डियर जिंदगी: 'अहिंसक' प्रेम की ओर!

प्रेम को संभालने, सहेजने जैसे प्रचलित मुहावरों के फेर में मत पड़िए. प्रेम कोई कैदी नहीं जिसके लिए जेल की जरूरत हो. प्रेम कोई बाग नहीं जिसके लिए माली की जरूरत हो. प्रेम केवल वह नदी है, जिसमें हर किसी के लिए स्‍नेह है.

डियर जिंदगी: 'अहिंसक' प्रेम की ओर!

प्रेम के साथ हिंसा! पढ़ने, सुनने में बात अजीब लगती है, लेकिन यह उतनी ही सच है, जितना प्रेम. प्रेम में हिंसा की मिलावट उतनी ही सरल है, जितनी दूध में पानी की. जैसी किसी भी निर्मल चीज़ में दूषित तत्‍व की. प्रेम, अंतरिक्ष विज्ञान नहीं है, जिसमें किसी गड़बड़झाले के लिए विशेषज्ञता की जरूरत हो. प्रेम दुनिया में सबसे आसानी से सुलभ होनी वाली भावना है. जो एक-दूसरे तक बिना किसी बाधा के यात्रा कर सकती है. बशर्ते उस यात्रा का सफर रोका न जाए. यात्रा में स्‍पीडब्रेकर नहीं चाहिए. पहरेदार तो बिल्‍कुल नहीं चलेंगे.

हिंसा पहरेदारों के कारण होती है या पहरेदार हिंसा को विस्‍तार देते हैं. इसमें असहमति हो सकती है, लेकिन इतनी बात साफ है कि दोनों के बीच गहरा अंतर्संबंध है.

प्रेम-प्रेम के शोर के बीच प्रेम सहमकर किसी गली में गुम हो गया है. नारेबाजी, शोरगुल की यही सबसे बड़ी खासियत होती है कि मूल मुद्दा गायब हो जाता है. भीषण शोरगुल के बीच प्रेम के साथ भी वही हो रहा है, जो सरलता के साथ हुआ था. सरलता भी शोर के बीच गुम हो गई. अब सब कहते हैं, सरल बनो, सरस बनो. लेकिन मार्ग कहां है. सरलता बची कहां. उसकी उपलब्‍धता कहां है.

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प्रेम के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. स्‍नेह की छांव हटा हम मनुष्‍यता की फसल चाह रहे हैं. बचपन के सिर के ऊपर गुस्‍से का हाथ रख जीवन के आंगन में प्रेम का पाठ कर रहे हैं. संबंधों में विश्‍वास की मिट्टी हटा रेत भर रहे हैं. वादा और दावा प्रेम का कर रहे हैं...

यह 'अहिंसक' इश्‍क क्‍या है. हिंसा ने प्रेम पर अतिक्रमण कर लिया है. जिंदगी में बढ़ते तनाव ने हिंसा को अवसर दिया कि वह प्रेम में घुसपैठ कर सके. अब हमारा इश्‍क/प्रेम/मोहब्‍बत हिंसा की गहरी चपेट में है. इससे हिंसा को हटाना मुश्किल तो नहीं लेकिन कठिन जरूर है. उतना ही मुश्किल जितनी जिंदगी लेकिन उतना ही सरल भी जितनी जिंदगी. हम किस नजरिए से इसे समझते हैं, इससे ही सबकुछ तय होगा.

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कौन है जो प्रेम को हिंसक बनता है. हमारी अपेक्षा. तुलना और समझ की कमी. प्रेम जैसे ही मिलता है, खत्‍म हो जाता है. जैसे रोटी मिलते ही भूख. मिलने के अगले कदम पर प्रेम मिटता है. और मिटते ही असल यात्रा पर निकलता है. प्रेम अगर मिलकर मिटा नहीं तो चिंतित होने की जरूरत है. उसके लिए उपाय करना होगा! जिनका प्रेम मिटता नहीं वह अतृप्‍त रह जाते हैं. उनके ऊपर सबसे पहले क्रोध अपना घोंसला बनता है. उसके बाद वह अविश्‍वास, धोखे और झूठ के जंगल में भटक जाते हैं.

इसलिए प्रेम को संभालने, सहेजने जैसे प्रचलित मुहावरों के फेर में मत पड़िए. प्रेम कोई कैदी नहीं जिसके लिए जेल की जरूरत हो. प्रेम कोई बाग नहीं जिसके लिए माली की जरूरत हो. प्रेम केवल वह नदी है, जिसमें हर किसी के लिए स्‍नेह है. जैसे नदी अपने बारे में नहीं सोचती. वह तो नाविक और उसके साथ यात्रा करने वालों का ख्‍याल रखती है. वैसे ही प्रेम करने वाले बिना किसी अपेक्षा के दूसरों से बस प्रेम करते हैं. उसमें अपेक्षा और चाहत की बेड़ियां नहीं डालते.

जाते-जाते अमीर खुसरो को गुनते चलिए...
खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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