बच्‍चों की आत्‍महत्‍या : 'दूसरे' के सपनों का संकट

जब आप दुनिया के महानतम लेखकों, वैज्ञानिकों , संगीतज्ञों , अविष्‍कारकों के बारे में पढ़ते हैं, तो आप इस बात से  असहमत नहीं हो सकते. यह सूची असल में एक ठोस दस्‍तावेज है. जिसमें किसी को मिली कामयाबी में उसकी प्रतिभा जितना योगदान ही उस संकल्‍प का था, जिस पर बच्‍चा परिवार मित्रों के सहयोग से टिक सका. ऐसे परिवार जिनने उसे 'नई' राह चुनने का हौसला दिया. 

बच्‍चों की आत्‍महत्‍या : 'दूसरे' के सपनों का संकट

मध्य प्रदेश में दसवीं और बारहवीं के नतीजे आने के कुछ घंटे बाद ही इस साल भी बच्‍चों की आत्‍महत्‍या की खबरें सामने आने लगीं. इसी तरह के दूसरे मामले अन्‍य राज्‍यों में देखे जा रहे हैं. कुल मिलाकर परीक्षा परिणाम और आत्‍महत्‍या के बीच एक किस्‍म का सह-संबंध दिख रहा है. बच्‍चों के दिमाग में परीक्षा का डर इतना ज्‍यादा घर कर गया है कि स्‍कूल में मिलने वाली काउंसिलिंग, दोस्‍तों की ओर से मिल रहा सहयोग बहुत कम पड़ रहा है.

बच्‍चों के लिए सारे संकट सहने को तैयार, उनके लिए अपने सुखों को भुलाने वाले माता-पिता यह भूल रहे हैं कि जैसे-जैसे समय बदल रहा है. हवा , पानी, जलवायु बदल रही है. बच्‍चों के सोचने समझने की शक्ति के साथ निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ रही है. इसका सबसे बड़ा कारण बच्‍चों का बढ़ता एक्‍सपोजर है. वह अभिभावकों के मुकाबले कहीं अधिक तेज़ी से  चीजें सीख, समझ रहे हैं. लेकिन वह अपने माता-पिता के जैसी  'सोच' वाले नहीं है.

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आज जो बच्‍चे नौवीं से बारहवीं के बीच पढ़ रहे हैं, वह अपने माता-पिता के सपनों को अपने पंखों पर ढोने को तैयार नहीं दिखते. यह एक दशक पहले से एकदम उल्‍टी स्थिति है. तब बच्‍चों को क्‍या करना चाहिए, यह माता-पिता तय करते थे. वही बच्‍चों को सपने दिखाते. शिक्षक, इंजीनियर, आईएएस के साथ जो सही समझते, बच्‍चों को बचपन से वह बनने के लिए प्रेरित और बहुत हद तक विवश करते थे. इसलिए पहले आत्‍महत्‍या के जो मामले आते थे, वह थोड़ी बड़ी उम्र में आते थे, जब युवा को यह महसूस होता था कि अरे! मेरे सपने का क्‍या! मैं तो फोटोग्राफर बनना चाहता हूं कि लेकिन पिता हैं कि इंजीनियर बनाने पर आमादा हैं.

माहौल बदल गया, बच्‍चे अपने समने जल्‍दी बुनने लगे. उनके सामने पहले से कहीं अधिक विकल्‍प हैं. जब तब माता-पिता को समझ आता है, बच्‍चा एक हैंगओवर से निकल कर(इसे निराश होकर पढ़ा जाए) दूसरे की ओर निकल जाता है. जब तक परिवार इस बात को समझ पता है वह असल में अनेक रास्‍तों को टटोलने में लगा होता है. अब बच्‍चे ऐसे ही तैयार हो रहे हैं. आने वाले समय में संभवत: बच्‍चे इस बात से ही इंकार कर दें कि वह केवल वही चीजें पढ़ेंगे, करेंगे, जिनमें उनकी गहरी रुचि होगी. 

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जब आप दुनिया के महानतम लेखकों, वैज्ञानिकों, संगीतज्ञों, अविष्‍कारकों के बारे में पढ़ते हैं, तो आप इस बात से  असहमत नहीं हो सकते. यह सूची असल में एक ठोस दस्‍तावेज है. जिसमें किसी को मिली कामयाबी में उसकी प्रतिभा जितना योगदान ही उस संकल्‍प का था, जिस पर बच्‍चा परिवार मित्रों के सहयोग से टिक सका. ऐसे परिवार जिनने उसे 'नई' राह चुनने का हौसला दिया. 

अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन, थॉमस अल्‍वा एडीसन, चार्ली चैप्लिन, रवींद्रनाथ टैगोर, महात्‍मा गांधी से लेकर बिल गेटस, स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग तक  का जीवन ठोस प्रमाण है कि जिंदगी को स्‍कूल की सफलता से जितना दूर रखा गया, उस जीवन ने जिंदगी में उतनी ही सुंगध बिखेरी. इसके साथ ही यह भी कि अगर बच्‍चा स्‍कूल में अच्‍छा नहीं कर पा रहा तो यह स्‍कूल ठीक न होने का भी मामला हो सकता है. गलती अक्‍सर बच्‍चे से अधिक स्‍कूल की होती है. इस बात को समझना बच्‍चों की सेहद, जिंदगी के लिए बेहद जरूरी है. 

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इसके साथ यह भी कि अभिभावकों का समझें कि 'बच्‍चे आपका सपना पूरा करने के लिए नहीं हैं. आपके सपने पूरे करना उनकी जिम्‍मेदारी नहीं. यह आपका काम है. इसलिए अपने सपने का बोझ उसके नाजुक कंधों पर मत लादिए. उसे अपनी जिंदगी, सपने बुनने का अधिकार दीजिए.'

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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