डियर जिंदगी : 'चीजों' की जगह अनुभव चुनिए...

समाज में शिक्षा की कमी के कारण सबसे अधिक ज़ोर ख़रीदने पर है. इस ख़रीदारी की जड़ में इच्‍छा से कहीं अधिक आरोपित चाहत और तुलना होती है.

डियर जिंदगी : 'चीजों' की जगह अनुभव चुनिए...

बाज़ार में नया क्‍या है! अख़बार, वेबसाइट ऐसी ख़बरों से लदे पड़े हैं. यह ख़रीदने पर वह मुफ़्त मिलेगा. दुनिया के अन्‍य देशों के मुक़ाबले भारत में मुफ़्त के प्रति आकर्षण कहीं ज़्यादा नज़र आता है. हम एक इच्‍छा के पूरी होने से पहले ही दूसरी इच्‍छा पर 'जंप' कर जाते हैं. इसे मन का भागना, मन का कहीं न टिकना भी कहा जा सकता है. सभी अख़बारों में इस तरह के कॉलम आ रहे हैं, जहां विशेषज्ञ बताते हैं कि क्‍या ख़रीदना सही है, क्‍या नहीं. कर्ज़ कितना लिया जाए/ न लिया जाए. सलाह मांगने में कोई बुराई नहीं, बशर्ते आपको पता हो कि जीवन में इसे कितना स्‍वीकार करना है.

समाज में शिक्षा की कमी के कारण सबसे अधिक ज़ोर ख़रीदने पर है. इस ख़रीदारी की जड़ में इच्‍छा से कहीं अधिक आरोपित चाहत और तुलना होती है. हम हमेशा दूसरे के साथ तुलना में रहते हैं. वह ऐसा कर रहा है! हम कब वैसा कर पाएंगे! हम उसके जैसा जीवन कब जी पाएंगे. कभी हमें उसके जैसा जीवन मिलेगा!

डियर जिंदगी: मेरी अनुमति के बिना आप मुझे दुखी नहीं कर सकते!

तुलना का तत्‍व हमारे अंतर्मन में गहरे धंस गया है. मैं जिन्‍हें जानता हूं उनमें से मुश्किल से दो लोगों के बारे में ही विश्‍वासपूर्वक कह सकता हूं कि मैंने इन्‍हें कभी तुलना के जंगल में राह भटकते हुए नहीं पाया. अपनी ओर देखने की जगह हर कोई तुलना के बोझ से दबा जा रहा है. इसके भार से मन, विचार, चिंतन की रीढ़ झुकी जा रही है. जो अपनी चेतना में सिमटा है. जिसे 'स्‍व' का ज्ञान है, वह तनाव में कभी नहीं उलझता.
  
हम ज़रूरत और आरोपित ज़रूरत के बीच उलझकर रह गए हैं. ज़रूरतों के बीच फंसे, उलझे समाज. हमारा चिंतन ज़रूरत, ख़रीदारी से आगे ही नहीं बढ़ पाता. हम समझ ही नहीं पाते कि हमारे पास इसके अलावा कोई और काम बचा है. हम कभी ख़रीदने में उलझे हैं तो कभी बेचने में. नहीं तो इस ख़रीद-फ़रोख्‍त की योजना बनाने में व्‍यस्‍त हैं. मेरा अनुरोध बस इतना है कि आपको चीज़ो से अधिक महत्‍व अनुभव को देना चाहिए. आपको ग़ैरज़रूरी चीज़ो में उलझने की जगह कुछ नया सीखने, समझने और यात्राएं करने की ज़रूरत है.

डियर जिंदगी: सब 'मन' का होता है कभी!

उदाहरण के रूप में इसे ऐसे समझिए कि भारतीय अक्‍सर कहते हैं कि यूरोप-अमेरिका विलासी, उपभोग की संस्कृति वाले देश हैं. भौतिकतावाद में उलझे हैं. यह धारणा इसलिए भी बनी, क्‍योंकि वहां सबसे ज़्यादा आविष्‍कार होते हैं. ज़ाहिर है वह पहले उपयोगकर्ता हैं. चीज़ो को ख़रीदने, उपयोग करने में सबसे आगे हैं, लेकिन इसके साथ ही हम भूल जाते हैं कि यूरोप, अमेरिका और ब्रिटेन भारतीयों की तुलना में कहीं अधिक यात्रा करने वाले देश हैं. इन देशों के नागरिक भारत ही नहीं एशिया के मुक़ाबले कहीं अधिक समय और धन यात्रा पर ख़र्च करते हैं. यहां कॉलेज से लेकर करियर बना चुके लोग तक जमकर यात्राएं करते हैं. वह यात्रा के दौरान आपको सामान्‍य चीज़ो से गुजारा करते हुए, मुश्किलों से लड़ते हुए मिल जाएंगे. किताबें पढ़ते हुए मिल जाएंगे और ख़रीदते हुए मिल जाएंगे.

दूसरी ओर हम, भारतीय. यात्रा करने, पढ़ने और किताबें ख़रीदने के साथ थि‍एटर जैसी चीज़ो से दूर भागते जा रहे हैं. हमने धन का उपयोगकर्ता बनने की जगह उसे अपना स्‍वामी बना लिया है. हम उसे छूट दे रहे हैं कि वह अपने हिसाब से हमारा उपयोग करे. यह तो उल्‍टी गंगा बहाने जैसा है. क्‍या आप अपने कंप्‍यूटर को यह छूट देते हैं कि वह अपनी मर्ज़ी से आपकी ओर से कमांड देना शुरू कर दे. आप उसे कमांड देते हैं कि आपकी इच्‍छा से चले.

लेकिन ज़िंदगी में हम उल्‍टा कर रहे हैं. हम जीवन के मूल अर्थ यात्रा, नवीनता, अध्‍ययन, चिंतन और संवाद से हर दिन दूर भागते जा रहे हैं. जबकि इनसे ही तो हम अनुभवी बनते हैं. हमारे भीतर अनुभव का संसार समृद्ध बनता है. जो हमारी चेतना को अंतर्द्वंद से मुक्‍त करने और निर्णय लेने में सक्षम बनाने का काम करता है.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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