सिनेमा की भाषा और साहित्य की लिपि

पंकज रामेंदु | Updated: Sep 14, 2017, 09:51 AM IST
सिनेमा की भाषा और साहित्य की लिपि

भारतीय सिनेमा में 'प्यासा' फिल्म को अब तक की सबसे बेहतरीन और खूबसूरत कवितामयी फिल्म के रूप में देखा जाता है. फिल्म में एक गाना है - 'ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया' जब ये गाना फिल्माया जा रहा था उस वक्त फिल्म के लेखक अबरार अल्वी किसी कारण से सेट पर मौजूद नहीं थे. साहिर लुधियानवी जो उस दौर के या हिंदी सिनेमा में हर दौर के सबसे उम्दा गीतकार माने जाते हैं, उन्होंने यह गीत लिखा है. 'टेन इयर्स विद गुरु दत्त, अबरार अल्वीज जर्नी' - इस किताब में अपने अनुभवों को साझा करते हुए अबरार बताते हैं कि जब वो सेट पर पहुंचे तब तक साहिर के लिखे इस गीत की पूरी शूटिंग हो चुकी थी. वो गीत के बोल से खुश नहीं थे. जब गुरु दत्त ने उन्हें अनमना देखा तो उनसे जानने की कोशिश की कि आखिर माजरा क्या है.

अबरार ने गुरु दत्त से कहा कि हम पचास के दशक में जी रहे हैं ये कोई राजघरानों का वक्त नहीं कि हम इस तरह के बोल का इस्तेमाल करें. आज न तो महल है और न ही तख्त औऱ ताज. अबरार ने कहा ये पूरी तरह अप्रासंगिक है. लेकिन अब कुछ किया नही जा सकता था क्योंकि गाना तो शूट हो चुका था. तो अबरार ने इस गाने से पहले फिल्म में प्रकाशक की भूमिका निभा रहे रहमान के लिए एक सीन लिखा जिसमें वो मंच पर खड़े होकर बोलते हैं कि आज अगर विजय जिंदा होते तो देखते कि जिस जनता ने उन्हें ठुकरा दिया था वो आज उन्हें तख्त पर बैठाना चाहती है, उसके सर पर ताज पहनाना चाहती है. इस तरह से गाने के बोल के साथ न्याय किया गया.

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वो अबरार अल्वी जो भाषा को लेकर इतनी बारीक सोच रखते थे उन्होंने ही गुरु दत्त की एक बेहद सफल फिल्म 'आर-पार' में अपने किरदारों से उनके हिसाब से संवाद बुलवाए. फिल्म में टैक्‍सी ड्राइवर की भूमिका निभा रहे गुरु दत्त जो कम पढ़े लिखा है और मध्यप्रदेश के किसी गांव में पला बढ़ा है, हीरोइन के पिता से बोलता है- 'बखत-बखत की बात है लालाजी, आज यारों का बखत ढीला है, इसलिए गरज के बोलते हैं. 'यहां अबरार ने वक्त की जगह बखत शब्द का और मेरा की जगह यारों शब्द का इस्तेमाल किया. जो उस संवाद को खूबसूरत भी बना देता है और सहज भी. पारसी की भूमिका निभा रहे जॉनी वॉकर एक जगह बोलते हैं 'मैं तुमसे पहलेइच बोला था, इधर से चलो करके' - यहां 'करके' एकदम मुंबइया हिंदी है.

अबरार अल्वी बताते हैं कि अगर हमें किसी किरदार के लिए संवाद लिखने है तो उस किरदार के पूरे रहन-सहन के बारे में सोच कर लिखना होता है कि आखिर वो किरदार आता कहां से हैं, किस वर्ग से संबंध रखता है. अगर आप सही लिखना चाहते हो तो कई बार उसको गलत तरीके से लिखना पड़ता है. क्योंकि यहां किरदार कुछ पढ़ नहीं रहा है वो बोल रहा है.

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हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसे सब अपनी तरह इस्तेमाल करते हैं और वो होती जाती है. उसके इस उदार रवैये ने ही इसे बचा कर रखा हुआ है. लेकिन यहां ये सोचना भी जरूरी हो जाता है कि हम किस माध्यम के लिए लिख रहे हैं. किसके लिए लिख रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम अपनी कमी छिपाने के चक्कर में हिंदी पर प्रहार कर रहे हैं. बीते दिनों कई टीवी सीरियल्स बनाने वाले प्रोडक्शन हाउस के साथ काम करने का मौका मिला. अलग अलग तरह के कार्यक्रम बनाने वाले इन सभी लोगों में एक बात एक जैसी थी. अगर आप इन्हें कुछ भी देवनागरी में लिख कर देंगे तो आपके पास तुरंत फोन आ जाएगा कि इसे देवनागरी की जगह रोमन में लिख दीजिए. विडंबना देखिये कि किसी एक टीवी सीरियल में कभी कृष्ण की भूमिका निभाने वाले शख्स के लिए भी जब आप संवाद लिखते हैं तो उसे रोमन (अंग्रेजी लिपी में हिंदी लिखना) में लिख कर देना होता है क्योंकि 'कृष्ण' हिंदी पढ़ना नहीं जानते हैं.

