियों का बना लेते है. परंतु दुखद और खतरनाक यह है कि इस विद्रूप हिंसा की पुनरावृत्ति जगह-जगह देशभर में अलग-अलग तरह से रोज हो रही है. 

पुरानी मॉब लिंचिंग (पीट-पीट कर मार डालने) की घटनाओं पर कठोर कार्रवाई और तीखी सामाजिक प्रतिक्रिया न आने की वजह से, इनकी पुरावृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है. अभी इलाहाबाद में जमीन के मामले में एक अवकाश प्राप्त दारोगा की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. कोई सामने नहीं आया. दिल्ली में एक 16 साल के बच्चे को चोरी की आशंका में भीड़ ने मार डाला! 

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के पास स्थित रायसेन में जब एक युवक अपनी गाय तलाश रहा था तो भीड़ ने उसे पकड़कर पेड़ से बांध दिया और बाद में उसका एक हाथ काट डाला. कल ही इंदौर में एक रहवासी अपनी कार पर खरोंच लग जाने से इतना नाराज हुआ कि उसने चौकीदार को पीटना शुरू कर दिया. चौकीदार की पत्नी जब पति को बचाने आई तो गुस्से में उसके पेट में लात मार दी. परिणामस्वरूप उसके गर्भ में पल रहा बच्चा मर गया. 

यह घटना व बाकी घटनाएं सिर्फ अखबार की सुर्खियां भर नहीं हैं. उस गर्भस्थ शिशु का मरना एक तरह से हमारे भविष्य की भी मृत्यु है. हमें घटनाओं को खासकर इन विद्रूप हिंसात्मक प्रकरणों को खुद से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति विकसित करनी ही होगी. क्योंकि इस बात की कोई निश्चितता नहीं है कि हम कभी भी ऐसी हिंसा का शिकार नहीं हो सकते. घरेलू हिंसा का विस्तार अंततः पूरे समाज में हिंसा फैलाने में सहायक होता है.

गांधीजी कहते थे, ‘‘यह अहिंसा, आज हम जिसे मोटे तौर पर समझते हैं, सिर्फ वही नहीं है. किसी को भी कभी नहीं मारना, यह तो अहिंसा है ही. तमाम खराब विचार हिंसा हैं. जल्दबाजी हिंसा है. झूठ बोलना हिंसा है. द्वेष-बैर-डाह हिंसा है. किसी का बुरा चाहना हिंसा है. जिस चीज की विश्व को जरूरत है उस पर कब्जा रखना भी हिंसा है.’’ 

परंतु हम तो नैतिक पतन को भी हिंसा मानने को तैयार नहीं हैं. बड़वानी और कश्मीर की घटनाओं को व्यक्तिगत नैतिकता से जोड़कर बच निकलें तो इलाहाबाद, दिल्ली, रायसेन और इन्दौर की घटनाओं से कैसे मुंह छुपाएंगे. भारत में जो कुछ अभी सामाजिक स्तर पर चल रहा है, उसकी खामियों को खोजना आज की सबसे बड़ी जरूरत है. बेटे का मां से और मां का बेटी से किया गया व्यवहार अंदर तक विचलित कर रहा है और समाज में बढ़ते दुराचार की ओर संकेत कर रहा है. गुरुनानक कहते हैं, ‘‘साधु, सन्त या पापी शब्दों से नहीं बनते/और लेखा हमारे कहने का नहीं, करने का रखा जाएगा. हम जैसा बोएंगे वैसा काटेंगे.'' 

आजादी के पहले के करीब चार दशक भारत में सामूहिकता के विकास के थे. उसी दौर में सामाजिक सुधार के तमाम रास्ते भी खुले. इस दौरान सिर्फ अंग्रेजों का ही नहीं ऐसे तामम भारतवासियों का भी विरोध हुआ, जो कि सामाजिक सद्भाव के विरोधी थे. सामाजिक न्याय की अवधारणा भी तभी विकसित हुई थी. तभी तो भारतीय संविधान की पहली पंक्ति बनी, ‘‘सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय.’’ 

गौर करिए सबसे पहले सामाजिक न्याय को रखा गया है. बढ़ती हिंसा और विद्रूपता भारतीय संस्कृति व सभ्यता का ही नहीं बल्कि हमारे संविधान की मूल भावना का भी अपमान है. हमें दिल्ली, भोपाल जैसे स्थान जहां हमारी संसद व विधानसभाएं स्थित हैं, की ओर ज्यादा ध्यान न देकर अपने पड़ोसी से लगाव बढ़ाना पड़ेगा, क्योंकि वक्त आने पर हमारा पड़ोसी ही हमारे लिए खड़ा होगा. अन्त में भारतीय शासन व्यवस्था से भी एक प्रश्न. 

बेख्त के एक नाटक में एक लड़की पुलिस वाले से कहती है, ‘‘मुझे तुमसे डर लगता है, यह देखकर तुम्हें शर्म नहीं आती ?’’ आज यही सवाल हम सबसे भी है. 

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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