डियर जिंदगी : 'मौन' को देखा है!

एक दशक पहले तक 'मौन' खूबसूरत, महत्‍वपूर्ण गुण था. मौन हमारे समाज, चिंतन प्रक्रिया का अहम हिस्‍सा था. मौन में अकेला अवकाश ही नहीं है, जो हमें भीतर से ऊर्जा देता था. बल्कि हमें उन गैरजरूरी चीजों में उलझने से रोकता है, जो हमारी क्षमता, ऊर्जा और स्‍नेह को सोख लेती हैं.

डियर जिंदगी :  'मौन' को देखा है!

यह शोर का समय है. जिसमें आपसे हर बात में उम्‍मीद की जाती है कि आप प्रकट करें. कोई बिना कहे, सुनना नहीं चाहता. कोई बिना सुने समझना नहीं चाहता. सब एक-दूसरे की देखा-देखी इतने एक-दूसरे जैसे हो गए हैं कि उनमें भेद करना असंभव जैसा हो गया. यह कुछ ऐसा है कि कुछ की देखा-देखी सबने मास्‍क पहन लिए और अब सबका मूल चेहरा ही गुम हो गया. हर कोई मास्‍क पहने जो मर्जी हो करने में जुट गया, क्‍योंकि उसने यह मान लिया कि उसकी पहचान तक कोई पहुंच नहीं रहा. ऐसा करते-करते हम एक नकली विचार और नकल की दौड़ में शामिल हो गए. जिसका हासिल बस 'शोर' है.

हमारे महसूस करने की क्षमता 'सेल्‍फी' के साथ शुरू होती है और 'लाइक' पर समाप्‍त हो जाती है. हम अच्‍छे भले रिश्‍तों, समाज के साथ साझेदारी और एक-दूसरे के स्‍नेह का साथ छोड़ते जा रहे हैं.

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महसूस करने की क्षमता, किसी भावना के हृदय तक पहुंचने की सामान्‍य भावना से हम दूर निकलते जा रहे हैं. हर चीज को हम वैसे ही करने को पागल हुए जा रहे हैं, जैसे दूसरे करते हैं. क्‍योंकि बहुसंख्‍य क्रिया को ही हम महत्‍व दे रहे हैं. उसे ही मूल्‍यवान मान रहे हैं. उसके अतिरिक्‍त किसी का कोई और मूल्‍य नहीं है.

एक दशक पहले तक 'मौन' खूबसूरत, महत्‍वपूर्ण गुण था. मौन हमारे समाज, चिंतन प्रक्रिया का अहम हिस्‍सा था. मौन में अकेला अवकाश ही नहीं है, जो हमें भीतर से ऊर्जा देता था. बल्कि हमें उन गैरजरूरी चीजों में उलझने से रोकता है, जो हमारी क्षमता, ऊर्जा और स्‍नेह को सोख लेती हैं. हमने एक अकेले मौन को खोकर उससे जुड़ी न जाने कितनी चीजों को अपने से दूर कर दिया है.

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हमारे भीतर व्‍यक्‍त करने की व्‍यग्रता इतनी बढ़ गई कि अब हमारा सारा ध्‍यान बोलने पर है. हम भाषण को इतना अधिक महत्‍व दे रहे हैं कि श्रवण पर से हमारा ध्‍यान ही भंग हो गया है. जब हर कोई भाषण देने पर उतर आएगा तो सुनेगा कौन. सुनने के लिए हम समाज कहां से लाएंगे. किसी से बात करिए तो कोई सुनने को ही तैयार नहीं. हर कोई बस सुनाना चाहता है. बताना चाहता है. क्‍योंकि उसके भीतर का मौन समाप्‍त हो गया है. मौन को हमने धीरे-धीरे जीवन से उतार दिया है. उसकी जगह बस 'कहने' का गुण हमने धारण कर लिया है.

इससे ही जीवन गुस्‍से, अहंकार और तनाव की फैक्‍ट्री में बदल गया है. मौन के साथ कोमलता, सहृदयता और स्‍नेह हमेशा चलते हैं. जैसे ही मौन को हमने न कहा, इनमें से दूसरे भी हमसे दूर हो गए. इसलिए जितना संभव हो, मौन के पास लौटिए. उसके पास हमारे अनेक अनुत्तरित प्रश्‍नों के हल पड़े हैं...

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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