एक बार एक विज्ञापन फिल्म के लिए जिंगल (गाना) बनाने के दौरान ऐसा ही दिलचस्प वाक्या हुआ. विज्ञापन के निर्देशक ने बताया कि उस एक मिनिट के जिंगल में वो क्या चाहते हैं. जिंगल लिखे जाने के बाद कम से कम 20-25 बार उसमें सुधार किया गया लेकिन बात ही नहीं जम रही थी. समझ में ये नहीं आ रहा था कि जो वो निर्देश दे रहे हैं लिखा तो वैसे ही जा रहा है आखिर दिक्कत कहां है. इस तरह करते –करते एक दिन निर्देशक महोदय अपनी टीम के साथ मुंबई से दिल्ली पहुंचे. अब हम आमने सामने थे, उन्होंने बड़ी संजीदगी और नर्म लहज़े में बताया कि वो क्या चाहते हैं. इस बार उनके सामने ही जिंगल लिखा और जब वो उसे पढ़ने लगे तब सारा माजरा समझ में आया. दरअसल वह हिंदी पढ़ ही नहीं पाते हैं. इस 'खुलासे' के बाद जब पुराने जिंगल को मैंने रोमन भाषा में लिखकर दोबारा दिखाया तो उनका कहना था यही तो वह चाहते थे.

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देश के कई चैनलों पर आने वाल कार्यक्रमों के लिए लेखन करने के दौरान एक बात से हर बार दो चार होना पड़ता है कि भाषा 'यूथ' से जुड़ी होनी चाहिए. जिस 'यूथ भाषा' की यहां पर बात की जाती है उसका मतलब होता है एक ऐसी स्क्रिप्ट जिसमें अंग्रेजी शब्दों की भरमार हो. यहां तक कि कई बार उन हिंदी शब्दों का इस्तेमाल भी वर्जित होता है जो चलन में होते हैं. इसके पीछे उनका तर्क यही रहता है हमारे युवा दर्शक इस भाषा को समझ नहीं पाएंगे. वहीं इस देश के हर बच्चें की ज़बान पर रहने वाले डोरेमोन और शिनचेन की भाषा पर अगर गौर करेंगे तो वो आपको हैरत में डाल देगी. जहां थेंक्यू जैसे शब्द की जगह भी 'आपका शुक्रिया' और हेल्प की जगह पर 'मदद'जैसे शब्दो का इस्तेमाल बड़ी ही सहजता के साथ किया जाता है. खास बात ये है कि ये कार्यक्रम चर्चित भी है और बच्चें इसे समझ भी लेते हैं.

इन दिनों एक जुमला चल निकला है नई वाली हिंदी या फिर कूल हिंदी. ये बहुत अच्छी बात है कि हम हिंदी को भी सहज करने में, आमजन को पाठक बनाने में लगे हुए हैं. लेकिन इसका एक नुकसान भी है यहां नई हिंदी में जो लिखा जा रहा है उसमें देवनागरी में अंग्रेजी लिपि को घुसेड़ा जाने लगा है. जो ना सिर्फ भाषा के लिए ही नुकसानदायक है बल्कि लिपि पर भी चोट पहुंचाता है. हिंदी के लोकप्रिय टीवी उद्घोषक शम्मी नारंग जिनकी आवाज़ दिल्ली में चलने वाली मेट्रो में भी आपके कानों में पड़ती है, उन्होंने एक इंटरव्यू में उदाहरण देते हुए कहा था कि एक लेखक का दायित्व होता है कि वो अपने पाठक को सिर्फ पठन सामग्री ही न दे साथ में उसे शिक्षित भी करे. उदाहरण देते हुए नारंग ने बताया था 'जैसे हमें अगर लगता है कि यूनिवर्सिटी शब्द विश्वविद्यालय से ज्यादा जाना पहचाना शब्द है तो इसे इस्तेमाल करते वक्त 'यूनिवर्सिटी यानि विश्वविद्यालय' लिखा जा सकता है ताकि जो पाठक इस शब्द का अर्थ नहीं जानता था वो भी जान जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं करके अब अंग्रेजी के शब्दों को उसी लिपि में हिंदी साहित्य में डाल दिया जाता है. अक्सर लोग एक शब्द का इस्तेमाल करते हैं शुद्ध हिंदी. दरअसल शुद्ध हिंदी जैसी कुछ होती नहीं है. भाषा या तो कठिन होती है या सरल होती है और यह नियम हर भाषा पर लागू होता है. एक अंग्रेजी शेक्सपियर ने लिखी है जो समझना हर किसी के बूते की नहीं होती है.

