डियर जिंदगी: हमारा ‘रिमोट’ किसके पास है!

हम भारतीय संवाद से अधिक गुस्‍से की ओर बढ़ रहे हैं. पहले संयुक्‍त परिवार, उसके बाद अब एकल परिवार और अब एकल के बाद ‘सेल्‍फ’. यानी मैं. मैं यानी ऐसी दुनिया जिसमें दूसरे के लिए कोई जगह नहीं.

Dayashankar Mishra दयाशंकर मिश्र | Updated: Feb 7, 2018, 04:12 PM IST
डियर जिंदगी: हमारा ‘रिमोट’ किसके पास है!

बीते दो दशक में भारतीय जनजीवन में खासे बदलाव हुए हैं. जिंदगी की गति, गुणवत्‍ता हमारी समझ और अपेक्षा के मुकाबले कहीं अधिक तेजी से परिवर्तित हो रही है. इस पर हमारा नियंत्रण होते हुए भी नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे टीवी का रिमोट हमारे हाथ में है, इस नाते तो टीवी देखना और न देखना दोनों हमारे वश में होना चाहिए था लेकिन व्‍यवहार में ऐसा नहीं है. टीवी का रिमोट हमारे इशारे पर चलने की जगह खुद टीवी के इशारों पर चल रहा है. घर पहुंचते ही और जो घर पर हैं उनका नियंत्रण टीवी अपने हाथ में ले लेता है. हम खुद को उसके बनाए प्रोग्राम के हिसाब से ‘ट्यून’ कर रहे हैं.

ठीक यही बात बीते दो दशक में हमारे जनजीवन में आए बदलाव के बारे में तय हो रही है. हर ओर परिवर्तन हो रहे हैं. सामाजिक, आर्थिक हैसियत में बड़े बदलाव के साथ गांव से शहरों और शहरों से महानगरों की ओर पलायन तीव्रता से बढ़ा है. एक समाज के रूप में अवसरों की समानता में उत्‍पन्‍न अंतर ने एक-दूसरे से व्‍यवहार और रहन-सहन के तौर-तरीकों पर गहरा असर डाला है. इसमें एक और बड़ी वजह है, हमारे समाज का सरकारी नौकरियों से निजी नौकरियों की ओर जाना. सरकार धीरे-धीरे खुद रोजगार देने से पीछे हटती जा रही है.

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इस बात का सीधा असर लोगों के सोचने-समझने और व्‍यवहार करने करने पर पड़ा है. पहले सरकारी नौकरी लोगों के भीतर स्‍थायित्‍व, सुरक्षा का भाव रखती थी. इसका उनके स्‍वभाव और जीवन की गुणवत्‍ता पर खासा सकारात्‍मक प्रभाव था. जो अब निजी क्षेत्र की ओर जाने और वहां मौजूद अनिश्चितता के कारण उल्‍टे प्रभाव भी पैदा कर रहा है. इस बीच समाज में एक-दूसरे की नकल, बाजार के कारण बचत की जगह व्‍यय की जीवनशैली अपनाने की आदत ने नए खतरे पैदा कर दिए हैं. अब खर्चे देखते ही देखते हमारी आय से बाहर हो रहे हैं. जहां क्रेडिट कार्ड अपनी बांह फैलाए खड़े हैं. मित्र का लबादा ओढ़े. लबादा ओढ़ने से कोई मित्र नहीं हो जाता. इसलिए इन कार्डों के जाल में हम तीव्रता से उलझ और झुलस रहे हैं.       

जिस तेजी से हमारे आसपास हिंसा, गुस्‍सा और आत्‍महत्‍या बढ़ रही है. उसमें इन कारणों का प्रभाव सबसे अधिक है. हम एक समाज के रूप में हर दिन और अधिक दुखी होने की ओर बढ़ रहे हैं. हमारा अपने ऊपर से नियंत्रण कम होते जाना एक खतरनाक संकेत है, उस खतरे का जो आने ही वाला है.

युवा अपने सपनों से माता-पिता को बाहर का रास्‍ता दिखा रहे हैं तो माता-पिता अपने विचारों से इंच भर भी डिगने को राजी नहीं दिखते. स्‍वतंत्र होने की चाह का अर्थ स्‍वच्छंद होना नहीं है. हम स्‍वतंत्र होने की चाह लिए हर दिन और अधिक स्‍वच्छंद हुए जा रहे हैं.

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अमेरिकन और यूरोपियन समाज की जीवनशैली और सोच-समझ भौतिक से उस आध्‍यात्‍मिक मोड़ की ओर जा रही है, जहां कभी हम थे. हम एक संतुष्‍ट और प्रेम समाज थे. हमारी व्‍यवस्‍था में भी बड़ी खामियां थी और हैं. लेकिन उसके बाद भी प्रेम और संतोष हमारा स्‍थायी भाव था. एक-दूसरे के लिए कष्‍ट सहना और एक-दूसरे के साथ रहना हमारी जीवनशौली का अहम हिस्‍सा था. जिसमें खतरनाक बदलाव होते जा रहे हैं.

हम भारतीय संवाद से अधिक गुस्‍से की ओर बढ़ रहे हैं. पहले संयुक्‍त परिवार, उसके बाद अब एकल परिवार और अब एकल के बाद ‘सेल्‍फ’. यानी मैं. मैं यानी ऐसी दुनिया जिसमें दूसरे के लिए कोई जगह नहीं. सबकुछ बस मेरी और बस मेरी चाहतों के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है. यह मैं और मेरा ही प्रेम के सिमटने का सबसे बड़ा कारण बन रहा है. अपने से प्रेम में कोई खामी नहीं लेकिन अगर उसमें दूसरों के लिए कुछ नहीं होगा तो वह प्रेम, प्रेम नहीं शुगर बन जाएगा. जो शरीर को नुकसान के अतिरिक्‍त कुछ नहीं देती. जैसे शुगर हमारे भीतर ही बनती है, जिसके अनेक कारण होते हैं. लेकिन उसमें से एक समय पर अपने ही शरीर में हो रहे परिवर्तनों की अनदेखी भी होती है. जिसकी बाद में कीमत चुकानी होती है, ठीक वैसा ही प्रेम के बारे में है. इसके प्रति पर्याप्‍त सजगता के साथ समर्पण, स्‍नेह जरूरी है, अन्‍यथा जीवन की नदी बहुत जल्‍द सूख जाएगी.

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