डियर जिंदगी: आत्‍मीयता कहां है…

नदी कितनी भी विशाल, सदाबहार क्‍यों न हो, उसमें ज्‍यादा तटबंध उसके पानी, गति को सोख लेते हैं. वह कुछ बरसों में थकने, थमने लगती है. प्रेम का भी ऐसा ही रिश्‍ता जीवन से है.

डियर जिंदगी: आत्‍मीयता कहां है…

मैंने उनसे पूछा, बाकी लोग कैसे हैं. तुम अपने शहर गए तो किनसे-किनसे मिलना हुआ. उन्‍होंने कहा, तुम्‍हें तो पता ही है. समय कहां मिलता है. घर-परिवार में ही उलझा रहता हूं. उसके बाद मैंने कहा, अच्‍छा परिवार में किस-किस से मिलना हुआ. क्‍योंकि मैं तो सबको जानता हूं. उन्होंने कहा, अरे! घर में ही उलझा रहा, रिश्‍तेदार और दोस्‍त तो बहुत दूर रहते हैं. कहां सबसे मिलना हो पाता है.

मैं और मेरे यह दोस्‍त एक ऐसे शहर भोपाल से आते हैं, जहां बड़ी आसानी से एक घंटे के भीतर एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचा जा सकता है. तो इन साहब ने कुछ नहीं किया. यह कभी कुछ नहीं करते. बस शिकायत करते हैं, जाहिर है, शिकायतें प्रेम को निगल जाती हैं. तो इनके संबंध भी अपने ही बचपन के दोस्‍तों और रिश्‍तेदारों से बेहद औपचारिक मुस्‍कान पर सिमट गए हैं.

नदी कितनी भी विशाल, सदाबहार क्‍यों न हो, उसमें ज्‍यादा तटबंध उसके पानी, गति को सोख लेते हैं. वह कुछ बरसों में थकने, थमने लगती है. प्रेम का भी ऐसा ही रिश्‍ता जीवन से है. संबंध कितने ही गहरे, मीठे और स्‍ने‍हिल क्‍यों न हों, अगर उनमें स्‍नेह का निवेश, ऊष्‍मा नहीं होगी, उनका जीवन छोटा होता जाएगा.

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जब यह सज्‍जन किसी से नहीं मिलते. यहां किसी कोई और नहीं वह सब हैं, जिनसे उनके जीवन की यादें, संवाद रहे हैं तो कौन उनसे मिलेगा. और वही आए दिन कहते हैं कि कैसा समय आ गया है, कोई किसी से मिलता ही नहीं. प्रेम खत्‍म होता जा रहा है. दुनिया कैसे रंग में रंगती जा रही है.

ऐसा कहते हुए वह और उनके जैसे लोग भूल जाते हैं कि जब दुनिया के रंगरेज आप जैसे ही हो जाएंगे तो दुनिया का रंग वही तो होगा, जो आपका है!

प्रेम, स्‍नेह और आत्‍मीयता किसी जंगल के फूल नहीं हैं. जो अपने आप उग जाएंगे, खिल जाएंगे और हम उन्‍हें चुनकर जिंदगी में रंग भर लेंगे. यह तो ऐसे फूल हैं, जिन्‍हें अपने ही ‘गमले’ में उगाना होता है, उनका भरपूर ख्‍याल रखना होता है, तब कहीं जाकर वह खुशबू बिखेरते हैं.

हम बचपन में भोपाल में एक बेहद छोटे से मकान में किराए से रहते थे. हमारे घर जितने लोग (आप उन्‍हें मेहमान भी कह सकते हैं) महीने में आते थे, उतने मेरे पड़ोसियों, दोस्‍तों के घर सालभर में भी नहीं आते थे. कई बार जब हम अपने पिता से इस बात की शिकायत करते तो वह कहते, यहां नहीं आएंगे तो कहां जाएंगे. इस शहर में वह केवल मुझे ही जानते हैं. इसलिए यहीं आएंगे. कुछ ही दिन की बात है, जैसे ही उन्‍हें काम मिलेगा, वह अपने घर चले जाएंगे. जब हम उनसे कहते, आप ही उनकी मदद क्‍यों करते हो. तो वह कहते, इसलिए क्‍योंकि किसी ने ऐसे ही एक दिन मेरी मदद की थी.

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यह आत्‍मीयता की पहली और प्राथमिक पाठशाला थी. आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि अपने उन दिनों के दोस्‍तों और पड़ोसियों के बच्‍चों के मुकाबले मुझे हर हाल में समायोजित होने का जो गुण मिला वह उसी परवरिश का हिस्‍सा था. उसी आत्‍मीयता का हिस्‍सा था. इसे पिता ने किसी उपदेश से नहीं, खुद कष्‍ट सहकर सिखाया था.

आत्‍मीयता के फूल ऐसे ही होते हैं. वह ऐसे ही पैदा किए जाते हैं. आगे चलकर जीवन में पिताजी के सोचे कोई काम कभी नहीं रुके, जिंदगी की हर मुश्किल आज भी वह मुस्‍कुराते हुए आसान कर देते हैं. क्‍योंकि उन्‍होंने प्रेम, स्‍नेह और आत्‍मीयता की वह फसल लगाई है, जिसकी खुशबू रास्‍तों के कांटे मिटाते चलती है.

दूसरों की मदद करने, उनके जीवन में कुछ योगदान देने की ललक एक गुण है. यह सबके पास नहीं होता. लोग चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाते. इसलिए यह समझना और जानना बहुत जरूरी है कि अगर आप चाहते हैं कि आपके आसपास प्रेम, स्‍नेह बिखरा रहे तो सबसे पहले इसकी पहल आपको करनी होगी. इसका कोई दूसरा रास्‍ता नहीं है.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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