एक सहज और सरल अंग्रेजी है जिसने चेतन भगत को भारत के प्रसिद्ध लेखकों में शुमार कर दिया लेकिन आपने कभी किसी अंग्रजी की किताब में किसी देवनागरी लिपि में लिखे हुए शब्द को देखा है. दरअसल यही वो बात है जो हमारी भाषा को कहीं का नहीं छोड़ती है. ये बात सही है कि जिस भाषा में जितनी स्वीकार्यता होती है वो भाषा उतनी ज्यादा समृद्ध होती है औऱ जीवित रहती है. लेकिन इन दिनों लेखन में खासकर साहित्य में ये देखा जा रहा है कि हम उन अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल भी धड़ल्ले से कर रहे हैं जिसका एक सरल औऱ चर्चित पर्यायवाची हिंदी में मौजूद है. इस तरह से हो ये रहा है कि आने वाली पीढ़ी जो अभी सीखने की प्रक्रिया में है उसे हम हिंदी के उन शब्दों से दूर करते जा रहे हैं जो वो आसानी से जान सकते हैं. जिस तरह से बच्चे धीरे धीरे हिंदी की गिनती और बारहखड़ी बोलने में असहज होते जा रहे हैं वैसे ही धीरे धीरे वो शब्दों से भी दूर होते चले जाएगे और भविष्य में उनके पास उन सरल हिंदी शब्दों का अभाव हो जाएगा जो उनकी भाषा को समृद्ध कर सकते थे.

हिंदी फिल्मों का जाना माना नाम लेखक डॉ राही मासूम रजा अपनी किताब सिनेमा और संस्कृति में लिखते है कि - पंजाबी भाषा और पंजाबी साहित्य यह दोनों ही इस बात का सबूत हैं कि धर्म और भाषा में कोई दूरी या करीबी रिश्तेदारी नहीं है. पाकिस्तानी पंजाब का मुसलमान जो भाषा पढ़ता लिखता और बोलता है उसका नाम भी पंजाबी है. हिंदुस्तानी पंजाब का सिख जो भाषा लिखता पढ़ता और बोलता है वह भी पंजाबी है. मुसलमान पंजाबी भाषा को उर्दू में लिखता है, हिंदू पंजाबी को देवनागरी में लिखता है और सिख गुरुमुखी में.

अगर पंजाबी जो भाषा गुरुमुखी में लिखता है, हिंदू उसी को देवनागरी में लिखता है और कोई उसे उर्दू में लिखता है तो ऐसे ही अंग्रेजी को भी देवनागरी में लिखा जा सकता है. वैसे भी हमने अंग्रेजी सहित न जाने कितनी भाषाओं के शब्दों को हिंदी में समाहित किया जाता रहा है.

डॉ. रजा लिखते हैं कि 'हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने के लिए सौ बरस तो दीजिए और जब तक के लिए या सारी हिंदुस्तानी लिपियों में लिखी जाने वाली हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाइये या देवनागरी को राष्ट्रलिपि कहिए औऱ भारत की सारी भाषाएं एक लिपि में लिखिए, लोगों को पास आने के लिए एक सड़क तो देनी होगी. यदि देश की सारी भाषाएं एक लिपि में लिखी जाने लगेंगी तो भाषाओं को और उनके भाषियों को घुलने मिलने का मौका मिलेगा. शब्दों का लेन देन होगा और यूं सौ सवा सौ बरस में एक राष्ट्रभाषा उग आएगी. इस नई भाषा का नाम गांधी जी पहले ही रख गए थे 'हिंदुस्तानी'.

तब तक सिनेमा गढ़ने वाले थोड़ा हिंदी पढ़ना सीखें और मैकबैथ, हैदर, लुटेरा, थ्री इडियट्स, टू स्टेट्स के साथ कभी हिंदी के साहित्य की गली में भी चक्कर लगाएं यहां भी बनने लायक बहुत कुछ है. और साहित्य गढ़ने वाले भी यह सोचें की जो वो गढ़ रहे हैं उसमें भारत तभी आयेगा जब वो यहीं की सोच के साथ यहां के अंदाज़ में रचा गया होगा. यहां ये सोचने की भी ज़रूरत है कि कही वो सहज होने के चक्कर में सपाट तो नहीं होता जा रहे हैं.

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)