डियर जिंदगी : बुजुर्ग बोझ नहीं, आत्‍मा का अमृत हैं...

कृपया इसे उपदेश की तरह नहीं, चेतावनी की तरह पढ़ें. युवा हैं, तो भविष्‍य के खतरे की तरह, बुजुर्ग हैं तो बचाव के उपाय की तरह समझें. और किशोर हैं, तो अपनों को समझाने के लिए इसका उपयोग करें.

डियर जिंदगी :  बुजुर्ग बोझ नहीं, आत्‍मा का अमृत हैं...

कृपया इसे उपदेश की तरह नहीं, चेतावनी की तरह पढ़ें. युवा हैं, तो भविष्‍य के खतरे की तरह, बुजुर्ग हैं तो बचाव के उपाय की तरह समझें. और किशोर हैं, तो अपनों को समझाने के लिए इसका उपयोग करें.

भारत में बुजुर्गों को आशीर्वाद की तरह ग्रहण करने की परंपरा रही है. बहुत वक्‍त नहीं बीता जब हम विदेशों में बुजुर्गों को अलग घरों, जिन्‍हें हम 'ओल्‍ड एज होम' के नाम से जानते हैं, वहां ठूसने की खबरें पढ़कर इतराते थे. हम कहते, अरे! कैसा समाज है, वहां कैसे लोग रहते हैं. जिन्‍हें अपने मां-पिता का साथ इस कदर नापसंद है कि उन्‍हें कूड़ेदान (ओल्‍ड एज होम) में डंप कर देते हैं.

हमें शायद इस बात का अंदाजा नहीं था, यह सब हमारे देश में भी होने जा रहा है. आपको संजय दत्‍त और विद्या बालन की 'लगे रहो मुन्‍नाभाई' तो याद होगी न! इस कथा का बड़ा हिस्‍सा वह बुजुर्ग थे, जिन्‍हें खुशी के कथित केंद्र 'ओल्‍ड एज होम' में खुशी से रहते हुए दिखाया गया था. मैं 2006 में बुजुर्गों पर एक बड़ी चर्चित स्‍टोरी का सूत्रधार था. जिसके दो पक्ष थे. एक वह जिसमें ऐसे बुजुर्ग थे, जिन्‍होंने अपनी वसीयत बच्‍चों के नाम नहीं की थी. दूसरे वह जिन्‍होंने सबकुछ बच्‍चों के नाम कर दिया था. आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं, कि कौन सुखी रहा होगा. जाहिर है, वही जिन्‍होंने वसीयत नहीं की थी. यह शायद भारत में 'ओल्‍ड एज होम' की भोपाल जैसे पारंपरिक शहर में शुरुआत के दिन थे. तब आज की तरह खुलेआम शर्म से इन्‍हें वृद्धाश्रम नहीं कहा जाता था. बल्कि थोड़ा संकोच के साथ 'आनंदधाम'  जैसे डिजाइनर नामों से पुकारा जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है, अनेक शहरों में अब 'ओल्‍ड एज होम' में माता-पिता को रखना शर्म की बात नहीं है.

old age home lage raho munna bhai

आप सोच सकते हैं कि 'डिप्रेशन और आत्‍महत्‍या' के संवाद में हम इसकी चर्चा कहां करने लगे. इसकी चर्चा इसलिए क्‍योंकि हमारे पड़ोस तक यह संकट गंभीर हो गया है. यह एक किस्‍म का 'स्‍टेट ऑफ माइंड' है, जो संक्रमण की तरह फैलता है. दूसरे हमारे यहां भी आर्थ‍िक स्थितियां वहां से बहुत बेहतर नहीं हैं. हमारे यहां बुजुर्गों के लिए कोई पेंशन, मेडिकल प्‍लान नहीं है. वह यूरोप और अमेरिका की तरह सरकार की जिम्‍मेदारी का हिस्‍सा नहीं हैं. हालांकि अब अमेरिका में बुजुर्गों की मदद के लिए बना 'ओबामा केयर' खुद बड़ी मुश्किल में है.

हम इसकी चर्चा इसलिए कर रहे हैं, क्‍योंकि 'द इकोनॉमिस्‍ट' ने अपने एक लेख में हमारे पड़ोसी चीन और दुनियाभर में बुजुर्गों की स्थिति पर चिंताजनक रिपोर्ट दी है. जिसमें विस्‍तार से बताया गया है. इसमें कहा गया है कि विवाह का फैसला अब युवा खुद करने लगे हैं. दिनोंदिन चीन और दक्षिण कोरिया में तलाक की दर यूरोप और अमेरिका से भी ज्‍यादा हो गई है. इसके साथ ही चीन में बच्‍चों के बूढ़े माता-पिता को बोझ समझने पर विस्‍तार से विश्‍लेषण है.

चीन में एक बच्‍चे की नीति के घातक परिणाम सामने आ रहे हैं, वहां अभिभावकों को बच्‍चों की शादी के लिए बहुत प्रयास और धन खर्च करना पड़ रहा है. पालक बेटे की शादी के लिए कर्ज ले रहे हैं, क्‍योंकि वहां विवाह के लिहाज से 6 करोड़ युवतियां कम हैं. इसका कारण बालक-बालिका अनुपात का गड़बड़ होना है. बेटे की शादी चीन में अब बड़ा भारी काम हो गया है. कुछ ऐसा ही जैसा भारत में बेटी की शादी है. ऐसे में वह पालक जो बेटे की शादी के लिए कर्ज ले रहे हैं, खुद को बाकी उम्र तक कर्जा चुकाने में खपा देते हैं. और बुढ़ापे तक पहुंचते हुए वह बेहद अकेले और आर्थ‍िक रूप से कमजोर हो रहे हैं. तो बेटे उनको निरंतर एकाकी जीवन की ओर धकेल रहे हैं. उनकी जिम्‍मेदारी से मुंह चुरा रहे हैं.

चीन हमसे बहुत दूर नहीं है. हमसे आर्थिक आधार पर बेहतर ही है. इसलिए उनकी सामाजिक सोच-विचार और व्‍यवहार पर हमें सजग नजर रखने की जरूरत है. इसके साथ ही बच्‍चों के लिए सबकुछ दांव लगाने की परंपरागत नीति पर भी तेजी से निर्णय करने की जरूरत है. यहां मां-बाप बच्‍चों के सपनों के पीछे लगभग पागल हो जाते हैं. मानसिक और आर्थिक रूप से खुद का दीवाला निकाल देते हैं. इस उम्‍मीद में कि बच्‍चे हैं, न. यह सोच अब निरंतर अपना मूल्‍य खोती जा रही है. इसलिए अगर युवा अपनी नीति बदल रहे हैं, तो जो बुजुर्ग होने की राह पर हैं, उन्‍हें भी अपनी राय पर विचार करना ही चाहिए.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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