डियर जिंदगी : हम चाहते क्‍या हैं…

ऐसे युवाओं की संख्या बड़ी है, जिनमें पनप रही चाहत ही स्‍पष्‍ट नहीं है, उस पर आकर्षण के जाले लगे हैं! मैं बड़ी संख्‍या में ऐसे युवाओं से मिलता रहता हूं जो कहते हैं कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन जैसे ही आप काम बताते हैं वह अपनें ‘कंफर्ट जोन’ में चले जाते हैं.

डियर जिंदगी : हम चाहते क्‍या हैं…

पहली नजर में अपनी चाहतों को बताना कितना आसान लगता है. क्‍योंकि हमें लगता है कि यह सब कितना स्‍पष्‍ट है. काश! यह इतना सरल हो जाता. हममें से कितने लोग जानते हैं कि वह क्‍या चाहते हैं. अधिकांश लोग इस असमंजस में लगे रहते हैं कि उनकी चाहतें क्‍या हैं. जिसकी चाहत साफ है, उसकी दुनिया में कम से कम तनाव होगा.

आज जिस गति से भारत समेत पूरी दुनिया में तनाव बढ़ रहा है, उसका कारण यही है कि हमारी चाहतें स्‍पष्‍ट नहीं हैं. हम चाहते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं. जीते कुछ और हैं, सांसों में धड़कता कुछ और है. इधर कुछ दिनों से कोलकाता में था.

आज सुबह, मुंबई के लिए निकलने के दौरान एयरपोर्ट पर मेरी मुलाकात एक युवा लेखक से हुई. मध्‍यमवर्गीय परिवार से आने वाला यह युवा मुझे अपने सपनों को लेकर जितना साफ लगा, उतना हममे से बहुत कम लोग होते हैं.

वल्‍लभ चौधरी नाम के इस युवा ने बताया कि उसने अभी कुछ रोज पहले ही एक मल्‍टीनेशनल कंपनी में अपनी सीमित, लेकिन नियमित आय वाली नौकरी छोड़ दी है,‍ जबकि उसके पास अब तक नियमित आय का कोई साधन नहीं है. उसे अपने परिवार से भी कोई खास मदद नहीं मिलती है. ऐसे में जाहिर है, मैंने भी चिंता जताते हुए कहा कि कैसे वह परिवार का भरण पोषण कर पाएगा. उसके बाद जो उसने बताया. उस हौसले की हम सबको दरकार है.

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हम सबकुछ चाहते हैं. नाम, प्रतिष्‍ठा और मन का काम भी. लेकिन इनके लिए अलग-अलग कीमतें चुकानी होती हैं, वह मूल्‍य कोई नहीं अदा करना चाहता. और बिना मूल्‍य चुकाए हम कभी भी अपने सपने को हासिल नहीं कर सकते. हमारी चाहतों और हमारे प्रयासों में अक्‍सर कोई तालमेल नहीं होता.

यह कुछ कुछ ऐसा ही है, मानों एक युवा क्रिकेटर बनना चाहता है, लेकिन वह क्रिकेट के मैदान तक नहीं जाना चाहता, क्‍योंकि वह उसके घर से दूर है. वह सुबह नहीं उठ सकता क्‍योंकि उसे देर तक सोना पसंद है. इस तरह वह सपना तो कुछ और पाले हुए है लेकिन बनना कुछ और चाहता है. कुछ दिन बाद वह कहीं नौकरी कर लेता है क्‍योंकि वह खतरा नहीं उठाना चाहता है, पता नहीं कभी क्रिकेटर बन भी पाएगा कि नहीं, वैसे भी हम सबको पता ही है कि क्रिकेटर बनना बहुत ही मुश्किल है. पता है, न!

अधिकांश भारतीयों का अपनी चाहतों को लेकर ऐसा ही रवैया देखने को मिलता है. ऊपर से लोग अपने पक्ष में आजीवन इतने बहानों का साथ लिए टहलते रहते हैं कि आपके किसी जरा से तर्क से उनकी भावनाएं आहत हो जाती हैं.

वल्‍लभ ने बताया कि वह आठ बरस से एक ऐसी नौकरी में थे, जहां पढ़ने-लिखने के अवसर बहुत ही कम थे. वहां कोई इस बारे में बात करने को भी तैयार नहीं होता था. जबकि वल्‍लभ तो दुनिया देखना चाहते हैं. पुस्‍तक मेलों, पढ़ने, यात्रा और अपनी लेखनी को समय देना चाहते हैं. इसलिए, जब एक दिन उनके दोस्‍त ने कहा कि वह उनको एक ऐसी नौकरी दिलाने में मदद करेगा, जिससे उनको इस नौकरी से आधे पैसे मिलेंगे, लेकिन काम वल्‍लभ की पसंद का होगा तो उन्‍होंने तुरंत हां कर दी. परिवार में कुछ समर्थन और कुछ डर के बाद भी वल्‍लभ अपने रास्‍ते पर निकल पड़े हैं.

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उन्‍होंने कहा, 'अभी मैं तीस बरस का हो गया हूं, अगर अब अपने सपने के पीछे नहीं दौड़ा तो कभी नहीं दौड़ पाऊंगा.' उन्‍होंने यह भी बताया कि पुरानी नौकरी से मिले कुछ पैसे से उनके पास लगभग दो साल का फंड है, मूल जरूरतों को पूरा करने के लिए.

इसलिए, वह निकल पड़े हैं, खुद पर दांव लगाने के लिए. दो बरस इस युवा ने पूरी ईमानदारी से अपनी जिंदगी को देने का फैसला किया है. वल्‍लभ ने अपनी जरूरतें एकदम सीमित रखी हैं, वह दूसरों के जैसे दिखने की जगह, अपनी चाहतों जैसा बनने की फिलासफी में यकीन रखते हैं.

घर-परिवार एकदम साधारण आर्थिक स्थिति वाला होने के बाद भी, उनकी सोच मे कहीं शिकायत नहीं है. वह प्रयासों की गहराई और निष्‍ठा पर सबसे अधिक ध्‍यान केंद्रित करते हैं.

दूसरी ओर अगर बड़ी संख्‍या में युवाओं में पनप रही चाहत ही स्‍पष्‍ट नहीं है, उस पर आकर्षण के जाले लगे हैं! मैं बड़ी संख्‍या में ऐसे युवाओं से मिलता रहता हूं जो कहते हैं कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन जैसे ही आप काम बताते हैं वह अपनें ‘कंफर्ट जोन’ में चले जाते हैं. हमेशा ध्‍यान रखना चाहिए कि हमें जो कुछ भी जिंदगी में हासिल हुआ है, वह ‘कंफर्ट जोन’ से निकलकर हासिल हुआ है, वहां रहकर नहीं! जब तक हम सपनों के पीछे वल्‍लभ की तरह नहीं जाएंगे, बात नहीं बनने वाली!

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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